Unit- 01
Birth, Growth And The Political Trends In The Indian National Movemen
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन : उद्भव, विकास एवं राजनीतिक प्रवृत्तियाँ
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का उद्भव आधुनिक भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं में से एक था। यह आंदोलन किसी एक दिन, किसी एक संस्था या किसी एक नेता के प्रयास से अचानक उत्पन्न नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे लंबे समय तक चलने वाली सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और बौद्धिक प्रक्रियाओं का योगदान था। भारत में राष्ट्रीय आंदोलन का उदय उस ऐतिहासिक परिस्थिति में हुआ जब अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन धीरे-धीरे भारत के राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक जीवन पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर चुका था। प्रारंभ में अंग्रेजी शासन ने भारत में राजनीतिक एकीकरण, आधुनिक प्रशासन, नई शिक्षा और संचार के साधनों का विकास किया, लेकिन इसके साथ ही भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था पर औपनिवेशिक नियंत्रण भी मजबूत होता गया। इसी विरोधाभासी परिस्थिति ने एक ओर भारतीयों के बीच आधुनिक राजनीतिक चेतना को जन्म दिया और दूसरी ओर विदेशी शासन के प्रति असंतोष को बढ़ाया। धीरे-धीरे भारतीय समाज के शिक्षित वर्ग, बुद्धिजीवियों, व्यापारियों, पत्रकारों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने यह अनुभव करना शुरू किया कि भारत की समस्याओं का मूल कारण केवल प्रशासनिक कमियाँ नहीं, बल्कि विदेशी शासन की वह संरचना है जिसमें भारतीय जनता की राजनीतिक इच्छा और आर्थिक हितों को गौण स्थान प्राप्त था।
राष्ट्रीय आंदोलन के उद्भव को समझने के लिए सबसे पहले उस राजनीतिक परिस्थिति को समझना आवश्यक है जिसमें अंग्रेजों ने भारत पर अपना शासन स्थापित किया। ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार के उद्देश्य से भारत में प्रवेश किया था, लेकिन समय के साथ उसने राजनीतिक सत्ता पर अधिकार करना शुरू कर दिया। प्लासी और बक्सर जैसी निर्णायक घटनाओं के बाद कंपनी की राजनीतिक शक्ति बढ़ती गई और अंततः भारत के विशाल भूभाग पर उसका नियंत्रण स्थापित हो गया। कंपनी शासन के बाद 1858 में भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया। इस परिवर्तन के साथ प्रशासनिक नियंत्रण और अधिक केंद्रीकृत हुआ। भारतीयों को शासन व्यवस्था में सीमित अवसर प्राप्त थे और उच्च प्रशासनिक पदों पर अंग्रेजों का प्रभुत्व बना रहा। इससे धीरे-धीरे शिक्षित भारतीयों में राजनीतिक असंतोष विकसित होने लगा।
1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। यद्यपि 1857 की घटना को आधुनिक अर्थ में पूर्ण विकसित राष्ट्रीय आंदोलन कहना उचित नहीं होगा, फिर भी इसने विदेशी शासन के विरुद्ध व्यापक असंतोष को अभिव्यक्ति दी। सैनिकों के असंतोष के साथ-साथ अनेक क्षेत्रों में जमींदारों, किसानों, पूर्व शासकों और आम लोगों ने भी ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी। 1857 के विद्रोह की असफलता के बाद ब्रिटिश शासन ने अपनी प्रशासनिक और सैन्य व्यवस्था को अधिक मजबूत किया। लेकिन इस घटना ने भारतीयों को यह अनुभव भी कराया कि विदेशी शासन के विरुद्ध प्रतिरोध की आवश्यकता है। आगे आने वाली राजनीतिक पीढ़ियों ने अलग परिस्थितियों में इसी प्रतिरोध को अधिक संगठित, संवैधानिक और व्यापक रूप प्रदान किया।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के उद्भव का एक महत्वपूर्ण कारण आधुनिक शिक्षा का प्रसार था। अंग्रेजी शिक्षा ने भारतीयों को केवल नई भाषा या रोजगार के अवसर ही नहीं दिए, बल्कि उसने उन्हें आधुनिक राजनीतिक और सामाजिक विचारों से परिचित कराया। यूरोप के इतिहास, अमेरिकी स्वतंत्रता, फ्रांसीसी क्रांति, उदारवाद, राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, नागरिक अधिकार, संवैधानिक शासन और प्रतिनिधि संस्थाओं के विचार भारतीय शिक्षित वर्ग तक पहुँचे। भारतीय बुद्धिजीवियों ने जब इन विचारों की तुलना भारत की राजनीतिक स्थिति से की, तो उन्हें यह विरोधाभास दिखाई दिया कि ब्रिटेन में नागरिक स्वतंत्रता और प्रतिनिधि शासन की बात की जाती थी, जबकि भारत में औपनिवेशिक शासन भारतीय जनता को समान राजनीतिक अधिकार देने के लिए तैयार नहीं था। इस विरोधाभास ने भारतीय राजनीतिक चेतना को मजबूत किया।
आधुनिक शिक्षा ने भारतीयों के बीच एक नए शिक्षित मध्यम वर्ग का निर्माण किया। इस वर्ग में वकील, शिक्षक, पत्रकार, सरकारी कर्मचारी, डॉक्टर, लेखक और सामाजिक सुधारक शामिल थे। इस वर्ग ने सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की। यह वर्ग भारत के विभिन्न भागों में रहने वाले शिक्षित लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने में भी महत्वपूर्ण साबित हुआ। पहले राजनीतिक गतिविधियाँ प्रायः स्थानीय स्तर तक सीमित रहती थीं, लेकिन आधुनिक शिक्षा और संचार के विकास ने क्षेत्रीय सीमाओं को कमजोर किया। बंगाल, बंबई, मद्रास, उत्तर भारत और अन्य क्षेत्रों के शिक्षित भारतीयों में धीरे-धीरे समान राजनीतिक समस्याओं और समान राष्ट्रीय हितों की भावना विकसित होने लगी।
प्रेस और समाचार-पत्रों ने भी राष्ट्रीय आंदोलन के उद्भव में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समाचार-पत्रों ने सरकार की नीतियों की आलोचना करने, जनता की समस्याओं को सामने लाने और राजनीतिक विचारों का प्रसार करने का कार्य किया। विभिन्न भारतीय भाषाओं में प्रकाशित समाचार-पत्रों ने राष्ट्रीय चेतना को शिक्षित वर्ग से निकालकर समाज के व्यापक हिस्सों तक पहुँचाने का प्रयास किया। पत्रकारों और लेखकों ने आर्थिक शोषण, प्रशासनिक भेदभाव, किसानों की समस्याओं, अकाल, कर व्यवस्था और भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों जैसे प्रश्नों पर सार्वजनिक बहस को जन्म दिया। प्रेस ने भारतीयों में यह भावना विकसित की कि भारत की समस्याएँ अलग-अलग क्षेत्रों की स्थानीय समस्याएँ नहीं हैं, बल्कि औपनिवेशिक शासन की व्यापक व्यवस्था से जुड़ी हुई हैं।
रेलवे, डाक और तार जैसी आधुनिक संचार व्यवस्थाओं ने भी राष्ट्रीय चेतना के विस्तार में अप्रत्यक्ष लेकिन महत्वपूर्ण योगदान दिया। औपनिवेशिक सरकार ने इन साधनों का विकास मुख्यतः अपने प्रशासनिक और आर्थिक हितों के लिए किया था, लेकिन भारतीय समाज में इनके परिणाम व्यापक रहे। विभिन्न क्षेत्रों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ा, विचारों का आदान-प्रदान तेज हुआ और राजनीतिक संगठनों के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में संवाद स्थापित करना आसान हुआ। राजनीतिक कार्यकर्ता विभिन्न शहरों में जाकर सभा और सम्मेलन करने लगे। इससे भारत के विशाल भूभाग में एक व्यापक राजनीतिक समुदाय की कल्पना को बल मिला।
राष्ट्रीय आंदोलन के उद्भव का एक महत्वपूर्ण कारण भारतीय अर्थव्यवस्था का औपनिवेशिक शोषण था। ब्रिटिश आर्थिक नीतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की पारंपरिक संरचनाओं को गहरे रूप से प्रभावित किया। भारत से कच्चे माल का निर्यात और ब्रिटेन में निर्मित वस्तुओं का भारतीय बाजार में विस्तार भारतीय हस्तशिल्प तथा पारंपरिक उद्योगों के लिए गंभीर चुनौती बना। अनेक भारतीय कारीगरों और छोटे उत्पादकों की आर्थिक स्थिति कमजोर हुई। कृषि पर दबाव बढ़ा और किसानों पर राजस्व का बोझ बना रहा। जब भारत में अकाल और गरीबी की स्थिति उत्पन्न होती थी, तब भी औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों में भारतीय जनता की आवश्यकताओं की अपेक्षा साम्राज्यवादी हितों को अधिक महत्व दिया जाता था।
भारतीय राष्ट्रवादी अर्थशास्त्रियों ने इस आर्थिक शोषण को समझने और उसकी आलोचना करने का प्रयास किया। दादाभाई नौरोजी ने ‘धन के निकास’ की अवधारणा के माध्यम से यह तर्क दिया कि भारत की संपत्ति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विभिन्न माध्यमों से ब्रिटेन की ओर जा रहा है। उन्होंने यह समझाने का प्रयास किया कि भारत की गरीबी केवल प्राकृतिक कारणों का परिणाम नहीं है, बल्कि औपनिवेशिक आर्थिक व्यवस्था से भी उसका गहरा संबंध है। आर.सी. दत्त जैसे राष्ट्रवादी चिंतकों ने भी औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों की आलोचना की। आर्थिक राष्ट्रवाद ने भारतीय राजनीतिक चेतना को वैचारिक आधार प्रदान किया और यह स्पष्ट किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक स्वतंत्रता एक-दूसरे से संबंधित हैं।
भारतीय समाज में सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलनों ने भी राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्नीसवीं शताब्दी में अनेक सुधारकों ने सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों, स्त्री-असमानता, जातिगत भेदभाव और शिक्षा की कमी के विरुद्ध आवाज उठाई। राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद तथा अन्य सामाजिक और धार्मिक सुधारकों के प्रयासों ने भारतीय समाज में आत्मसम्मान और आत्मचेतना की भावना को मजबूत किया। सामाजिक सुधार आंदोलनों ने भारतीयों को यह समझने में सहायता की कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक सुधार भी आवश्यक है। समाज के भीतर व्याप्त कमजोरियों को दूर किए बिना राष्ट्रीय पुनर्निर्माण संभव नहीं हो सकता।
भारतीय राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में सांस्कृतिक पुनर्जागरण की भूमिका भी उल्लेखनीय थी। भारतीय इतिहास, साहित्य, दर्शन, धर्म और संस्कृति के अध्ययन ने भारतीयों में अपने अतीत के प्रति नया आत्मविश्वास पैदा किया। औपनिवेशिक शासन के दौरान कई यूरोपीय लेखकों द्वारा भारतीय समाज को पिछड़ा और असभ्य बताने की प्रवृत्ति के विरुद्ध भारतीय बुद्धिजीवियों ने अपनी सभ्यता और सांस्कृतिक परंपराओं की पुनर्व्याख्या की। इसका उद्देश्य केवल अतीत का गौरवगान करना नहीं था, बल्कि भारतीय समाज में आत्मसम्मान की भावना उत्पन्न करना भी था। यही आत्मसम्मान आगे चलकर राजनीतिक राष्ट्रवाद का आधार बना।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के उद्भव में ब्रिटिश प्रशासन की भेदभावपूर्ण नीतियों की भी बड़ी भूमिका थी। भारतीयों को प्रशासन के उच्च पदों पर सीमित अवसर मिलते थे। भारतीय सिविल सेवा में प्रवेश की व्यवस्था ऐसी थी कि अधिकांश भारतीयों के लिए उच्च प्रशासनिक पदों तक पहुँचना कठिन बना रहता था। सरकारी सेवाओं, न्याय व्यवस्था और राजनीतिक संस्थाओं में नस्ली भेदभाव का अनुभव भारतीयों को लगातार होता था। धीरे-धीरे शिक्षित भारतीयों को यह अनुभव होने लगा कि अंग्रेजी शासन की घोषित उदारता और वास्तविक प्रशासनिक व्यवहार के बीच अंतर है। इससे राजनीतिक अधिकारों की मांग अधिक मजबूत हुई।
लॉर्ड लिटन के शासनकाल की कुछ नीतियों ने भारतीयों में असंतोष को बढ़ाने का काम किया। विशेष रूप से वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट ने भारतीय भाषाई प्रेस की स्वतंत्रता पर नियंत्रण लगाने का प्रयास किया। इससे भारतीय पत्रकारों और शिक्षित वर्ग में व्यापक असंतोष उत्पन्न हुआ। इसी प्रकार भारतीयों और अंग्रेजों के बीच समानता के प्रश्न से जुड़ा इल्बर्ट बिल विवाद भी महत्वपूर्ण था। इस विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया कि औपनिवेशिक समाज में नस्ली श्रेष्ठता की भावना कितनी गहराई तक मौजूद थी। भारतीयों ने अनुभव किया कि अंग्रेजी शासन में कानून और प्रशासन की समानता का सिद्धांत व्यवहार में सीमित था।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के उद्भव में प्रारंभिक राजनीतिक संगठनों का योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण था। भारतीय राजनीतिक चेतना के विकास के साथ विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय और प्रांतीय राजनीतिक संस्थाएँ बनने लगीं। बंगाल में इंडियन एसोसिएशन, बंबई में बॉम्बे प्रेसिडेंसी एसोसिएशन और मद्रास में मद्रास महाजन सभा जैसे संगठनों ने भारतीयों को राजनीतिक मुद्दों पर संगठित किया। इन संगठनों ने प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी, नागरिक अधिकार, सरकारी सेवाओं में अवसर और प्रतिनिधित्व जैसे प्रश्न उठाए। इनके माध्यम से राजनीतिक संगठन और सार्वजनिक बहस की संस्कृति विकसित हुई।
इसी क्रम में 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। कांग्रेस की स्थापना भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण संस्थागत पड़ाव थी। प्रारंभिक कांग्रेस का स्वरूप आज के व्यापक जनआंदोलन जैसा नहीं था। इसमें मुख्यतः शिक्षित मध्यम वर्ग, वकील, शिक्षक, पत्रकार और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोग शामिल थे। इसके प्रारंभिक नेताओं ने संवैधानिक तरीकों को प्राथमिकता दी और प्रशासन में सुधार, भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी, विधायी परिषदों के विस्तार तथा आर्थिक समस्याओं के समाधान की मांग की। फिर भी कांग्रेस का ऐतिहासिक महत्व इस तथ्य में था कि उसने भारत के विभिन्न क्षेत्रों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं को एक साझा मंच प्रदान किया।
कांग्रेस के प्रारंभिक अधिवेशनों ने राष्ट्रीय एकता की भावना को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अलग-अलग भाषाओं, क्षेत्रों और सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए प्रतिनिधि एक ही राजनीतिक मंच पर भारत की समस्याओं पर विचार करने लगे। इससे भारतीयों में यह भावना मजबूत हुई कि उनके हितों में एक व्यापक समानता है। राजनीतिक राष्ट्रवाद धीरे-धीरे स्थानीय और प्रांतीय सीमाओं को पार करके अखिल भारतीय रूप ग्रहण करने लगा।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का उद्भव केवल शिक्षित मध्यम वर्ग की राजनीतिक गतिविधियों का परिणाम नहीं था। किसानों, मजदूरों, व्यापारियों और समाज के अन्य वर्गों की आर्थिक समस्याओं ने भी राष्ट्रीय चेतना के विस्तार में भूमिका निभाई। यद्यपि प्रारंभिक राष्ट्रीय आंदोलन में इन वर्गों की प्रत्यक्ष भागीदारी सीमित थी, लेकिन आर्थिक शोषण और औपनिवेशिक नीतियों का प्रभाव व्यापक समाज पर पड़ रहा था। आगे चलकर यही सामाजिक और आर्थिक प्रश्न राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक जनआंदोलन में बदलने वाले महत्वपूर्ण आधार बने।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के उद्भव में राष्ट्रवाद की भावना का विकास सबसे महत्वपूर्ण परिणाम था। राष्ट्रवाद केवल विदेशी शासन का विरोध नहीं था, बल्कि यह उस विचार पर आधारित था कि भारत एक साझा राजनीतिक समुदाय है और भारतीयों को अपने भविष्य का निर्धारण स्वयं करने का अधिकार है। यह भावना धीरे-धीरे विकसित हुई। पहले लोग अपने क्षेत्र, जाति, भाषा या स्थानीय समुदाय से अधिक जुड़ी राजनीतिक पहचान रखते थे। आधुनिक राजनीतिक चेतना ने इन स्थानीय पहचानों के ऊपर एक व्यापक भारतीय पहचान के निर्माण की संभावना पैदा की। यह प्रक्रिया सरल या पूर्णतः समान नहीं थी, लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन ने इसे लगातार आगे बढ़ाया।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के उद्भव को समझते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारतीय राष्ट्रवाद अनेक धाराओं से निर्मित हुआ था। उदारवादी राष्ट्रवाद संवैधानिक सुधारों और प्रतिनिधित्व पर बल देता था। उग्र राष्ट्रवाद अधिक सक्रिय प्रतिरोध, स्वदेशी और बहिष्कार की ओर बढ़ा। धार्मिक-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ने भारतीय सांस्कृतिक पहचान को महत्व दिया। समाजवादी और श्रमिक विचारधाराओं ने आर्थिक समानता और वर्गीय न्याय को राष्ट्रीय मुक्ति से जोड़ा। गांधीवादी राष्ट्रवाद ने सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, जनसहभागिता और नैतिक राजनीति को प्रमुखता दी। इन विभिन्न धाराओं के बीच मतभेद होने के बावजूद सभी ने किसी न किसी रूप में औपनिवेशिक प्रभुत्व को चुनौती देने और भारतीय राजनीतिक चेतना को विकसित करने में योगदान दिया।
इस प्रकार भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का उद्भव अनेक परिस्थितियों के परस्पर प्रभाव का परिणाम था। औपनिवेशिक आर्थिक शोषण ने असंतोष पैदा किया, आधुनिक शिक्षा ने राजनीतिक चेतना विकसित की, प्रेस ने विचारों का प्रसार किया, रेल और संचार ने भारतीयों के बीच संपर्क बढ़ाया, सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों ने आत्मसम्मान को मजबूत किया, प्रारंभिक राजनीतिक संस्थाओं ने संगठन की क्षमता विकसित की और भारतीयों के साथ प्रशासनिक तथा नस्ली भेदभाव ने विदेशी शासन की वास्तविक प्रकृति को स्पष्ट किया। इन सभी परिस्थितियों ने मिलकर उस राजनीतिक वातावरण का निर्माण किया जिसमें भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का जन्म संभव हुआ।
अंततः भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का उद्भव भारतीय समाज में आधुनिक राजनीतिक चेतना के क्रमिक विकास की अभिव्यक्ति था। यह केवल अंग्रेजों के विरुद्ध असंतोष का परिणाम नहीं था, बल्कि भारतीयों के भीतर अपने अधिकारों, सम्मान और राजनीतिक भविष्य के प्रति बढ़ती जागरूकता का परिणाम था। राष्ट्रीय आंदोलन ने भारतीय जनता को यह समझने में सहायता की कि राजनीतिक सत्ता पर अधिकार केवल शासकों का विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि जनता को अपने शासन और भविष्य के निर्धारण में भाग लेने का अधिकार है। इसी चेतना ने आगे चलकर स्वराज, स्वाधीनता, प्रतिनिधि शासन, नागरिक अधिकार और लोकतांत्रिक राजनीति की मांग को मजबूत किया। इसलिए भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के उद्भव को आधुनिक भारत में राष्ट्रवाद और लोकतांत्रिक राजनीतिक चेतना के निर्माण की आधारभूत प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है।
विकास एवं राजनीतिक प्रवृत्तियाँ
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का उद्भव जिस राजनीतिक चेतना और परिस्थितियों के परिणामस्वरूप हुआ था, उसका आगे का विकास धीरे-धीरे अधिक व्यापक, संगठित, सक्रिय और जनोन्मुख स्वरूप में हुआ। प्रारंभिक अवस्था में राष्ट्रीय आंदोलन मुख्यतः शिक्षित भारतीयों, बुद्धिजीवियों, वकीलों, पत्रकारों और मध्यम वर्ग तक सीमित था, लेकिन समय के साथ इसकी सामाजिक और राजनीतिक आधारभूमि लगातार विस्तृत होती गई। राष्ट्रीय आंदोलन के विकास की प्रक्रिया को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि भारतीयों की राजनीतिक मांगें किस प्रकार सीमित प्रशासनिक सुधारों से आगे बढ़कर स्वशासन, स्वराज और अंततः पूर्ण स्वतंत्रता की मांग में परिवर्तित हुईं। इसी परिवर्तन के साथ आंदोलन की कार्य-पद्धतियों, नेतृत्व, सामाजिक आधार और राजनीतिक विचारधाराओं में भी महत्वपूर्ण बदलाव आया।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रारंभिक विकास में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। कांग्रेस की स्थापना ने भारतीयों को एक अखिल भारतीय राजनीतिक मंच प्रदान किया। प्रारंभिक कांग्रेस के नेताओं का विश्वास संवैधानिक राजनीति में था। उनका मानना था कि ब्रिटिश शासन की उदार राजनीतिक परंपराओं और संवैधानिक संस्थाओं का उपयोग करके भारतीयों को धीरे-धीरे अधिक राजनीतिक अधिकार दिलाए जा सकते हैं। वे तत्काल विदेशी शासन को समाप्त करने की मांग नहीं कर रहे थे, बल्कि प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी, विधायी परिषदों के विस्तार, सरकारी सेवाओं में समान अवसर, आर्थिक शोषण में कमी और प्रशासनिक सुधारों की मांग कर रहे थे। इस चरण के नेताओं ने राजनीतिक संघर्ष को तर्क, तथ्य, प्रस्ताव, निवेदन और संवैधानिक साधनों के माध्यम से आगे बढ़ाया।
प्रारंभिक राष्ट्रवादियों का सबसे बड़ा योगदान भारतीयों में राजनीतिक प्रशिक्षण और राष्ट्रीय चेतना का विकास करना था। उन्होंने विभिन्न प्रांतों और क्षेत्रों की समस्याओं को अखिल भारतीय राजनीतिक प्रश्नों से जोड़ने का प्रयास किया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भारत की गरीबी, प्रशासनिक भेदभाव और राजनीतिक पिछड़ेपन के पीछे औपनिवेशिक शासन की संरचना का महत्वपूर्ण योगदान है। दादाभाई नौरोजी ने आर्थिक शोषण और धन के निकास की समस्या को सामने रखा। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने राजनीतिक अधिकारों और राष्ट्रीय चेतना को विकसित करने का प्रयास किया। गोपाल कृष्ण गोखले ने संवैधानिक सुधार और क्रमिक राजनीतिक विकास को महत्व दिया। इस दौर ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लिए वैचारिक और संगठनात्मक आधार तैयार किया।
लेकिन समय के साथ भारतीयों के एक वर्ग में यह भावना विकसित होने लगी कि केवल संवैधानिक निवेदन और शांतिपूर्ण आग्रहों से औपनिवेशिक शासन की मूल संरचना में पर्याप्त परिवर्तन नहीं किया जा सकता। ब्रिटिश सरकार की नीतियों और राजनीतिक उदासीनता से असंतोष बढ़ा। इसी पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय आंदोलन में एक अधिक सक्रिय और उग्र राजनीतिक प्रवृत्ति का विकास हुआ। बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल जैसे नेताओं ने राष्ट्रीय आंदोलन को अधिक संघर्षशील रूप देने का प्रयास किया। उन्होंने स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और जनसक्रियता को राजनीतिक संघर्ष के महत्वपूर्ण साधन के रूप में प्रस्तुत किया।
उग्र राष्ट्रवाद का विकास केवल नेताओं की राजनीतिक सोच में परिवर्तन नहीं था, बल्कि उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों की प्रतिक्रिया भी था। बंगाल विभाजन ने भारतीय राजनीतिक चेतना को व्यापक रूप से प्रभावित किया। 1905 में बंगाल के विभाजन के विरोध में स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन विकसित हुआ। लोगों ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने और भारतीय वस्तुओं के उपयोग को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया। राष्ट्रीय शिक्षा की भावना मजबूत हुई। इस आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन को विद्यार्थियों, महिलाओं, व्यापारियों और समाज के अन्य वर्गों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आर्थिक व्यवहार को राजनीतिक संघर्ष से जोड़ना इस चरण की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी।
स्वदेशी आंदोलन ने यह विचार मजबूत किया कि राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक भाषणों या सरकारी सुधारों की मांग तक सीमित नहीं रह सकता। व्यक्ति का दैनिक जीवन भी राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बन सकता है। विदेशी वस्तु का बहिष्कार, भारतीय उद्योगों को प्रोत्साहन, राष्ट्रीय शिक्षा और सार्वजनिक सभाएँ राजनीतिक प्रतिरोध के नए साधन बने। इस प्रकार राष्ट्रीय आंदोलन में आर्थिक राष्ट्रवाद और राजनीतिक राष्ट्रवाद का संबंध मजबूत हुआ। स्वदेशी की भावना ने आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और राष्ट्रीय एकता को बल दिया।
इसी समय राष्ट्रीय आंदोलन में क्रांतिकारी प्रवृत्ति का भी विकास हुआ। कुछ युवा राष्ट्रवादियों ने यह विश्वास करना शुरू किया कि ब्रिटिश शासन को केवल संवैधानिक साधनों से हटाना संभव नहीं होगा। उन्होंने गुप्त संगठनों का निर्माण किया और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिरोध की राह अपनाई। यद्यपि क्रांतिकारी गतिविधियाँ व्यापक जनआंदोलन का रूप नहीं ले सकीं, लेकिन उनका भारतीय राजनीतिक चेतना पर प्रभाव महत्वपूर्ण था। क्रांतिकारियों के साहस, त्याग और बलिदान ने युवाओं में राष्ट्रीय स्वतंत्रता के प्रति तीव्र भावना उत्पन्न की। आगे चलकर भगत सिंह और उनके साथियों ने क्रांतिकारी राजनीति को सामाजिक और आर्थिक न्याय के प्रश्नों से जोड़ने का प्रयास किया।
राष्ट्रीय आंदोलन के विकास का अगला महत्वपूर्ण चरण प्रथम विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों से जुड़ा था। युद्ध के दौरान भारत से आर्थिक और मानवीय संसाधनों का व्यापक उपयोग किया गया। युद्ध के बाद महँगाई, बेरोजगारी, आर्थिक कठिनाइयों और राजनीतिक असंतोष में वृद्धि हुई। दूसरी ओर भारतीयों को राजनीतिक सुधारों की अपेक्षा थी। जब औपनिवेशिक शासन ने दमनकारी नीतियाँ अपनाईं, तब जनता में असंतोष और अधिक बढ़ा। ऐसी परिस्थिति में महात्मा गांधी का भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के केंद्रीय नेतृत्व के रूप में उभरना एक निर्णायक परिवर्तन था।
महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय आंदोलन की राजनीतिक कार्य-पद्धति को एक नया स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने सत्याग्रह और अहिंसा को राजनीतिक संघर्ष के साधन के रूप में विकसित किया। गांधी के लिए राजनीतिक संघर्ष केवल सत्ता परिवर्तन का प्रश्न नहीं था, बल्कि अन्याय के विरुद्ध नैतिक संघर्ष भी था। उन्होंने जनता को यह विश्वास दिलाया कि सामान्य व्यक्ति भी राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा सकता है। इस प्रकार राष्ट्रीय आंदोलन का सामाजिक आधार बहुत व्यापक हुआ। किसान, मजदूर, महिलाएँ, विद्यार्थी, व्यापारी और ग्रामीण समाज के विभिन्न वर्ग राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ने लगे।
गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक जनआंदोलन में परिवर्तित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सरकारी संस्थाओं, विदेशी वस्तुओं और औपनिवेशिक व्यवस्थाओं के बहिष्कार के माध्यम से जनता को राजनीतिक प्रतिरोध में शामिल किया गया। इस आंदोलन की विशेषता यह थी कि इसमें राजनीतिक संघर्ष को जनजीवन से जोड़ा गया। लोगों से केवल राजनीतिक मांग करने के बजाय यह अपेक्षा की गई कि वे औपनिवेशिक शासन की संस्थाओं से अपनी निर्भरता कम करें। इससे राष्ट्रीय आंदोलन का चरित्र अधिक जनोन्मुख और व्यापक हुआ।
हालाँकि असहयोग आंदोलन को एक हिंसक घटना के बाद वापस ले लिया गया, लेकिन इसका राजनीतिक प्रभाव दीर्घकालिक था। इसने भारतीय जनता को यह अनुभव कराया कि संगठित जनसहभागिता औपनिवेशिक शासन के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। इस दौर में कांग्रेस का स्वरूप भी बदलने लगा। वह केवल शिक्षित अभिजात वर्ग की संस्था न रहकर व्यापक जनता को संगठित करने वाला राजनीतिक मंच बनने लगी। राष्ट्रीय आंदोलन की भाषा और कार्य-पद्धति भी बदल गई।
इसके बाद राष्ट्रीय आंदोलन में रचनात्मक कार्यक्रमों और सामाजिक सुधार की प्रवृत्ति विकसित हुई। गांधी ने चरखा, खादी, ग्रामोद्योग, अस्पृश्यता-निवारण, हिंदू-मुस्लिम एकता, महिला भागीदारी और ग्राम-आधारित सामाजिक पुनर्निर्माण पर जोर दिया। उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक और नैतिक पुनर्निर्माण भी आवश्यक है। इससे राष्ट्रीय आंदोलन का अर्थ केवल ब्रिटिश सत्ता के विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय समाज के भीतर परिवर्तन की प्रक्रिया से भी जुड़ गया।
राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में सविनय अवज्ञा आंदोलन का विशेष महत्व था। नमक कानून के विरोध ने एक सामान्य और दैनिक जीवन से जुड़े प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीतिक संघर्ष का प्रतीक बना दिया। नमक सत्याग्रह ने यह दिखाया कि औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रतिरोध केवल उच्च राजनीतिक प्रश्नों तक सीमित नहीं होना चाहिए। सामान्य नागरिकों के जीवन से जुड़े विषयों को भी राष्ट्रीय आंदोलन के माध्यम में बदला जा सकता है। सविनय अवज्ञा ने ब्रिटिश शासन की वैधता को चुनौती दी और जनता की राजनीतिक सक्रियता को और व्यापक किया।
इसी अवधि में राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर समाजवादी और वामपंथी विचारों का प्रभाव बढ़ने लगा। रूस की क्रांति और विश्व स्तर पर समाजवादी विचारधारा के विस्तार का प्रभाव भारतीय युवाओं और बुद्धिजीवियों पर पड़ा। जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस तथा कांग्रेस के भीतर अन्य नेताओं ने आर्थिक असमानता, औद्योगीकरण, मजदूरों की स्थिति और सामाजिक न्याय के प्रश्नों पर गंभीर विचार किया। कांग्रेस समाजवादी धारा ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता को सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के साथ जोड़ने का प्रयास किया। इससे राष्ट्रीय आंदोलन की राजनीतिक बहस अधिक व्यापक हुई।
राष्ट्रीय आंदोलन में किसान और मजदूर आंदोलनों की भागीदारी भी बढ़ी। किसानों की समस्याएँ, लगान, जमींदारी शोषण, ऋणग्रस्तता और भूमि संबंधी प्रश्न राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ने लगे। इसी प्रकार औद्योगिक मजदूरों में श्रमिक संगठनों और आंदोलनों का विकास हुआ। इससे राष्ट्रीय आंदोलन के सामाजिक आधार में विस्तार आया और यह स्पष्ट हुआ कि स्वतंत्रता का प्रश्न केवल राजनीतिक सत्ता का प्रश्न नहीं है, बल्कि आर्थिक और सामाजिक न्याय से भी संबंधित है।
राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी भी इसके विकास की महत्वपूर्ण विशेषता थी। प्रारंभिक राजनीतिक गतिविधियों में महिलाओं की भूमिका सीमित थी, लेकिन गांधीवादी आंदोलनों के दौरान बड़ी संख्या में महिलाएँ सार्वजनिक राजनीतिक जीवन में आईं। उन्होंने सत्याग्रह, विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार, सभाओं और सामाजिक अभियानों में भाग लिया। इससे भारतीय समाज में महिलाओं की राजनीतिक भूमिका के संबंध में पारंपरिक दृष्टिकोण को चुनौती मिली। स्वतंत्रता आंदोलन ने महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में प्रवेश के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अवसर प्रदान किया।
राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में सुभाष चंद्र बोस की भूमिका ने एक अलग राजनीतिक प्रवृत्ति को अभिव्यक्ति दी। बोस औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध अधिक निर्णायक संघर्ष के समर्थक थे। वे राष्ट्रीय स्वतंत्रता को शीघ्र प्राप्त करने और मजबूत राजनीतिक संगठन की आवश्यकता पर बल देते थे। बाद में आजाद हिंद फौज के माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष को नया रूप दिया। यद्यपि आजाद हिंद फौज सैन्य दृष्टि से स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर सकी, लेकिन उसके प्रभाव ने भारतीय सैनिकों और जनता में औपनिवेशिक शासन के प्रति मनोवैज्ञानिक चुनौती उत्पन्न की।
राष्ट्रीय आंदोलन की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रवृत्ति पूर्ण स्वतंत्रता की मांग का विकास था। प्रारंभिक दौर में स्वशासन और संवैधानिक सुधार प्रमुख मांगें थीं, लेकिन समय के साथ यह भावना मजबूत हुई कि भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर सीमित स्वायत्तता नहीं बल्कि पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता चाहिए। पूर्ण स्वराज का विचार राष्ट्रीय आंदोलन की राजनीतिक दिशा में निर्णायक परिवर्तन का प्रतीक था। इससे स्वतंत्रता की मांग अधिक स्पष्ट और व्यापक हुई।
द्वितीय विश्व युद्ध ने राष्ट्रीय आंदोलन की परिस्थितियों को और जटिल बनाया। ब्रिटिश सरकार ने भारत को भारतीय नेताओं की सहमति के बिना युद्ध में शामिल कर दिया। इससे कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के बीच संबंधों में तनाव बढ़ा। भारतीय नेतृत्व ने यह प्रश्न उठाया कि यदि ब्रिटेन लोकतंत्र और स्वतंत्रता के लिए युद्ध कर रहा है, तो भारत को स्वयं स्वतंत्रता से वंचित क्यों रखा जा रहा है। इसी विरोधाभास ने औपनिवेशिक शासन की वैधता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए।
1942 का भारत छोड़ो आंदोलन राष्ट्रीय आंदोलन के अंतिम बड़े जनसंघर्षों में से एक था। इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन से तत्काल भारत छोड़ने की मांग की। नेतृत्व की गिरफ्तारी के बाद भी देश के अनेक हिस्सों में आंदोलन जारी रहा। जनता ने विभिन्न रूपों में औपनिवेशिक शासन का विरोध किया। यह आंदोलन इस बात का प्रमाण था कि भारतीय स्वतंत्रता की आकांक्षा अब समाज के व्यापक हिस्से में गहराई से स्थापित हो चुकी थी। ब्रिटिश शासन के लिए भारत पर लंबे समय तक राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखना increasingly कठिन होता गया।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विकास के दौरान सांप्रदायिक राजनीति का प्रश्न भी महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रवृत्ति के रूप में सामने आया। भारतीय समाज की धार्मिक और सामाजिक विविधता को औपनिवेशिक शासन की नीतियों ने कई बार राजनीतिक प्रतिनिधित्व और निर्वाचन व्यवस्था के प्रश्न से जोड़ दिया। पृथक निर्वाचक मंडलों और सामुदायिक प्रतिनिधित्व की नीतियों ने राजनीतिक पहचान को धार्मिक आधार पर संगठित करने की प्रवृत्ति को बढ़ाया। मुस्लिम लीग की राजनीति का विकास और आगे चलकर पाकिस्तान की मांग राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारक बने। कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अन्य राजनीतिक शक्तियों के बीच मतभेदों ने राष्ट्रीय एकता के प्रश्न को जटिल बनाया।
इसके साथ ही राष्ट्रीय आंदोलन में दलित और वंचित वर्गों के राजनीतिक अधिकारों का प्रश्न भी महत्वपूर्ण हुआ। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सामाजिक समानता, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और दलित अधिकारों को स्वतंत्र राजनीतिक प्रश्न के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि केवल विदेशी शासन से मुक्ति पर्याप्त नहीं है; भारतीय समाज के भीतर मौजूद सामाजिक असमानताओं और भेदभाव को भी समाप्त करना आवश्यक है। इससे राष्ट्रीय आंदोलन की बहस में स्वतंत्रता के साथ सामाजिक न्याय का प्रश्न अधिक स्पष्ट रूप से सामने आया।
राष्ट्रीय आंदोलन की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रवृत्ति यह भी थी कि स्वतंत्रता के अर्थ में धीरे-धीरे विस्तार हुआ। प्रारंभ में स्वतंत्रता का अर्थ मुख्यतः विदेशी शासन से मुक्ति था, लेकिन बाद में इसमें राजनीतिक समानता, सामाजिक न्याय, आर्थिक अवसर, नागरिक स्वतंत्रता और जनकल्याण के प्रश्न शामिल होते गए। इस प्रकार भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने स्वतंत्रता की अवधारणा को व्यापक सामाजिक और राजनीतिक अर्थ प्रदान किया।
राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में संवैधानिक राजनीति और जनआंदोलन दोनों की भूमिका रही। एक ओर राजनीतिक नेताओं ने विधायी संस्थाओं, संवैधानिक सुधारों और चुनावी राजनीति के माध्यम से औपनिवेशिक व्यवस्था के भीतर संघर्ष किया, दूसरी ओर जनआंदोलनों ने सड़क, गाँव और समाज के व्यापक हिस्सों को राजनीतिक रूप से सक्रिय किया। इन दोनों प्रवृत्तियों के बीच कभी-कभी मतभेद रहे, लेकिन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की व्यापक प्रक्रिया में दोनों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की राजनीतिक प्रवृत्तियों में राष्ट्रवाद सबसे केंद्रीय प्रवृत्ति थी, लेकिन यह राष्ट्रवाद स्थिर या एकरूप नहीं था। उदार राष्ट्रवाद ने संवैधानिकता और राजनीतिक अधिकारों पर बल दिया, उग्र राष्ट्रवाद ने प्रतिरोध और स्वदेशी को महत्व दिया, क्रांतिकारी राष्ट्रवाद ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रत्यक्ष संघर्ष का मार्ग अपनाया, गांधीवादी राष्ट्रवाद ने अहिंसा और जनसहभागिता को आधार बनाया, समाजवादी राष्ट्रवाद ने आर्थिक समानता और वर्गीय न्याय को महत्व दिया तथा विभिन्न सामाजिक आंदोलनों ने राष्ट्रवाद को सामाजिक न्याय के प्रश्नों से जोड़ा। इन विविध प्रवृत्तियों के बीच संघर्ष और सहयोग दोनों चलते रहे।
अंततः भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का विकास एक क्रमिक लेकिन अत्यंत जटिल राजनीतिक प्रक्रिया थी। यह सीमित शिक्षित वर्ग की संवैधानिक मांगों से प्रारंभ होकर व्यापक जनभागीदारी वाले स्वतंत्रता आंदोलन में परिवर्तित हुआ। इस विकास के दौरान राजनीतिक चेतना का विस्तार हुआ, राष्ट्रीय एकता की भावना मजबूत हुई, औपनिवेशिक शासन की वैधता को चुनौती मिली और स्वतंत्रता की मांग क्रमशः अधिक स्पष्ट तथा व्यापक होती गई। इसके साथ-साथ आंदोलन के भीतर उदारवाद, उग्र राष्ट्रवाद, क्रांतिकारी विचार, गांधीवाद, समाजवाद, किसान-मजदूर राजनीति, सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक राजनीति जैसी विभिन्न प्रवृत्तियाँ विकसित हुईं।
इस प्रकार भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का विकास केवल घटनाओं की श्रृंखला नहीं था, बल्कि भारतीय समाज के राजनीतिक रूपांतरण की प्रक्रिया थी। इस आंदोलन ने भारतीय जनता को राजनीतिक अधिकारों के प्रति जागरूक किया, उसे संगठन और संघर्ष की शक्ति का अनुभव कराया तथा स्वशासन और स्वतंत्रता को राष्ट्रीय जीवन का केंद्रीय लक्ष्य बनाया। अंततः यही व्यापक राजनीतिक चेतना 1947 में औपनिवेशिक शासन के अंत और स्वतंत्र भारत के निर्माण की आधारभूमि बनी। स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ राष्ट्रीय आंदोलन समाप्त अवश्य हुआ, लेकिन उसके दौरान विकसित लोकतंत्र, नागरिक अधिकार, सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और जनसत्ता के विचार स्वतंत्र भारत की राजनीतिक व्यवस्था के निर्माण में स्थायी रूप से स्थापित हो गए।
Birth, Growth And The Political Trends In The Indian National Movemen
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन : उद्भव, विकास एवं राजनीतिक प्रवृत्तियाँ
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions) (2–5 अंक)
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से क्या अभिप्राय है?
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का मुख्य उद्देश्य क्या था?
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के उद्भव के दो प्रमुख कारण लिखिए।
ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीति ने राष्ट्रीय आंदोलन को कैसे प्रभावित किया?
दादाभाई नौरोजी के धन-निकासी सिद्धांत (Drain Theory) को स्पष्ट कीजिए।
आर. सी. दत्त का भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में क्या योगदान था?
आधुनिक शिक्षा ने राष्ट्रीय चेतना के विकास में क्या भूमिका निभाई?
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में समाचार-पत्रों की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों का राष्ट्रीय आंदोलन पर क्या प्रभाव पड़ा?
राजा राममोहन राय का राष्ट्रीय जागरण में योगदान लिखिए।
स्वामी दयानंद सरस्वती का राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान स्पष्ट कीजिए।
स्वामी विवेकानंद ने राष्ट्रीय चेतना को किस प्रकार प्रभावित किया?
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब और किसने की?
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता किसने की?
कांग्रेस के प्रारंभिक उद्देश्य क्या थे?
उदारवादी नेताओं की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
दादाभाई नौरोजी का राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान लिखिए।
गोपाल कृष्ण गोखले के विचारों को स्पष्ट कीजिए।
उग्रवादी आंदोलन से क्या अभिप्राय है?
लाल-बाल-पाल कौन थे?
बाल गंगाधर तिलक का प्रसिद्ध कथन लिखिए।
बंगाल विभाजन कब हुआ और इसका क्या प्रभाव पड़ा?
स्वदेशी आंदोलन क्या था?
बहिष्कार आंदोलन से क्या अभिप्राय है?
महात्मा गांधी भारतीय राजनीति में कब सक्रिय हुए?
सत्याग्रह क्या है?
असहयोग आंदोलन का उद्देश्य क्या था?
सविनय अवज्ञा आंदोलन से क्या अभिप्राय है?
नमक सत्याग्रह का महत्व स्पष्ट कीजिए।
भारत छोड़ो आंदोलन कब प्रारंभ हुआ?
"करो या मरो" का नारा किसने दिया?
चंपारण सत्याग्रह का महत्व लिखिए।
खेड़ा सत्याग्रह किससे संबंधित था?
अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन का महत्व क्या था?
भगत सिंह का राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान लिखिए।
चंद्रशेखर आजाद का योगदान स्पष्ट कीजिए।
सुभाषचंद्र बोस का राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान लिखिए।
आज़ाद हिंद फ़ौज की स्थापना किसने की?
गांधीवादी विचारधारा की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
सरोजिनी नायडू का योगदान लिखिए।
अरुणा आसफ़ अली का राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान बताइए।
राष्ट्रीय आंदोलन में किसानों की भूमिका क्या थी?
राष्ट्रीय आंदोलन में विद्यार्थियों की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
राष्ट्रीय आंदोलन में मजदूरों का योगदान लिखिए।
समाजवादी विचारधारा का राष्ट्रीय आंदोलन पर क्या प्रभाव पड़ा?
कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना कब हुई?
राष्ट्रीय आंदोलन में साम्यवादी विचारधारा की भूमिका लिखिए।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की दो प्रमुख उपलब्धियाँ लिखिए।
स्वतंत्र भारत के संविधान पर राष्ट्रीय आंदोलन का क्या प्रभाव पड़ा?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions) (10–20 अंक)
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के उद्भव के प्रमुख कारणों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विकास का क्रमबद्ध वर्णन कीजिए।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
उदारवादी तथा उग्रवादी नेताओं की विचारधाराओं का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
बंगाल विभाजन तथा स्वदेशी आंदोलन का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का विकास स्पष्ट कीजिए।
असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा भारत छोड़ो आंदोलन का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में क्रांतिकारियों की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
सुभाषचंद्र बोस एवं आज़ाद हिंद फ़ौज के योगदान का विश्लेषण कीजिए।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की भूमिका का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में किसानों एवं मजदूरों की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की प्रमुख राजनीतिक प्रवृत्तियों का विश्लेषण कीजिए।
गांधीवादी, समाजवादी एवं क्रांतिकारी विचारधाराओं का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की उपलब्धियों एवं सीमाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
आधुनिक भारत के निर्माण में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के योगदान का विवेचन कीजिए।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में समाचार-पत्रों एवं आधुनिक शिक्षा की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों का राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव स्पष्ट कीजिए।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और भारतीय संविधान के मध्य संबंध का विश्लेषण कीजिए।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में लोकतांत्रिक मूल्यों के विकास का अध्ययन कीजिए।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की राजनीतिक विरासत का मूल्यांकन कीजिए।
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) (उत्तर सहित)
1. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब हुई थी?
(A) 1882
(B) 1885
(C) 1888
(D) 1890
उत्तर – (B)
2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना किसने की?
(A) लॉर्ड कर्जन
(B) ए. ओ. ह्यूम
(C) लॉर्ड रिपन
(D) विलियम बेंटिक
उत्तर – (B)
3. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष कौन थे?
(A) दादाभाई नौरोजी
(B) डब्ल्यू. सी. बनर्जी
(C) गोपाल कृष्ण गोखले
(D) बदरुद्दीन तैयबजी
उत्तर – (B)
4. धन-निकासी सिद्धांत (Drain Theory) किसने प्रतिपादित किया?
(A) आर. सी. दत्त
(B) दादाभाई नौरोजी
(C) तिलक
(D) गोखले
उत्तर – (B)
5. 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा' यह कथन किसका है?
(A) महात्मा गांधी
(B) बाल गंगाधर तिलक
(C) जवाहरलाल नेहरू
(D) सुभाषचंद्र बोस
उत्तर – (B)
6. बंगाल विभाजन कब हुआ था?
(A) 1901
(B) 1905
(C) 1907
(D) 1911
उत्तर – (B)
7. स्वदेशी आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य था—
(A) विदेशी वस्तुओं का प्रचार
(B) स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार
(C) अंग्रेजों की सहायता करना
(D) कर बढ़ाना
उत्तर – (B)
8. महात्मा गांधी भारत कब लौटे?
(A) 1910
(B) 1915
(C) 1919
(D) 1922
उत्तर – (B)
9. गांधीजी ने अपना पहला सफल सत्याग्रह कहाँ किया?
(A) खेड़ा
(B) अहमदाबाद
(C) चंपारण
(D) बारडोली
उत्तर – (C)
10. असहयोग आंदोलन कब प्रारंभ हुआ?
(A) 1917
(B) 1920
(C) 1925
(D) 1930
उत्तर – (B)
11. नमक सत्याग्रह किस आंदोलन का भाग था?
(A) असहयोग आंदोलन
(B) सविनय अवज्ञा आंदोलन
(C) भारत छोड़ो आंदोलन
(D) स्वदेशी आंदोलन
उत्तर – (B)
12. भारत छोड़ो आंदोलन कब प्रारंभ हुआ?
(A) 1939
(B) 1940
(C) 1942
(D) 1945
उत्तर – (C)
13. "करो या मरो" का नारा किसने दिया?
(A) तिलक
(B) गांधीजी
(C) नेहरू
(D) पटेल
उत्तर – (B)
14. आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व किसने किया?
(A) भगत सिंह
(B) सुभाषचंद्र बोस
(C) चंद्रशेखर आजाद
(D) राजगुरु
उत्तर – (B)
15. निम्नलिखित में से कौन उग्रवादी नेता थे?
(A) गोखले
(B) दादाभाई नौरोजी
(C) बाल गंगाधर तिलक
(D) फिरोजशाह मेहता
उत्तर – (C)
16. लाल-बाल-पाल में 'लाल' से आशय है—
(A) लाला लाजपत राय
(B) लाल बहादुर शास्त्री
(C) लाला हरदयाल
(D) लालाजी टंडन
उत्तर – (A)
17. गांधीजी के राजनीतिक संघर्ष का प्रमुख आधार था—
(A) हिंसा
(B) सत्य और अहिंसा
(C) सैन्य शक्ति
(D) राजतंत्र
उत्तर – (B)
18. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी—
(A) अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार
(B) भारत की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय चेतना का विकास
(C) रेलवे का विकास
(D) व्यापार में वृद्धि
उत्तर – (B)
19. स्वतंत्र भारत के संविधान पर सबसे अधिक प्रभाव किसका पड़ा?
(A) औपनिवेशिक शासन
(B) भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्शों का
(C) केवल ब्रिटिश संसद का
(D) केवल न्यायपालिका का
उत्तर – (B)
20. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की एक प्रमुख राजनीतिक प्रवृत्ति थी—
(A) उदारवाद
(B) उग्रवाद
(C) गांधीवाद
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर – (D)
21. निम्नलिखित में से कौन समाजवादी विचारधारा से संबंधित नेता थे?
(A) जयप्रकाश नारायण
(B) आचार्य नरेंद्र देव
(C) जवाहरलाल नेहरू
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर – (D)
22. राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की सक्रिय भूमिका का उदाहरण है—
(A) सरोजिनी नायडू
(B) अरुणा आसफ़ अली
(C) कस्तूरबा गांधी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर – (D)
23. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का मूल उद्देश्य था—
(A) करों में वृद्धि
(B) ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करना
(C) राजतंत्र की स्थापना
(D) विदेशी व्यापार बढ़ाना
उत्तर – (B)
24. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में समाचार-पत्रों का मुख्य कार्य था—
(A) मनोरंजन करना
(B) राष्ट्रीय चेतना और राजनीतिक जागरूकता फैलाना
(C) व्यापार बढ़ाना
(D) कर संग्रह करना
उत्तर – (B)
25. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम था—
(A) 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति और लोकतांत्रिक भारत की स्थापना
(B) ब्रिटिश शासन का विस्तार
(C) राजतंत्र की स्थापना
(D) सैन्य शासन की स्थापना
उत्तर – (A)
