Political Theory

राजनीतिक सिद्धांत

Course Code POL 103F A060201T  Paper – 04

Unit-01

Political Science: Definition. (राजनीति विज्ञान: परिभाषा)

राजनीति विज्ञान सामाजिक विज्ञानों की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यापक शाखा है, जिसका संबंध राज्य, सरकार, सत्ता, शासन, नागरिक, अधिकार, कर्तव्य, सार्वजनिक नीतियों, राजनीतिक संस्थाओं तथा मानव के राजनीतिक जीवन के अध्ययन से होता है। यह केवल शासन व्यवस्था का अध्ययन नहीं है, बल्कि उन सभी प्रक्रियाओं, विचारों, सिद्धांतों और व्यवहारों का वैज्ञानिक विश्लेषण भी है जिनके माध्यम से समाज में शक्ति का वितरण होता है, निर्णय लिए जाते हैं, कानून बनाए जाते हैं और सार्वजनिक जीवन का संचालन किया जाता है। राजनीति विज्ञान यह समझने का प्रयास करता है कि राज्य क्यों अस्तित्व में आया, सरकार कैसे कार्य करती है, नागरिकों और शासन के बीच क्या संबंध होते हैं, विभिन्न राजनीतिक संस्थाएँ किस प्रकार कार्य करती हैं तथा समाज में न्याय, समानता, स्वतंत्रता और लोकतंत्र जैसे आदर्शों को किस प्रकार स्थापित किया जा सकता है। इस दृष्टि से राजनीति विज्ञान केवल सैद्धांतिक विषय नहीं, बल्कि व्यावहारिक जीवन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ ज्ञान का क्षेत्र है।

राजनीति विज्ञान शब्द की उत्पत्ति प्राचीन यूनानी भाषा के ‘पोलिस’ शब्द से मानी जाती है, जिसका अर्थ नगर-राज्य होता है। प्राचीन यूनान में नगर-राज्य राजनीतिक संगठन की मूल इकाई थे और नागरिक प्रत्यक्ष रूप से शासन में भाग लेते थे। इसी कारण प्रारंभिक राजनीतिक चिंतन का केंद्र राज्य और नागरिक जीवन था। कालांतर में राजनीतिक संगठन का स्वरूप बदलता गया और आधुनिक राष्ट्र-राज्य का विकास हुआ। इसके साथ ही राजनीति विज्ञान का क्षेत्र भी व्यापक होता गया। अब इसका अध्ययन केवल राज्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें सरकार, प्रशासन, संविधान, राजनीतिक दल, दबाव समूह, जनमत, अंतरराष्ट्रीय संबंध, सार्वजनिक नीति, चुनाव, मानवाधिकार, राजनीतिक विचारधाराएँ तथा वैश्विक राजनीति जैसे विषय भी सम्मिलित हो गए।

राजनीति विज्ञान की परिभाषा विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने दृष्टिकोण के अनुसार प्रस्तुत की है। कुछ विद्वानों ने इसे राज्य का विज्ञान माना, कुछ ने सरकार का अध्ययन कहा, जबकि आधुनिक विद्वानों ने इसे शक्ति, निर्णय-निर्माण, सार्वजनिक नीतियों और राजनीतिक व्यवहार का विज्ञान माना। इन सभी परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि राजनीति विज्ञान का विषय निरंतर विकसित होता रहा है और समय के साथ इसका स्वरूप अधिक व्यापक और बहुआयामी बन गया है। प्रारंभिक राजनीतिक चिंतन मुख्यतः राज्य और शासन की संरचना तक सीमित था, किंतु आधुनिक युग में राजनीति विज्ञान व्यक्ति, समाज और राजनीतिक प्रक्रियाओं के पारस्परिक संबंधों का भी गहन अध्ययन करता है।

प्राचीन यूनानी दार्शनिकों ने राजनीति विज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। प्लेटो ने आदर्श राज्य की कल्पना प्रस्तुत की और यह विचार व्यक्त किया कि राज्य का उद्देश्य न्याय की स्थापना तथा नागरिकों के नैतिक विकास को सुनिश्चित करना होना चाहिए। उनके अनुसार शासन ऐसे विद्वान और नैतिक व्यक्तियों के हाथ में होना चाहिए जो समाज के व्यापक हित को समझते हों। अरस्तू ने राजनीति विज्ञान को व्यवस्थित रूप प्रदान किया और राज्य को मनुष्य के सर्वोच्च संगठन के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने राज्य, संविधान, शासन-प्रणालियों तथा नागरिक जीवन का तुलनात्मक अध्ययन किया। अरस्तू का मत था कि मनुष्य स्वभाव से राजनीतिक प्राणी है, क्योंकि वह समाज में रहकर ही अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर सकता है। इसलिए राजनीति विज्ञान का उद्देश्य राज्य और नागरिक जीवन का वैज्ञानिक अध्ययन करना है।

मध्यकाल में राजनीतिक चिंतन पर धर्म का गहरा प्रभाव रहा। राज्य और शासन की वैधता को धार्मिक आधारों से जोड़ा गया। किंतु पुनर्जागरण और आधुनिक युग के आगमन के साथ राजनीति विज्ञान ने धर्म से स्वतंत्र होकर वैज्ञानिक स्वरूप ग्रहण करना प्रारंभ किया। निकोलो मैकियावेली ने राजनीति को नैतिकता और धर्म से अलग करके वास्तविक राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर समझने का प्रयास किया। उन्होंने शक्ति, शासन और राज्य की व्यावहारिक समस्याओं का विश्लेषण किया तथा राजनीति को स्वतंत्र अध्ययन का विषय बनाया। आधुनिक राजनीतिक चिंतन में थॉमस हॉब्स, जॉन लॉक, जाँ-जाक रूसो, मोंतेस्क्यू तथा अनेक अन्य विचारकों ने राज्य, सामाजिक अनुबंध, अधिकार, स्वतंत्रता और लोकतंत्र के सिद्धांतों को विकसित किया। इन विचारों ने आधुनिक राजनीति विज्ञान की दिशा निर्धारित की।

आधुनिक राजनीति विज्ञान केवल राज्य की संस्थाओं का अध्ययन नहीं करता, बल्कि राजनीतिक व्यवहार का भी विश्लेषण करता है। व्यवहारवादी दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति का अध्ययन केवल संविधान, संसद, न्यायालय या सरकार तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह भी समझना आवश्यक है कि नागरिक मतदान कैसे करते हैं, राजनीतिक दल जनमत को कैसे प्रभावित करते हैं, दबाव समूह किस प्रकार नीतियों को प्रभावित करते हैं तथा सत्ता का वास्तविक वितरण किस प्रकार होता है। इस दृष्टिकोण ने राजनीति विज्ञान को अधिक अनुभवजन्य, वैज्ञानिक और शोधपरक बनाया। इसके परिणामस्वरूप सर्वेक्षण, सांख्यिकीय विश्लेषण, व्यवहार अध्ययन तथा तुलनात्मक राजनीति जैसी नई अध्ययन विधियों का विकास हुआ।

राजनीति विज्ञान का प्रमुख विषय राज्य है। राज्य एक संगठित राजनीतिक संस्था है जिसके चार मूल तत्व माने जाते हैं—जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार तथा संप्रभुता। राज्य समाज के संगठन का सर्वोच्च रूप है क्योंकि उसके पास कानून बनाने, उन्हें लागू करने तथा व्यवस्था बनाए रखने की वैधानिक शक्ति होती है। राजनीति विज्ञान राज्य की उत्पत्ति, उद्देश्य, कार्य, स्वरूप तथा विकास का अध्ययन करता है। यह विभिन्न प्रकार के राज्यों जैसे लोकतांत्रिक राज्य, राजतंत्र, संघीय राज्य, एकात्मक राज्य, समाजवादी राज्य तथा कल्याणकारी राज्य का भी तुलनात्मक विश्लेषण करता है।

सरकार राजनीति विज्ञान का दूसरा महत्वपूर्ण अध्ययन क्षेत्र है। सरकार राज्य की वह संस्था है जिसके माध्यम से राज्य अपने कार्यों का संचालन करता है। सरकार कानून बनाती है, प्रशासन चलाती है, न्याय व्यवस्था सुनिश्चित करती है, सुरक्षा प्रदान करती है तथा विकास योजनाओं को लागू करती है। राजनीति विज्ञान सरकार की संरचना, कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका, प्रशासनिक संस्थाओं तथा इनके पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करता है। लोकतांत्रिक शासन में सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होती है और नागरिक चुनावों के माध्यम से उसे नियंत्रित करते हैं।

संविधान राजनीति विज्ञान का अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। संविधान किसी भी राज्य का सर्वोच्च विधिक दस्तावेज होता है जो शासन व्यवस्था, नागरिकों के अधिकारों, सरकार की शक्तियों तथा विभिन्न संस्थाओं के कार्यों को निर्धारित करता है। राजनीति विज्ञान विभिन्न देशों के संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन करता है तथा यह विश्लेषण करता है कि संविधान लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता और न्याय की स्थापना में किस प्रकार योगदान देता है। भारतीय संविधान विशेष रूप से राजनीति विज्ञान के अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय है क्योंकि यह विश्व के सबसे विस्तृत संविधानों में से एक है और लोकतांत्रिक शासन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।

राजनीति विज्ञान का संबंध अधिकारों और कर्तव्यों से भी है। नागरिकों को प्राप्त मौलिक अधिकार, मानवाधिकार, राजनीतिक अधिकार तथा सामाजिक और आर्थिक अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था के आधार होते हैं। साथ ही नागरिकों के कर्तव्यों का पालन भी उतना ही आवश्यक है क्योंकि अधिकार और कर्तव्य परस्पर पूरक हैं। राजनीति विज्ञान इस संतुलन का अध्ययन करता है तथा यह स्पष्ट करता है कि लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने दायित्वों का भी ईमानदारी से पालन करें।

लोकतंत्र राजनीति विज्ञान का केंद्रीय विषय है। लोकतंत्र केवल शासन प्रणाली नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन भी है। इसमें जनता सर्वोच्च सत्ता का स्रोत मानी जाती है और शासन जनता की सहमति से संचालित होता है। राजनीति विज्ञान लोकतंत्र के सिद्धांत, चुनाव प्रणाली, राजनीतिक दलों की भूमिका, जनमत, प्रतिनिधित्व, उत्तरदायित्व तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली का विश्लेषण करता है। आधुनिक लोकतंत्र में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, स्वतंत्र न्यायपालिका तथा निष्पक्ष चुनाव व्यवस्था को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

राजनीतिक विचारधाराएँ भी राजनीति विज्ञान का महत्वपूर्ण भाग हैं। उदारवाद, समाजवाद, मार्क्सवाद, राष्ट्रवाद, नारीवाद, पर्यावरणवाद तथा गांधीवाद जैसी विचारधाराएँ समाज और राज्य के संगठन के विभिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं। राजनीति विज्ञान इन विचारधाराओं का अध्ययन करके यह समझने का प्रयास करता है कि विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाएँ किन सिद्धांतों पर आधारित होती हैं और उनका समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है। विचारधाराओं के अध्ययन से राजनीतिक परिवर्तन और नीतिगत निर्णयों को समझने में सहायता मिलती है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अध्ययन भी आधुनिक राजनीति विज्ञान का अभिन्न अंग बन चुका है। वैश्वीकरण, संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय संगठन, कूटनीति, युद्ध और शांति, मानवाधिकार, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक व्यापार तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे विषय आज राजनीति विज्ञान के महत्वपूर्ण अध्ययन क्षेत्र हैं। आधुनिक विश्व में कोई भी राष्ट्र पूर्णतः अलग-थलग रहकर विकास नहीं कर सकता। इसलिए अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन राजनीति विज्ञान को वैश्विक दृष्टिकोण प्रदान करता है।

राजनीति विज्ञान का संबंध अन्य सामाजिक विज्ञानों से भी अत्यंत निकट है। इतिहास राजनीतिक संस्थाओं के विकास को समझने में सहायता करता है। समाजशास्त्र सामाजिक संरचना और राजनीतिक व्यवहार के संबंधों का विश्लेषण करता है। अर्थशास्त्र सार्वजनिक वित्त, विकास और आर्थिक नीतियों के अध्ययन में सहायक होता है। मनोविज्ञान राजनीतिक नेतृत्व, जनमत और मतदान व्यवहार को समझने में योगदान देता है। विधिशास्त्र संविधान और कानूनों की व्याख्या में सहायक होता है। इस प्रकार राजनीति विज्ञान एक अंतर्विषयी विषय है जो विभिन्न सामाजिक विज्ञानों से ज्ञान प्राप्त करके अधिक व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

आधुनिक युग में राजनीति विज्ञान का व्यावहारिक महत्व निरंतर बढ़ता जा रहा है। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में प्रत्येक नागरिक के लिए राजनीतिक प्रक्रियाओं की समझ आवश्यक है। मतदान करना, सार्वजनिक नीतियों का मूल्यांकन करना, नागरिक अधिकारों की रक्षा करना, सामाजिक न्याय को प्रोत्साहित करना तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास बनाए रखना राजनीतिक जागरूकता पर निर्भर करता है। राजनीति विज्ञान नागरिकों को संविधान, शासन, लोकतंत्र, अधिकारों और कर्तव्यों का ज्ञान प्रदान करता है तथा उन्हें उत्तरदायी नागरिक बनने के लिए प्रेरित करता है।

आज के समय में राजनीति विज्ञान का स्वरूप अत्यंत व्यापक हो चुका है। डिजिटल शासन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, पर्यावरणीय राजनीति, लैंगिक न्याय, वैश्विक शासन, सार्वजनिक नीति विश्लेषण तथा सतत विकास जैसे नए विषय भी इसके अध्ययन क्षेत्र में सम्मिलित हो चुके हैं। इससे स्पष्ट होता है कि राजनीति विज्ञान एक गतिशील विषय है जो बदलती सामाजिक, आर्थिक और वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार निरंतर विकसित होता रहता है।

इस प्रकार राजनीति विज्ञान की परिभाषा केवल राज्य या सरकार के अध्ययन तक सीमित नहीं है। यह मानव के राजनीतिक जीवन, शक्ति के वितरण, सार्वजनिक निर्णयों, लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक अधिकारों, शासन व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय संबंधों तथा सामाजिक न्याय का वैज्ञानिक, व्यवस्थित और आलोचनात्मक अध्ययन है। इसका उद्देश्य केवल राजनीतिक संस्थाओं का वर्णन करना नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि शासन को अधिक न्यायपूर्ण, उत्तरदायी, पारदर्शी और जनकल्याणकारी कैसे बनाया जा सकता है। राजनीति विज्ञान व्यक्ति और राज्य के बीच संतुलित संबंध स्थापित करने, लोकतंत्र को सुदृढ़ करने तथा समाज में न्याय, समानता, स्वतंत्रता और शांति की स्थापना के लिए आवश्यक ज्ञान प्रदान करता है। यही कारण है कि आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में राजनीति विज्ञान का अध्ययन केवल शैक्षणिक आवश्यकता नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकता और प्रभावी शासन का आधार भी माना जाता है।

Nature, Scope. (प्रकृति एवं क्षेत्र)

राजनीति विज्ञान की प्रकृति और क्षेत्र का अध्ययन इस विषय को समझने का मूल आधार प्रदान करता है। किसी भी विषय की प्रकृति से यह ज्ञात होता है कि उसका वास्तविक स्वरूप क्या है, उसकी मूल विशेषताएँ कौन-सी हैं, वह किस प्रकार के ज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है तथा उसका अध्ययन किन सिद्धांतों और विधियों पर आधारित है। इसी प्रकार किसी विषय का क्षेत्र यह स्पष्ट करता है कि उसमें किन-किन विषयों, संस्थाओं, प्रक्रियाओं, विचारों और समस्याओं का अध्ययन किया जाता है। राजनीति विज्ञान के संदर्भ में प्रकृति और क्षेत्र का अध्ययन विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह विषय केवल राज्य और सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव के संपूर्ण राजनीतिक जीवन, सामाजिक संबंधों, शक्ति-संरचना, सार्वजनिक नीति, प्रशासन, लोकतंत्र, अधिकारों, कर्तव्यों तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों जैसे अनेक आयामों को अपने अध्ययन में सम्मिलित करता है। समय के साथ राजनीति विज्ञान का स्वरूप निरंतर विस्तृत हुआ है और आधुनिक युग में यह सामाजिक विज्ञानों की सबसे व्यापक तथा गतिशील शाखाओं में से एक माना जाता है।

राजनीति विज्ञान की प्रकृति को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि यह एक सामाजिक विज्ञान है। इसका अध्ययन मानव और समाज से संबंधित राजनीतिक व्यवहार, संस्थाओं तथा प्रक्रियाओं पर केंद्रित होता है। प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति राजनीति विज्ञान में प्रयोगशाला आधारित निश्चित परिणाम प्राप्त नहीं होते, क्योंकि इसका संबंध मनुष्य के विचारों, व्यवहार, भावनाओं, मूल्यों और सामाजिक परिस्थितियों से होता है। प्रत्येक समाज, प्रत्येक राज्य और प्रत्येक ऐतिहासिक काल की राजनीतिक परिस्थितियाँ भिन्न हो सकती हैं। इसलिए राजनीति विज्ञान का अध्ययन परिवर्तनशील सामाजिक वास्तविकताओं के आधार पर किया जाता है। यह विषय मानवीय अनुभव, ऐतिहासिक घटनाओं, संवैधानिक व्यवस्थाओं, राजनीतिक संस्थाओं और व्यवहारिक परिस्थितियों का विश्लेषण करके निष्कर्ष प्रस्तुत करता है।

राजनीति विज्ञान की प्रकृति वैज्ञानिक भी मानी जाती है। यद्यपि इसमें प्राकृतिक विज्ञानों जैसी पूर्ण निश्चितता संभव नहीं होती, फिर भी यह विषय व्यवस्थित अध्ययन, तथ्यों के संग्रह, विश्लेषण, तुलना, तर्क तथा प्रमाण के आधार पर अपने निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। आधुनिक राजनीति विज्ञान में सर्वेक्षण, सांख्यिकीय विश्लेषण, तुलनात्मक अध्ययन, व्यवहार विश्लेषण, ऐतिहासिक पद्धति तथा अनुभवजन्य अनुसंधान जैसी वैज्ञानिक विधियों का व्यापक उपयोग किया जाता है। इसके माध्यम से राजनीतिक घटनाओं के कारणों, प्रभावों तथा प्रवृत्तियों का वस्तुनिष्ठ अध्ययन करने का प्रयास किया जाता है। इस कारण राजनीति विज्ञान को केवल विचारों का संग्रह न मानकर एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक अनुशासन के रूप में स्वीकार किया जाता है।

राजनीति विज्ञान की प्रकृति मानवीय मूल्यों से भी गहराई से जुड़ी हुई है। यह विषय केवल यह नहीं बताता कि राज्य और सरकार कैसे कार्य करते हैं, बल्कि यह भी विचार करता है कि शासन कैसा होना चाहिए, न्याय क्या है, समानता का वास्तविक अर्थ क्या है, स्वतंत्रता की सीमाएँ क्या हैं तथा नागरिकों और राज्य के बीच आदर्श संबंध किस प्रकार स्थापित किए जा सकते हैं। इस प्रकार राजनीति विज्ञान में तथ्य और मूल्य दोनों का समन्वय पाया जाता है। यह वास्तविक राजनीतिक परिस्थितियों का अध्ययन भी करता है और आदर्श राजनीतिक व्यवस्था की कल्पना भी प्रस्तुत करता है। इसलिए इसकी प्रकृति विश्लेषणात्मक होने के साथ-साथ आदर्शवादी भी है।

राजनीति विज्ञान की प्रकृति गतिशील है क्योंकि राजनीतिक संस्थाएँ और व्यवस्थाएँ समय के साथ बदलती रहती हैं। प्राचीन काल में राजनीति विज्ञान का केंद्र नगर-राज्य था, मध्यकाल में राजतंत्र और धार्मिक शासन प्रमुख रहे, आधुनिक युग में राष्ट्र-राज्य, लोकतंत्र, संवैधानिक शासन और मानवाधिकारों का महत्व बढ़ा तथा वर्तमान समय में वैश्वीकरण, डिजिटल शासन, पर्यावरणीय राजनीति, साइबर सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय सहयोग तथा सार्वजनिक नीति जैसे नए विषय इसके अध्ययन का हिस्सा बन गए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि राजनीति विज्ञान किसी स्थिर ज्ञान का विषय नहीं, बल्कि निरंतर विकसित होने वाला अध्ययन क्षेत्र है।

राजनीति विज्ञान की प्रकृति अंतर्विषयी भी है। इसका अर्थ यह है कि यह अनेक अन्य सामाजिक विज्ञानों से गहरा संबंध रखता है। इतिहास राजनीतिक संस्थाओं और विचारों के विकास को समझने में सहायता करता है। समाजशास्त्र सामाजिक संरचना और राजनीतिक व्यवहार के संबंधों को स्पष्ट करता है। अर्थशास्त्र आर्थिक नीतियों और राज्य की भूमिका को समझने में सहायक होता है। मनोविज्ञान नेतृत्व, जनमत और मतदान व्यवहार का विश्लेषण करता है। विधिशास्त्र संविधान और कानूनों की व्याख्या प्रदान करता है। भूगोल राज्य की सीमाओं, संसाधनों और सामरिक स्थिति के महत्व को स्पष्ट करता है। इस प्रकार राजनीति विज्ञान अनेक विषयों के ज्ञान का उपयोग करके अधिक व्यापक और गहन अध्ययन प्रस्तुत करता है।

राजनीति विज्ञान का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है। इसका सबसे प्रमुख अध्ययन क्षेत्र राज्य है। राज्य मानव समाज का सर्वोच्च राजनीतिक संगठन माना जाता है। राजनीति विज्ञान राज्य की उत्पत्ति, विकास, स्वरूप, उद्देश्य, कार्य, संप्रभुता, नागरिकता तथा विभिन्न प्रकार के राज्यों का अध्ययन करता है। यह विश्लेषण करता है कि राज्य की आवश्यकता क्यों पड़ी, उसकी शक्तियाँ कैसे विकसित हुईं तथा आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य किस प्रकार कार्य करता है। संघीय और एकात्मक राज्यों, लोकतांत्रिक तथा अधिनायकवादी व्यवस्थाओं, समाजवादी और पूँजीवादी राजनीतिक प्रणालियों का अध्ययन भी इसके क्षेत्र में सम्मिलित है।

सरकार राजनीति विज्ञान का दूसरा महत्वपूर्ण अध्ययन क्षेत्र है। सरकार राज्य की वह संस्था है जिसके माध्यम से शासन का संचालन किया जाता है। राजनीति विज्ञान सरकार की संरचना, कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका तथा इनके परस्पर संबंधों का अध्ययन करता है। यह विभिन्न शासन प्रणालियों जैसे संसदीय शासन, अध्यक्षीय शासन, मिश्रित शासन तथा स्थानीय स्वशासन का तुलनात्मक विश्लेषण करता है। सरकार की शक्तियाँ, उत्तरदायित्व, प्रशासनिक संरचना तथा नीति-निर्माण की प्रक्रिया भी इसके अध्ययन का महत्वपूर्ण भाग हैं।

संविधान राजनीति विज्ञान के अध्ययन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। संविधान राज्य का सर्वोच्च विधिक दस्तावेज होता है, जो शासन व्यवस्था, नागरिकों के अधिकारों, सरकार की शक्तियों तथा संस्थाओं की कार्यप्रणाली को निर्धारित करता है। राजनीति विज्ञान विभिन्न देशों के संविधानों का अध्ययन करके यह समझने का प्रयास करता है कि संविधान किस प्रकार लोकतंत्र, न्याय, स्वतंत्रता और समानता की रक्षा करता है। भारतीय संविधान का अध्ययन विशेष रूप से राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक न्याय की व्यापक व्यवस्था प्रस्तुत करता है।

राजनीतिक सिद्धांत और राजनीतिक विचारधाराएँ भी राजनीति विज्ञान के विस्तृत क्षेत्र का भाग हैं। उदारवाद, समाजवाद, मार्क्सवाद, राष्ट्रवाद, गांधीवाद, नारीवाद, पर्यावरणवाद तथा अन्य विचारधाराओं का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि विभिन्न विचारकों ने राज्य, समाज और व्यक्ति के संबंधों को किस प्रकार समझा। प्लेटो, अरस्तू, मैकियावेली, हॉब्स, लॉक, रूसो, मार्क्स, गांधी, अंबेडकर तथा अनेक अन्य विचारकों के राजनीतिक दर्शन का अध्ययन राजनीति विज्ञान की वैचारिक समृद्धि को समझने में सहायता करता है।

राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन भी राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में आता है। संसद, विधानमंडल, न्यायालय, निर्वाचन आयोग, लोक सेवा आयोग, वित्त आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, पंचायतें, नगर निकाय तथा अन्य संवैधानिक संस्थाओं की संरचना और कार्यप्रणाली का विश्लेषण राजनीति विज्ञान का महत्वपूर्ण भाग है। इन संस्थाओं के माध्यम से लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था संचालित होती है और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाती है।

लोक प्रशासन और सार्वजनिक नीति भी राजनीति विज्ञान के आधुनिक क्षेत्र का महत्वपूर्ण अंग हैं। प्रशासन के माध्यम से सरकार अपनी योजनाओं और नीतियों को लागू करती है। राजनीति विज्ञान प्रशासनिक संरचना, प्रशासनिक उत्तरदायित्व, सुशासन, ई-गवर्नेंस, लोक सेवाओं, नीति-निर्माण तथा नीति-क्रियान्वयन की प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है। आधुनिक समय में सार्वजनिक नीति विश्लेषण राजनीति विज्ञान का अत्यंत विकसित क्षेत्र बन चुका है क्योंकि सरकारों के विकास कार्यक्रमों का प्रभाव सीधे नागरिकों के जीवन पर पड़ता है।

राजनीतिक दल, दबाव समूह, जनमत और चुनावी प्रक्रिया का अध्ययन भी राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में सम्मिलित है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दल शासन और जनता के बीच महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य करते हैं। दबाव समूह विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और व्यावसायिक हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा सरकारी नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। जनमत लोकतंत्र की शक्ति का आधार है और चुनाव नागरिकों को सरकार चुनने का अवसर प्रदान करते हैं। इन सभी प्रक्रियाओं का विश्लेषण राजनीति विज्ञान को अधिक व्यावहारिक और समसामयिक बनाता है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति राजनीति विज्ञान के सबसे व्यापक क्षेत्रों में से एक है। आधुनिक विश्व में राष्ट्रों के बीच राजनीतिक, आर्थिक, सामरिक और सांस्कृतिक संबंधों का महत्व निरंतर बढ़ता जा रहा है। राजनीति विज्ञान संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय, क्षेत्रीय संगठनों, कूटनीति, युद्ध और शांति, वैश्विक सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, मानवाधिकार तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग का अध्ययन करता है। वैश्वीकरण के कारण विश्व राजनीति का प्रभाव प्रत्येक राष्ट्र की आंतरिक राजनीति पर भी पड़ता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन अत्यंत आवश्यक हो गया है।

मानवाधिकार, नागरिक अधिकार और सामाजिक न्याय भी राजनीति विज्ञान के अध्ययन का महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा, समानता, स्वतंत्रता और सुरक्षा को सुनिश्चित करना आधुनिक राज्य का प्रमुख उद्देश्य माना जाता है। राजनीति विज्ञान यह अध्ययन करता है कि संविधान, कानून, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाएँ इन अधिकारों की रक्षा किस प्रकार करती हैं तथा समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए कौन-कौन से उपाय किए जाते हैं।

आधुनिक राजनीति विज्ञान में पर्यावरणीय राजनीति, डिजिटल शासन, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, लैंगिक न्याय, सतत विकास, लोकपाल, सूचना का अधिकार तथा नागरिक सहभागिता जैसे विषय भी सम्मिलित हो चुके हैं। इससे स्पष्ट होता है कि राजनीति विज्ञान का क्षेत्र निरंतर विस्तृत हो रहा है और यह बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार नए अध्ययन क्षेत्रों को अपने भीतर समाहित करता जा रहा है।

राजनीति विज्ञान का व्यावहारिक महत्व भी उसके विस्तृत क्षेत्र का प्रमाण है। यह विषय नागरिकों को संविधान, लोकतंत्र, शासन व्यवस्था, अधिकारों और कर्तव्यों की जानकारी प्रदान करता है। इसके माध्यम से व्यक्ति जागरूक नागरिक बनता है, राजनीतिक प्रक्रियाओं को समझता है, सार्वजनिक जीवन में भागीदारी करता है तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में योगदान देता है। यह विषय प्रशासनिक सेवाओं, न्यायिक सेवाओं, शिक्षण, पत्रकारिता, शोध, सार्वजनिक नीति निर्माण तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों जैसे अनेक क्षेत्रों में भी उपयोगी सिद्ध होता है।

इस प्रकार राजनीति विज्ञान की प्रकृति वैज्ञानिक, सामाजिक, मानवीय, मूल्यपरक, विश्लेषणात्मक, गतिशील और अंतर्विषयी है, जबकि उसका क्षेत्र अत्यंत व्यापक है, जिसमें राज्य, सरकार, संविधान, प्रशासन, लोकतंत्र, राजनीतिक विचारधाराएँ, राजनीतिक व्यवहार, मानवाधिकार, सार्वजनिक नीति, अंतरराष्ट्रीय संबंध तथा समकालीन वैश्विक राजनीतिक चुनौतियाँ सम्मिलित हैं। राजनीति विज्ञान का उद्देश्य केवल राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन करना नहीं, बल्कि समाज में न्यायपूर्ण, उत्तरदायी, पारदर्शी और जनकल्याणकारी शासन व्यवस्था की स्थापना के लिए आवश्यक ज्ञान प्रदान करना भी है। यही कारण है कि आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में राजनीति विज्ञान को केवल शैक्षणिक विषय नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकता, प्रभावी शासन और सामाजिक विकास का आधार माना जाता है।

Methods and Relations with Other Social Sciences. (पद्धतियाँ तथा अन्य सामाजिक विज्ञानों के साथ संबंध)

राजनीति विज्ञान एक ऐसा सामाजिक विज्ञान है जिसका उद्देश्य राज्य, सरकार, सत्ता, राजनीतिक संस्थाओं, राजनीतिक व्यवहार तथा सार्वजनिक जीवन से संबंधित तथ्यों का व्यवस्थित अध्ययन करना है। किसी भी विषय के वैज्ञानिक और व्यवस्थित विकास के लिए उपयुक्त अध्ययन-पद्धतियों का होना आवश्यक माना जाता है। अध्ययन-पद्धतियाँ वे साधन हैं जिनके माध्यम से किसी विषय का ज्ञान प्राप्त किया जाता है, तथ्यों का संग्रह किया जाता है, उनका विश्लेषण किया जाता है तथा उचित निष्कर्ष निकाले जाते हैं। राजनीति विज्ञान का विषय अत्यंत व्यापक और गतिशील है, इसलिए इसके अध्ययन में अनेक प्रकार की पद्धतियों का उपयोग किया जाता है। साथ ही राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से अत्यंत निकट संबंध है, क्योंकि मानव जीवन के सामाजिक, आर्थिक, ऐतिहासिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक पक्ष एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। किसी भी राजनीतिक घटना को पूर्ण रूप से समझने के लिए केवल राजनीतिक तथ्यों का अध्ययन पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उससे संबंधित सामाजिक, आर्थिक, ऐतिहासिक तथा मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों का भी विश्लेषण आवश्यक होता है। यही कारण है कि राजनीति विज्ञान का विकास एक अंतर्विषयी विषय के रूप में हुआ है।

राजनीति विज्ञान की अध्ययन-पद्धतियाँ समय के साथ निरंतर विकसित होती रही हैं। प्रारंभिक काल में इसका अध्ययन मुख्यतः दार्शनिक और आदर्शवादी दृष्टिकोण से किया जाता था। प्राचीन यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने आदर्श राज्य की कल्पना प्रस्तुत करते हुए राजनीति का अध्ययन नैतिकता, न्याय और आदर्श शासन की दृष्टि से किया। उनके लिए राजनीति का उद्देश्य सर्वोत्तम राज्य की स्थापना था। इसी प्रकार अरस्तू ने यद्यपि राजनीतिक संस्थाओं का व्यावहारिक अध्ययन किया, फिर भी उनका दृष्टिकोण नैतिक और दार्शनिक आधारों से जुड़ा हुआ था। इस प्रकार प्रारंभिक राजनीति विज्ञान में दार्शनिक पद्धति का प्रमुख स्थान था, जिसमें यह विचार किया जाता था कि राज्य कैसा होना चाहिए, शासन का आदर्श स्वरूप क्या है तथा नागरिक जीवन को किस प्रकार अधिक नैतिक और न्यायपूर्ण बनाया जा सकता है।

इतिहास के विकास के साथ राजनीति विज्ञान में ऐतिहासिक पद्धति का महत्व बढ़ा। इस पद्धति के अनुसार किसी भी राजनीतिक संस्था, संविधान, शासन व्यवस्था अथवा राजनीतिक विचार को समझने के लिए उसके ऐतिहासिक विकास का अध्ययन आवश्यक है। कोई भी संस्था अचानक उत्पन्न नहीं होती, बल्कि वह दीर्घकालीन सामाजिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं का परिणाम होती है। उदाहरण के लिए भारतीय लोकतंत्र, संसदीय शासन, संविधान या स्थानीय स्वशासन की वर्तमान व्यवस्था को समझने के लिए उनके ऐतिहासिक विकास का अध्ययन अनिवार्य है। ऐतिहासिक पद्धति यह स्पष्ट करती है कि अतीत की घटनाएँ वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था को किस प्रकार प्रभावित करती हैं और भविष्य के लिए कौन-से संकेत प्रदान करती हैं।

तुलनात्मक पद्धति राजनीति विज्ञान की अत्यंत महत्वपूर्ण अध्ययन-पद्धतियों में से एक है। इस पद्धति में विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं, संविधानों, शासन प्रणालियों, चुनाव पद्धतियों, प्रशासनिक संस्थाओं तथा राजनीतिक प्रक्रियाओं की तुलना की जाती है। तुलना के माध्यम से समानताओं और भिन्नताओं का विश्लेषण किया जाता है तथा यह समझने का प्रयास किया जाता है कि कौन-सी व्यवस्था अधिक प्रभावी है और किन परिस्थितियों में कोई राजनीतिक संस्था सफल या असफल होती है। उदाहरण के लिए भारत, ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस अथवा जापान की शासन व्यवस्थाओं की तुलना करके लोकतांत्रिक संस्थाओं के विभिन्न स्वरूपों को समझा जा सकता है। तुलनात्मक पद्धति राजनीति विज्ञान को अधिक व्यापक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान करती है।

कानूनी अथवा संवैधानिक पद्धति भी राजनीति विज्ञान के अध्ययन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस पद्धति में संविधान, कानून, न्यायिक निर्णय, संवैधानिक संस्थाओं तथा विधिक व्यवस्थाओं का अध्ययन किया जाता है। राज्य की संरचना, सरकार की शक्तियाँ, नागरिकों के अधिकार, न्यायपालिका की भूमिका तथा विधायी प्रक्रियाओं को समझने में यह पद्धति अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है। आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों में संविधान शासन का आधार होता है, इसलिए संवैधानिक पद्धति राजनीति विज्ञान के अध्ययन की मूल आधारशिला मानी जाती है।

आधुनिक राजनीति विज्ञान में व्यवहारवादी पद्धति का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। व्यवहारवादी दृष्टिकोण का विकास बीसवीं शताब्दी में हुआ और इसका उद्देश्य राजनीति विज्ञान को अधिक वैज्ञानिक तथा अनुभवजन्य बनाना था। इस पद्धति के अनुसार राजनीति का अध्ययन केवल संस्थाओं या कानूनों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि नागरिकों, नेताओं, राजनीतिक दलों, दबाव समूहों तथा मतदान व्यवहार का भी प्रत्यक्ष अध्ययन किया जाना चाहिए। व्यवहारवादी विद्वानों ने सर्वेक्षण, साक्षात्कार, प्रश्नावली, सांख्यिकीय विश्लेषण तथा क्षेत्रीय अध्ययन जैसी वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग करके राजनीतिक व्यवहार का विश्लेषण किया। इससे राजनीति विज्ञान अधिक व्यावहारिक और यथार्थवादी बना।

अनुभवजन्य पद्धति राजनीति विज्ञान में तथ्यों के प्रत्यक्ष अवलोकन और प्रमाणों के आधार पर निष्कर्ष निकालने पर बल देती है। इस पद्धति में केवल सिद्धांतों पर निर्भर रहने के स्थान पर वास्तविक राजनीतिक घटनाओं, चुनाव परिणामों, प्रशासनिक निर्णयों, जनमत, सामाजिक प्रतिक्रियाओं तथा राजनीतिक गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है। इससे प्राप्त निष्कर्ष अधिक वस्तुनिष्ठ और व्यावहारिक माने जाते हैं। आधुनिक अनुसंधान में अनुभवजन्य पद्धति का व्यापक उपयोग किया जाता है।

वैज्ञानिक पद्धति राजनीति विज्ञान में व्यवस्थित अनुसंधान की आधारशिला है। इसमें समस्या की पहचान, तथ्यों का संग्रह, परिकल्पना का निर्माण, विश्लेषण, परीक्षण तथा निष्कर्ष की प्रक्रिया अपनाई जाती है। यद्यपि राजनीति विज्ञान प्राकृतिक विज्ञानों की तरह पूर्ण निश्चित परिणाम प्रस्तुत नहीं कर सकता, क्योंकि इसका संबंध मनुष्य और समाज से है, फिर भी वैज्ञानिक पद्धति के माध्यम से अधिक विश्वसनीय तथा प्रमाण-आधारित अध्ययन संभव होता है। आधुनिक राजनीतिक अनुसंधान में सांख्यिकीय विधियों, डेटा विश्लेषण तथा गणनात्मक तकनीकों का भी उपयोग बढ़ा है।

मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों प्रकार की अध्ययन-पद्धतियाँ राजनीति विज्ञान में समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। मात्रात्मक पद्धति में आँकड़ों, प्रतिशत, चुनाव परिणामों, जनमत सर्वेक्षणों तथा सांख्यिकीय विश्लेषण का उपयोग किया जाता है। दूसरी ओर गुणात्मक पद्धति में राजनीतिक विचारों, ऐतिहासिक घटनाओं, नेतृत्व, वैचारिक प्रवृत्तियों, सामाजिक परिस्थितियों तथा सांस्कृतिक प्रभावों का गहन विश्लेषण किया जाता है। आधुनिक राजनीति विज्ञान इन दोनों दृष्टिकोणों का संतुलित उपयोग करता है ताकि अध्ययन अधिक व्यापक और यथार्थपूर्ण हो सके।

राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से अत्यंत गहरा और स्वाभाविक संबंध है। सबसे पहले इसका संबंध इतिहास से है। इतिहास अतीत की घटनाओं का अध्ययन करता है, जबकि राजनीति विज्ञान वर्तमान राजनीतिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं को समझता है। वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था अतीत के ऐतिहासिक विकास का परिणाम होती है। यदि किसी देश के संविधान, लोकतंत्र, शासन प्रणाली या राजनीतिक संस्कृति को समझना हो, तो उसके इतिहास का ज्ञान अनिवार्य हो जाता है। इसी कारण इतिहास और राजनीति विज्ञान को परस्पर पूरक विषय माना जाता है।

समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान का संबंध भी अत्यंत निकट है। समाजशास्त्र समाज, सामाजिक संरचना, सामाजिक समूहों, परंपराओं तथा सामाजिक संबंधों का अध्ययन करता है, जबकि राजनीति विज्ञान इन सामाजिक संरचनाओं के राजनीतिक प्रभावों का विश्लेषण करता है। समाज में जाति, वर्ग, धर्म, भाषा, संस्कृति, परिवार तथा शिक्षा जैसी संस्थाएँ राजनीतिक व्यवहार को प्रभावित करती हैं। मतदान, नेतृत्व, जनमत तथा राजनीतिक दलों की सफलता भी सामाजिक संरचना से प्रभावित होती है। इसलिए राजनीति विज्ञान समाजशास्त्र से अनेक सिद्धांत और अध्ययन-पद्धतियाँ ग्रहण करता है।

अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान का संबंध भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। आधुनिक राज्य केवल कानून और व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक विकास, रोजगार, गरीबी उन्मूलन, सार्वजनिक वित्त, कर व्यवस्था तथा कल्याणकारी योजनाओं का संचालन भी करता है। आर्थिक नीतियाँ राजनीतिक निर्णयों से प्रभावित होती हैं और राजनीतिक स्थिरता आर्थिक विकास को प्रभावित करती है। बजट, कराधान, सार्वजनिक व्यय, आर्थिक नियोजन तथा विकास नीतियों का अध्ययन दोनों विषयों को परस्पर जोड़ता है। इसलिए राजनीति और अर्थव्यवस्था के संबंधों को समझे बिना किसी भी आधुनिक राज्य की कार्यप्रणाली को पूर्णतः नहीं समझा जा सकता।

मनोविज्ञान और राजनीति विज्ञान के बीच भी गहरा संबंध है। राजनीतिक निर्णय केवल संस्थागत नियमों के आधार पर नहीं लिए जाते, बल्कि उनमें मानवीय भावनाएँ, व्यक्तित्व, प्रेरणाएँ, नेतृत्व क्षमता, जनभावनाएँ तथा मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रियाएँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। मतदाता किस आधार पर मतदान करते हैं, नेता जनता को कैसे प्रभावित करते हैं, राजनीतिक प्रचार का लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है तथा जनमत कैसे निर्मित होता है—इन सभी प्रश्नों के उत्तर मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी प्राप्त होते हैं। राजनीतिक मनोविज्ञान आधुनिक राजनीति विज्ञान का महत्वपूर्ण अध्ययन क्षेत्र बन चुका है।

विधिशास्त्र और राजनीति विज्ञान का संबंध संविधान तथा कानूनों के माध्यम से स्थापित होता है। राज्य की समस्त राजनीतिक व्यवस्था विधिक आधार पर संचालित होती है। संविधान शासन की संरचना निर्धारित करता है, कानून नागरिकों के अधिकार और कर्तव्यों को स्पष्ट करते हैं तथा न्यायपालिका उनकी व्याख्या करती है। राजनीति विज्ञान इन संस्थाओं के राजनीतिक महत्व का अध्ययन करता है, जबकि विधिशास्त्र उनकी विधिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। दोनों विषय मिलकर आधुनिक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की संपूर्ण समझ प्रदान करते हैं।

दर्शनशास्त्र का राजनीति विज्ञान पर अत्यंत गहरा प्रभाव रहा है। न्याय, स्वतंत्रता, समानता, अधिकार, नैतिकता, राज्य का उद्देश्य तथा आदर्श शासन जैसी अवधारणाएँ मूलतः दार्शनिक चिंतन से विकसित हुई हैं। प्लेटो, अरस्तू, कांट, हेगेल, रूसो, गांधी और अंबेडकर जैसे विचारकों ने दार्शनिक आधारों पर राजनीतिक सिद्धांत विकसित किए। राजनीति विज्ञान इन विचारों का अध्ययन करके यह समझता है कि आदर्श समाज और राज्य की स्थापना किस प्रकार की जा सकती है।

भूगोल का भी राजनीति विज्ञान से महत्वपूर्ण संबंध है। किसी राज्य की भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक संसाधन, जलवायु, सीमाएँ, समुद्री मार्ग तथा सामरिक महत्व उसकी विदेश नीति, सुरक्षा नीति और आर्थिक विकास को प्रभावित करते हैं। इसी कारण भू-राजनीति का अध्ययन आधुनिक राजनीति विज्ञान का महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गया है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों और राष्ट्रीय सुरक्षा को समझने में भौगोलिक कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

मानवशास्त्र भी राजनीति विज्ञान को महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है। मानव समाज के प्रारंभिक राजनीतिक संगठनों, जनजातीय व्यवस्थाओं, परंपरागत नेतृत्व तथा सामाजिक विकास की प्रक्रियाओं का अध्ययन मानवशास्त्र करता है। इससे राजनीति विज्ञान को राज्य की उत्पत्ति तथा राजनीतिक संस्थाओं के प्रारंभिक विकास को समझने में सहायता मिलती है।

आधुनिक समय में पर्यावरण अध्ययन, सूचना प्रौद्योगिकी, संचार विज्ञान तथा लोक प्रशासन जैसे विषयों के साथ भी राजनीति विज्ञान का संबंध निरंतर गहरा होता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा, डिजिटल शासन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ई-गवर्नेंस तथा सतत विकास जैसी नई चुनौतियाँ राजनीति विज्ञान के अध्ययन क्षेत्र को और अधिक विस्तृत बना रही हैं। इससे स्पष्ट होता है कि राजनीति विज्ञान केवल पारंपरिक राज्य और सरकार तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि यह आधुनिक समाज की लगभग प्रत्येक महत्वपूर्ण सार्वजनिक समस्या से जुड़ा हुआ ज्ञान-विज्ञान है।

इस प्रकार राजनीति विज्ञान की अध्ययन-पद्धतियाँ समय के साथ निरंतर विकसित हुई हैं और आज यह विषय दार्शनिक, ऐतिहासिक, तुलनात्मक, कानूनी, व्यवहारवादी, अनुभवजन्य तथा वैज्ञानिक सभी प्रकार की पद्धतियों का संतुलित उपयोग करता है। इसी प्रकार इसका इतिहास, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, विधिशास्त्र, दर्शनशास्त्र, भूगोल, मानवशास्त्र तथा अन्य सामाजिक विज्ञानों के साथ अत्यंत घनिष्ठ और परस्पर पूरक संबंध है। इन विषयों के सहयोग से राजनीति विज्ञान अधिक व्यापक, वैज्ञानिक, व्यावहारिक तथा समकालीन बनता है और मानव के राजनीतिक जीवन की जटिलताओं को गहराई से समझने में सक्षम होता है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि यह समाज के विभिन्न पक्षों को एक-दूसरे से जोड़कर राज्य, सरकार, नागरिक और सार्वजनिक जीवन का समग्र तथा संतुलित अध्ययन प्रस्तुत करता है।

                                                                                                                             Unit-02

Approaches to the study of Political Science. Traditional approaches: Institutiona. (राजनीति विज्ञान के अध्ययन के उपागम: परंपरागत उपागम – संस्थागत उपागम)

राजनीति विज्ञान के अध्ययन का विकास अनेक चरणों से होकर गुजरा है। समय, समाज, राज्य तथा राजनीतिक परिस्थितियों में परिवर्तन के साथ राजनीति विज्ञान के अध्ययन की विधियाँ और दृष्टिकोण भी बदलते रहे। किसी विषय का अध्ययन किस दृष्टि से किया जाए, किन तथ्यों को महत्वपूर्ण माना जाए तथा किन आधारों पर निष्कर्ष निकाले जाएँ, इसे उस विषय का उपागम कहा जाता है। राजनीति विज्ञान में विभिन्न उपागम विकसित हुए हैं, जिनमें परंपरागत उपागम सबसे प्राचीन और आधारभूत माना जाता है। इस उपागम ने राजनीति विज्ञान को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया तथा राज्य, सरकार और राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन की मजबूत नींव रखी। परंपरागत उपागम के अंतर्गत अनेक दृष्टिकोण विकसित हुए, जिनमें संस्थागत उपागम का विशेष महत्व है। यह उपागम राजनीति विज्ञान के प्रारंभिक विकास का प्रमुख आधार रहा और लंबे समय तक राजनीतिक अध्ययन का सबसे प्रभावशाली माध्यम बना रहा।

संस्थागत उपागम का मूल आधार यह विचार है कि राजनीति को समझने के लिए सबसे पहले उन संस्थाओं का अध्ययन किया जाना चाहिए जिनके माध्यम से राज्य और सरकार अपना कार्य करती हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार राजनीतिक जीवन का वास्तविक स्वरूप राजनीतिक संस्थाओं के संगठन, संरचना, अधिकारों, कार्यों और पारस्परिक संबंधों में निहित होता है। इसलिए यदि संसद, कार्यपालिका, न्यायपालिका, संविधान, निर्वाचन प्रणाली, राजनीतिक दल तथा अन्य संवैधानिक संस्थाओं का व्यवस्थित अध्ययन कर लिया जाए, तो किसी भी राज्य की राजनीतिक व्यवस्था को समझा जा सकता है। इस कारण संस्थागत उपागम मुख्य रूप से औपचारिक राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन पर बल देता है।

संस्थागत उपागम का विकास मुख्य रूप से प्राचीन यूनानी राजनीतिक चिंतन से प्रारंभ हुआ। प्लेटो और अरस्तू ने राज्य तथा उसकी संस्थाओं का विस्तृत अध्ययन किया। प्लेटो ने आदर्श राज्य की कल्पना प्रस्तुत करते हुए शासन संस्थाओं की भूमिका पर विचार किया, जबकि अरस्तू ने विभिन्न शासन प्रणालियों का तुलनात्मक अध्ययन करके यह स्पष्ट किया कि राज्य की संस्थाएँ किस प्रकार समाज के संचालन में योगदान देती हैं। आगे चलकर रोमन विचारकों, मध्यकालीन विद्वानों तथा आधुनिक युग के संवैधानिक विशेषज्ञों ने भी राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन को अत्यधिक महत्व दिया। आधुनिक काल में संवैधानिक शासन, प्रतिनिधि लोकतंत्र तथा संसदीय प्रणाली के विकास के साथ संस्थागत उपागम और अधिक सुदृढ़ हुआ।

संस्थागत उपागम का प्रमुख उद्देश्य राजनीतिक संस्थाओं के स्वरूप, संरचना, अधिकार, कार्यप्रणाली तथा उनके परस्पर संबंधों का अध्ययन करना है। इस उपागम के अनुसार राज्य एक संगठित संस्था है और सरकार उसकी कार्यकारी व्यवस्था है। इसलिए राजनीति विज्ञान का मुख्य कार्य यह जानना है कि राज्य की विभिन्न संस्थाएँ किस प्रकार कार्य करती हैं, उनके अधिकार क्या हैं, उनके बीच शक्ति का विभाजन कैसे किया गया है तथा वे नागरिकों के हितों की रक्षा किस प्रकार करती हैं। इस दृष्टिकोण में संविधान को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है क्योंकि संविधान ही राजनीतिक संस्थाओं की संरचना तथा शक्तियों को निर्धारित करता है।

संस्थागत उपागम में विधायिका का अध्ययन विशेष महत्व रखता है। संसद अथवा विधानमंडल कानून निर्माण का प्रमुख अंग होता है और लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का आधार माना जाता है। इस उपागम के अंतर्गत यह अध्ययन किया जाता है कि संसद की संरचना कैसी है, उसके सदस्य कैसे चुने जाते हैं, कानून बनाने की प्रक्रिया क्या है, संसद सरकार को किस प्रकार उत्तरदायी बनाती है तथा लोकतांत्रिक शासन में उसकी भूमिका क्या है। इसी प्रकार कार्यपालिका का अध्ययन करते समय राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद, राज्यपाल, मुख्यमंत्री तथा प्रशासनिक अधिकारियों की शक्तियों और कार्यों का विश्लेषण किया जाता है।

न्यायपालिका भी संस्थागत उपागम का अत्यंत महत्वपूर्ण अध्ययन क्षेत्र है। न्यायपालिका संविधान की व्याख्या करती है, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है तथा शासन की वैधानिकता सुनिश्चित करती है। संस्थागत उपागम के अनुसार न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक पुनरावलोकन, न्यायालयों की संरचना तथा उनके अधिकार-क्षेत्र का अध्ययन राजनीतिक व्यवस्था को समझने के लिए आवश्यक है। विशेष रूप से लोकतांत्रिक देशों में न्यायपालिका की भूमिका संविधान की रक्षा तथा विधि के शासन की स्थापना में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

संविधान संस्थागत उपागम का केंद्रीय विषय है। इस उपागम के अनुसार किसी भी राज्य की राजनीतिक व्यवस्था को समझने के लिए उसके संविधान का अध्ययन आवश्यक है क्योंकि संविधान राज्य की संरचना, सरकार की शक्तियों, नागरिकों के अधिकारों तथा शासन की प्रक्रियाओं को निर्धारित करता है। इसलिए संस्थागत उपागम में विभिन्न देशों के संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। उदाहरण के लिए भारत, ब्रिटेन, अमेरिका तथा फ्रांस के संवैधानिक ढाँचों की तुलना करके यह समझने का प्रयास किया जाता है कि विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं में संस्थाओं की भूमिका किस प्रकार भिन्न होती है।

संस्थागत उपागम की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसका औपचारिक दृष्टिकोण है। यह मुख्य रूप से उन संस्थाओं का अध्ययन करता है जिन्हें कानून और संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त होती है। इसमें शासन के वैधानिक स्वरूप, संवैधानिक प्रावधानों तथा प्रशासनिक संरचनाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इस कारण यह उपागम राजनीतिक व्यवस्था के विधिक और संगठनात्मक पक्ष को स्पष्ट रूप से समझने में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है।

इस उपागम का एक अन्य महत्वपूर्ण गुण इसकी व्यवस्थित और क्रमबद्ध अध्ययन-पद्धति है। राजनीतिक संस्थाओं के संगठन, अधिकारों, कार्यों तथा संरचना का विस्तार से अध्ययन करने के कारण राजनीति विज्ञान एक व्यवस्थित विषय के रूप में विकसित हुआ। प्रारंभिक राजनीतिक शिक्षा और संवैधानिक अध्ययन में आज भी इस उपागम का व्यापक उपयोग किया जाता है। प्रतियोगी परीक्षाओं, विधि अध्ययन तथा प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी में राजनीतिक संस्थाओं का ज्ञान अत्यंत आवश्यक माना जाता है और यह ज्ञान मुख्यतः संस्थागत उपागम के माध्यम से प्राप्त होता है।

संस्थागत उपागम की सहायता से विभिन्न शासन प्रणालियों का तुलनात्मक अध्ययन भी संभव हुआ। संसदीय शासन और अध्यक्षीय शासन, संघीय और एकात्मक व्यवस्था, द्विसदनीय और एकसदनीय विधानमंडल, स्वतंत्र तथा नियंत्रित न्यायपालिका जैसी व्यवस्थाओं की तुलना करके राजनीतिक संस्थाओं के गुण-दोषों का विश्लेषण किया गया। इससे विभिन्न देशों की शासन व्यवस्थाओं को समझने तथा उपयुक्त राजनीतिक सुधारों का सुझाव देने में सहायता मिली।

संस्थागत उपागम का एक महत्वपूर्ण योगदान यह भी है कि इसने राज्य और सरकार के अध्ययन को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। संविधान, संसद, न्यायपालिका तथा प्रशासन जैसी संस्थाओं के व्यवस्थित अध्ययन से राजनीति विज्ञान केवल दार्शनिक विचारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक संगठन के वास्तविक स्वरूप को समझने का माध्यम बना। इससे शासन व्यवस्था का विश्लेषण अधिक स्पष्ट, तार्किक तथा व्यवस्थित हुआ।

यद्यपि संस्थागत उपागम राजनीति विज्ञान के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा, फिर भी समय के साथ इसकी कुछ सीमाएँ भी सामने आईं। इसकी सबसे बड़ी सीमा यह मानी गई कि यह मुख्य रूप से औपचारिक संस्थाओं का अध्ययन करता है और वास्तविक राजनीतिक व्यवहार की उपेक्षा करता है। संविधान में जो व्यवस्था लिखी होती है, व्यवहार में वह हमेशा उसी रूप में लागू नहीं होती। कई बार राजनीतिक दल, दबाव समूह, जनमत, सामाजिक परिस्थितियाँ तथा नेतृत्व की भूमिका राजनीतिक निर्णयों को अधिक प्रभावित करती हैं, जबकि संस्थागत उपागम इन अनौपचारिक पक्षों पर पर्याप्त ध्यान नहीं देता।

दूसरी सीमा यह है कि यह उपागम नागरिकों के व्यवहार, मतदान की प्रवृत्तियों, राजनीतिक संस्कृति तथा सामाजिक प्रभावों का समुचित विश्लेषण नहीं करता। उदाहरण के लिए चुनाव केवल संवैधानिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि मतदाताओं की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ भी चुनाव परिणामों को प्रभावित करती हैं। संस्थागत उपागम इन पहलुओं का विस्तृत अध्ययन नहीं करता, जिसके कारण राजनीति की वास्तविक गतिशीलता को पूर्ण रूप से समझना कठिन हो जाता है।

तीसरी सीमा यह है कि संस्थागत उपागम अत्यधिक विधिक और संवैधानिक दृष्टिकोण पर आधारित है। यह मानकर चलता है कि राजनीतिक संस्थाएँ संविधान के अनुसार ही कार्य करती हैं, जबकि व्यवहार में कई बार राजनीतिक परिस्थितियाँ, दलगत हित, व्यक्तिगत नेतृत्व तथा सामाजिक दबाव संवैधानिक व्यवस्थाओं से अधिक प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। इसलिए केवल संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर किसी भी राजनीतिक व्यवस्था की पूर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती।

बीसवीं शताब्दी में व्यवहारवादी आंदोलन के विकास के साथ राजनीति विज्ञान में नए उपागम सामने आए, जिन्होंने राजनीतिक व्यवहार, सामाजिक प्रक्रियाओं तथा अनुभवजन्य तथ्यों को अधिक महत्व दिया। इसके परिणामस्वरूप राजनीति विज्ञान का अध्ययन अधिक व्यापक और व्यावहारिक बन गया। फिर भी संस्थागत उपागम का महत्व समाप्त नहीं हुआ। आज भी किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था को समझने के लिए संसद, न्यायपालिका, कार्यपालिका, संविधान तथा अन्य राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन अनिवार्य माना जाता है। आधुनिक उपागमों ने संस्थागत अध्ययन को अस्वीकार नहीं किया, बल्कि उसे राजनीतिक व्यवहार और सामाजिक विश्लेषण के साथ जोड़कर अधिक व्यापक रूप प्रदान किया।

समकालीन राजनीति विज्ञान में संस्थागत उपागम का नया स्वरूप भी विकसित हुआ है, जिसे नव-संस्थागत उपागम कहा जाता है। इसमें केवल संस्थाओं की संरचना का अध्ययन नहीं किया जाता, बल्कि यह भी देखा जाता है कि संस्थाएँ वास्तविक जीवन में किस प्रकार कार्य करती हैं, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ उन्हें कैसे प्रभावित करती हैं तथा वे नागरिकों के व्यवहार और सार्वजनिक नीतियों को किस प्रकार दिशा देती हैं। इस प्रकार आधुनिक राजनीति विज्ञान ने संस्थागत उपागम को नई परिस्थितियों के अनुरूप अधिक व्यावहारिक और समग्र रूप प्रदान किया है।

भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के अध्ययन में भी संस्थागत उपागम अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है। भारतीय संविधान, संसद, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद, न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग, वित्त आयोग, संघीय व्यवस्था, राज्य सरकारें, पंचायत राज तथा नगर निकाय जैसी संस्थाओं की संरचना और कार्यप्रणाली को समझने के लिए यही उपागम सबसे प्रभावी आधार प्रदान करता है। इसके माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था किस प्रकार संगठित होती है तथा विभिन्न संस्थाएँ परस्पर सहयोग और संतुलन के माध्यम से शासन का संचालन करती हैं।

इस प्रकार परंपरागत उपागम के अंतर्गत संस्थागत उपागम राजनीति विज्ञान के अध्ययन का सबसे प्राचीन, व्यवस्थित और आधारभूत दृष्टिकोण है। इसने राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन को वैज्ञानिक दिशा प्रदान की, संविधान और शासन व्यवस्था की समझ विकसित की तथा आधुनिक राजनीति विज्ञान की नींव को सुदृढ़ बनाया। यद्यपि इसकी कुछ सीमाएँ हैं, फिर भी राजनीतिक संस्थाओं की संरचना, अधिकार, कार्य तथा संगठन को समझने के लिए इसका महत्व आज भी बना हुआ है। आधुनिक राजनीति विज्ञान में व्यवहारवादी और अन्य समकालीन उपागमों के विकास के बावजूद संस्थागत उपागम राजनीति के औपचारिक स्वरूप को समझने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है और राजनीतिक अध्ययन की आधारशिला के रूप में इसकी उपयोगिता आज भी पूर्णतः स्वीकार की जाती है।

Historical. (ऐतिहासिक)

राजनीति विज्ञान के अध्ययन में ऐतिहासिक उपागम का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह राजनीति विज्ञान की सबसे प्राचीन और प्रभावशाली अध्ययन पद्धतियों में से एक माना जाता है। इस उपागम का मूल आधार यह है कि वर्तमान राजनीतिक संस्थाओं, व्यवस्थाओं, विचारों और प्रक्रियाओं को सही रूप में समझने के लिए उनके ऐतिहासिक विकास का अध्ययन आवश्यक है। कोई भी राजनीतिक संस्था, संविधान, शासन प्रणाली, कानून या विचारधारा अचानक उत्पन्न नहीं होती, बल्कि वह लंबे ऐतिहासिक विकास, सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक अनुभवों का परिणाम होती है। इसलिए यदि किसी राजनीतिक व्यवस्था के वर्तमान स्वरूप को समझना हो तो उसके अतीत का ज्ञान अनिवार्य हो जाता है। ऐतिहासिक उपागम राजनीति विज्ञान को समय के प्रवाह में देखने की दृष्टि प्रदान करता है और यह स्पष्ट करता है कि वर्तमान राजनीतिक संरचना अतीत की घटनाओं, संघर्षों, आंदोलनों तथा विचारों का स्वाभाविक परिणाम है।

ऐतिहासिक उपागम का विकास प्राचीन काल से प्रारंभ माना जाता है। यूनानी दार्शनिकों ने राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन में इतिहास का उपयोग किया। अरस्तू ने विभिन्न नगर-राज्यों के संविधानों का अध्ययन करके शासन-प्रणालियों का तुलनात्मक विश्लेषण किया और यह समझने का प्रयास किया कि राजनीतिक संस्थाएँ समय के साथ किस प्रकार विकसित होती हैं। आगे चलकर रोमन विचारकों, मध्यकालीन विद्वानों तथा आधुनिक युग के अनेक राजनीतिक चिंतकों ने भी इतिहास को राजनीति विज्ञान के अध्ययन का आवश्यक आधार माना। आधुनिक काल में एडमंड बर्क, मोंतेस्क्यू, हेनरी मेन, सीली तथा अन्य विद्वानों ने ऐतिहासिक दृष्टिकोण को व्यवस्थित रूप प्रदान किया। इन विचारकों का मत था कि किसी भी राष्ट्र की राजनीतिक व्यवस्था उसके ऐतिहासिक अनुभवों से निर्मित होती है और इसलिए उसका अध्ययन ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बिना अधूरा रहेगा।

ऐतिहासिक उपागम का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक संस्थाओं और विचारों के विकासक्रम को समझना है। यह केवल घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि उनके कारणों, परिस्थितियों, प्रभावों और परिणामों का भी विश्लेषण करता है। उदाहरण के लिए लोकतंत्र का वर्तमान स्वरूप समझने के लिए प्राचीन यूनान की प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था, इंग्लैंड के संवैधानिक विकास, फ्रांसीसी क्रांति, अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम तथा आधुनिक लोकतांत्रिक आंदोलनों का अध्ययन आवश्यक है। इसी प्रकार भारतीय संविधान को समझने के लिए ब्रिटिश शासन, स्वतंत्रता आंदोलन, विभिन्न संवैधानिक अधिनियमों तथा संविधान सभा की कार्यवाही का अध्ययन करना अनिवार्य माना जाता है। इस प्रकार ऐतिहासिक उपागम वर्तमान को अतीत से जोड़कर देखने की क्षमता प्रदान करता है।

इस उपागम का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि राजनीतिक परिवर्तन क्रमिक होते हैं। समाज में कोई भी राजनीतिक व्यवस्था अचानक नहीं बदलती, बल्कि उसके पीछे दीर्घकालीन ऐतिहासिक प्रक्रियाएँ कार्य करती हैं। राज्य की उत्पत्ति, शासन प्रणालियों का विकास, अधिकारों का विस्तार, लोकतंत्र की स्थापना तथा संवैधानिक संस्थाओं का निर्माण अनेक ऐतिहासिक संघर्षों और अनुभवों का परिणाम होते हैं। इसलिए ऐतिहासिक उपागम राजनीतिक संस्थाओं को स्थिर नहीं मानता, बल्कि उन्हें निरंतर परिवर्तनशील और विकसित होने वाली इकाइयों के रूप में देखता है।

ऐतिहासिक उपागम के अनुसार प्रत्येक राष्ट्र की राजनीतिक व्यवस्था उसकी अपनी ऐतिहासिक परिस्थितियों से प्रभावित होती है। किसी देश की भौगोलिक स्थिति, सामाजिक संरचना, आर्थिक विकास, सांस्कृतिक परंपराएँ, धार्मिक मान्यताएँ तथा ऐतिहासिक अनुभव उसकी राजनीतिक संस्थाओं को आकार देते हैं। उदाहरण के लिए ब्रिटेन में संसदीय शासन का विकास धीरे-धीरे संवैधानिक परंपराओं के माध्यम से हुआ, जबकि फ्रांस में लोकतांत्रिक व्यवस्था क्रांति के माध्यम से स्थापित हुई। अमेरिका का संविधान स्वतंत्रता संग्राम के बाद निर्मित हुआ, जबकि भारत का संविधान स्वतंत्रता आंदोलन और औपनिवेशिक शासन के अनुभवों से प्रभावित रहा। इससे स्पष्ट होता है कि प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था का स्वरूप उसके ऐतिहासिक विकास से जुड़ा हुआ होता है।

राजनीति विज्ञान में ऐतिहासिक उपागम का उपयोग राज्य की उत्पत्ति और विकास को समझने में भी किया जाता है। प्रारंभिक मानव समाज में परिवार, कबीला और जनजाति जैसे छोटे सामाजिक संगठन थे। समय के साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आवश्यकताओं के कारण राज्य का विकास हुआ। ऐतिहासिक उपागम इन सभी चरणों का अध्ययन करके यह स्पष्ट करता है कि आधुनिक राष्ट्र-राज्य तक पहुँचने की प्रक्रिया कितनी लंबी और जटिल रही है। इसी प्रकार राजतंत्र, कुलीनतंत्र, लोकतंत्र, गणतंत्र तथा समाजवादी व्यवस्थाओं के विकास को भी ऐतिहासिक दृष्टिकोण से समझा जाता है।

संविधानों के अध्ययन में ऐतिहासिक उपागम अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है। संविधान केवल विधिक दस्तावेज नहीं होता, बल्कि वह किसी राष्ट्र के ऐतिहासिक अनुभवों, संघर्षों और आकांक्षाओं का प्रतिबिंब होता है। भारतीय संविधान का निर्माण भी एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम था। ब्रिटिश शासन के दौरान पारित विभिन्न अधिनियमों, स्वतंत्रता आंदोलन की विचारधाराओं, सामाजिक सुधार आंदोलनों तथा संविधान सभा की बहसों ने भारतीय संविधान को वर्तमान स्वरूप प्रदान किया। इसी प्रकार अन्य देशों के संविधानों का अध्ययन भी उनके ऐतिहासिक विकास के संदर्भ में किया जाता है।

राजनीतिक विचारधाराओं को समझने में भी ऐतिहासिक उपागम महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उदारवाद, समाजवाद, राष्ट्रवाद, मार्क्सवाद, लोकतंत्र, मानवाधिकार तथा कल्याणकारी राज्य जैसी अवधारणाएँ विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों में विकसित हुईं। यदि इन विचारधाराओं की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अध्ययन न किया जाए, तो उनके वास्तविक अर्थ और उद्देश्य को समझना कठिन हो जाएगा। उदाहरण के लिए औद्योगिक क्रांति और पूँजीवाद के विकास के बिना समाजवाद और मार्क्सवाद को समझना संभव नहीं है। इसी प्रकार उपनिवेशवाद और स्वतंत्रता आंदोलनों के बिना आधुनिक राष्ट्रवाद की व्याख्या अधूरी रहेगी।

ऐतिहासिक उपागम की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह राजनीतिक घटनाओं के कारण और परिणाम दोनों का विश्लेषण करता है। यह केवल यह नहीं बताता कि कोई घटना कब हुई, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि वह क्यों हुई, किन परिस्थितियों में हुई और उसके क्या प्रभाव पड़े। उदाहरण के लिए प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्धों का अध्ययन केवल युद्धों के विवरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनके राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक प्रभावों का भी विश्लेषण किया जाता है। इसी प्रकार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का अध्ययन केवल घटनाओं का क्रम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक परिवर्तन, राजनीतिक नेतृत्व तथा स्वतंत्रता के विचारों के विकास का भी अध्ययन है।

ऐतिहासिक उपागम राजनीति विज्ञान में तुलनात्मक अध्ययन को भी प्रोत्साहित करता है। विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं के ऐतिहासिक विकास की तुलना करके यह समझा जाता है कि समान परिस्थितियों में अलग-अलग राजनीतिक संस्थाएँ क्यों विकसित हुईं। इससे राजनीतिक व्यवस्थाओं की विशेषताओं तथा उनकी सफलताओं और सीमाओं का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण संभव होता है।

ऐतिहासिक उपागम का एक बड़ा गुण यह है कि यह राजनीतिक स्थिरता और परिवर्तन दोनों को समझने में सहायता करता है। कई राजनीतिक संस्थाएँ लंबे समय तक स्थिर रहती हैं क्योंकि वे ऐतिहासिक परंपराओं पर आधारित होती हैं, जबकि कुछ संस्थाएँ समय के साथ बदल जाती हैं क्योंकि समाज की आवश्यकताएँ बदल जाती हैं। इस प्रकार यह उपागम राजनीतिक विकास की निरंतरता और परिवर्तन दोनों का संतुलित अध्ययन प्रस्तुत करता है।

ऐतिहासिक उपागम का व्यावहारिक महत्व भी अत्यंत व्यापक है। नीति-निर्माता, प्रशासनिक अधिकारी, न्यायविद, इतिहासकार तथा राजनीतिक विश्लेषक वर्तमान समस्याओं के समाधान के लिए ऐतिहासिक अनुभवों का उपयोग करते हैं। यदि अतीत की सफलताओं और असफलताओं का अध्ययन किया जाए, तो भविष्य के लिए अधिक प्रभावी और यथार्थवादी नीतियाँ बनाई जा सकती हैं। इसी कारण इतिहास को राजनीति का मार्गदर्शक माना जाता है।

यद्यपि ऐतिहासिक उपागम राजनीति विज्ञान के अध्ययन में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ है, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं। इसकी सबसे प्रमुख सीमा यह है कि यह कई बार वर्तमान की अपेक्षा अतीत पर अधिक बल देता है। आधुनिक राजनीतिक व्यवहार, जनमत, चुनावी प्रवृत्तियों, दबाव समूहों तथा सामाजिक परिवर्तन जैसे समकालीन विषयों का विश्लेषण केवल ऐतिहासिक आधार पर पूर्ण रूप से संभव नहीं होता। इसके अतिरिक्त इतिहास में उपलब्ध स्रोत कभी-कभी अपूर्ण या पक्षपातपूर्ण भी हो सकते हैं, जिससे निष्कर्षों की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।

दूसरी सीमा यह है कि ऐतिहासिक उपागम कई बार यह मान लेता है कि वर्तमान परिस्थितियाँ अतीत की निरंतरता हैं, जबकि आधुनिक समाज में तकनीकी विकास, वैश्वीकरण, डिजिटल संचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा नई आर्थिक व्यवस्थाओं ने राजनीतिक प्रक्रियाओं को बहुत अधिक बदल दिया है। इसलिए केवल ऐतिहासिक अध्ययन के आधार पर वर्तमान राजनीतिक समस्याओं की पूर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती।

तीसरी सीमा यह है कि यह उपागम राजनीतिक व्यवहार की अपेक्षा राजनीतिक संस्थाओं और घटनाओं पर अधिक ध्यान देता है। आधुनिक राजनीति विज्ञान में नागरिकों की भूमिका, मतदान व्यवहार, राजनीतिक संस्कृति, नेतृत्व, मीडिया तथा सामाजिक आंदोलनों का महत्व बढ़ गया है, जिनका अध्ययन अन्य आधुनिक उपागमों द्वारा अधिक प्रभावी ढंग से किया जाता है।

इन सीमाओं के बावजूद ऐतिहासिक उपागम का महत्व आज भी बना हुआ है। आधुनिक राजनीति विज्ञान में व्यवहारवादी, संरचनात्मक, प्रणालीगत तथा उत्तर-व्यवहारवादी उपागमों के विकास के बाद भी किसी भी राजनीतिक संस्था, संविधान, विचारधारा अथवा शासन व्यवस्था को समझने के लिए उसके ऐतिहासिक विकास का अध्ययन आवश्यक माना जाता है। वास्तव में आधुनिक उपागमों ने ऐतिहासिक दृष्टिकोण को अस्वीकार नहीं किया, बल्कि उसे अन्य अध्ययन-पद्धतियों के साथ जोड़कर अधिक व्यापक रूप प्रदान किया है।

भारतीय राजनीति के अध्ययन में ऐतिहासिक उपागम विशेष रूप से उपयोगी है। भारतीय लोकतंत्र, संघीय व्यवस्था, संसदीय शासन, न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग, पंचायती राज, मौलिक अधिकार तथा नीति-निर्देशक तत्वों को समझने के लिए उनके ऐतिहासिक विकास का अध्ययन आवश्यक है। स्वतंत्रता आंदोलन, सामाजिक सुधार आंदोलनों, संविधान सभा की बहसों तथा स्वतंत्र भारत के राजनीतिक अनुभवों ने भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को वर्तमान स्वरूप प्रदान किया है। इसलिए भारतीय राजनीति का अध्ययन ऐतिहासिक दृष्टिकोण के बिना अधूरा माना जाता है।

इस प्रकार ऐतिहासिक उपागम राजनीति विज्ञान के अध्ययन का एक आधारभूत और अत्यंत महत्वपूर्ण दृष्टिकोण है। यह वर्तमान राजनीतिक संस्थाओं और व्यवस्थाओं को उनके ऐतिहासिक विकास के संदर्भ में समझने की क्षमता प्रदान करता है। इसके माध्यम से राज्य, सरकार, संविधान, लोकतंत्र, राजनीतिक विचारधाराओं तथा राजनीतिक प्रक्रियाओं के क्रमिक विकास का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है। यद्यपि आधुनिक राजनीति विज्ञान में अनेक नए उपागम विकसित हो चुके हैं, फिर भी ऐतिहासिक उपागम का महत्व कम नहीं हुआ है। यह आज भी राजनीति विज्ञान के अध्ययन की एक अनिवार्य पद्धति माना जाता है क्योंकि अतीत की गहरी समझ के बिना वर्तमान की सही व्याख्या और भविष्य की यथार्थपूर्ण कल्पना संभव नहीं हो सकती।

Sociological. (समाजशास्त्रीय)

समाजशास्त्रीय उपागम राजनीति विज्ञान के अध्ययन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आधुनिक दृष्टिकोण है, जिसके अनुसार राजनीति को केवल राज्य, सरकार, संविधान अथवा औपचारिक संस्थाओं तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता। राजनीति वास्तव में समाज के भीतर घटित होने वाली एक व्यापक प्रक्रिया है, जो सामाजिक संरचना, सामाजिक संबंधों, परंपराओं, संस्कृति, धर्म, जाति, वर्ग, परिवार, शिक्षा, आर्थिक स्थिति तथा सामाजिक मूल्यों से गहराई से प्रभावित होती है। इस उपागम का मूल विचार यह है कि राजनीतिक जीवन समाज से अलग नहीं हो सकता। राज्य समाज का ही एक संगठित रूप है और उसकी समस्त राजनीतिक गतिविधियाँ समाज के विभिन्न घटकों के साथ निरंतर संपर्क में रहती हैं। इसलिए यदि राजनीति को सही अर्थों में समझना है, तो समाज और उसकी संरचना का अध्ययन अनिवार्य हो जाता है। समाजशास्त्रीय उपागम राजनीति विज्ञान को केवल संस्थागत अध्ययन तक सीमित नहीं रखता, बल्कि यह राजनीतिक व्यवहार, सामाजिक प्रक्रियाओं तथा सामाजिक शक्तियों के माध्यम से राजनीति की वास्तविक प्रकृति को समझने का प्रयास करता है।

समाजशास्त्रीय उपागम का विकास विशेष रूप से उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में समाजशास्त्र के विकास के साथ हुआ। जब समाजशास्त्र एक स्वतंत्र सामाजिक विज्ञान के रूप में विकसित हुआ, तब यह स्पष्ट हुआ कि मनुष्य का राजनीतिक व्यवहार उसके सामाजिक परिवेश से अत्यधिक प्रभावित होता है। ऑगस्त कॉम्ट, एमिल दुर्खीम, मैक्स वेबर, कार्ल मार्क्स, हरबर्ट स्पेंसर तथा अनेक अन्य समाजशास्त्रियों ने समाज और राजनीतिक व्यवस्था के बीच गहरे संबंधों को स्पष्ट किया। इनके विचारों ने राजनीति विज्ञान को यह समझने की नई दिशा दी कि राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन केवल संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि उनके पीछे कार्य करने वाली सामाजिक शक्तियों का विश्लेषण भी आवश्यक है। आधुनिक राजनीतिक समाजशास्त्र का विकास इसी दृष्टिकोण का परिणाम है।

समाजशास्त्रीय उपागम का मूल आधार यह है कि समाज और राजनीति परस्पर अविभाज्य हैं। समाज में जो सामाजिक संरचना विद्यमान होती है, वही राजनीतिक व्यवस्था को भी प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए किसी समाज में जाति व्यवस्था, वर्ग विभाजन, धार्मिक विविधता, भाषाई पहचान, सांस्कृतिक परंपराएँ अथवा आर्थिक असमानता जैसी परिस्थितियाँ वहाँ की राजनीतिक प्रक्रियाओं को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। चुनावों में मतदान का व्यवहार, राजनीतिक दलों का गठन, नेतृत्व का चयन, जनमत का निर्माण तथा नीतियों का निर्माण सामाजिक परिस्थितियों के प्रभाव में होता है। इसलिए समाजशास्त्रीय उपागम राजनीति को सामाजिक जीवन के व्यापक संदर्भ में समझने का प्रयास करता है।

इस उपागम के अनुसार राजनीतिक संस्थाएँ समाज की आवश्यकताओं के अनुसार विकसित होती हैं। संसद, न्यायपालिका, प्रशासन, स्थानीय स्वशासन, राजनीतिक दल तथा अन्य संस्थाएँ समाज की समस्याओं का समाधान करने के लिए अस्तित्व में आती हैं। यदि समाज बदलता है तो उसकी राजनीतिक संस्थाओं में भी परिवर्तन होता है। उदाहरण के लिए औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, शिक्षा का प्रसार, संचार क्रांति तथा वैश्वीकरण जैसी सामाजिक प्रक्रियाओं ने आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को गहराई से प्रभावित किया है। इससे स्पष्ट होता है कि राजनीति और समाज का विकास समानांतर रूप से चलता है।

समाजशास्त्रीय उपागम में सामाजिक संस्थाओं का अध्ययन विशेष महत्व रखता है। परिवार, धर्म, शिक्षा, जाति, वर्ग, समुदाय, मीडिया तथा सामाजिक संगठन व्यक्ति के राजनीतिक विचारों और व्यवहार को प्रभावित करते हैं। परिवार व्यक्ति का पहला सामाजिक समूह होता है, जहाँ उसे अनुशासन, अधिकार, कर्तव्य तथा नेतृत्व का प्रारंभिक अनुभव प्राप्त होता है। शिक्षा व्यक्ति में राजनीतिक जागरूकता और नागरिक चेतना का विकास करती है। धर्म और संस्कृति सामाजिक मूल्यों को प्रभावित करते हैं, जिनका प्रभाव राजनीतिक निर्णयों पर भी पड़ता है। इस प्रकार समाजशास्त्रीय उपागम राजनीतिक व्यवहार को सामाजिक संस्थाओं के संदर्भ में समझने का प्रयास करता है।

जाति और वर्ग समाजशास्त्रीय उपागम के महत्वपूर्ण अध्ययन क्षेत्र हैं। विशेष रूप से भारतीय समाज में जाति व्यवस्था का राजनीतिक जीवन पर गहरा प्रभाव रहा है। चुनावों में उम्मीदवारों का चयन, मतदाताओं की राजनीतिक प्राथमिकताएँ, सामाजिक प्रतिनिधित्व तथा आरक्षण जैसी व्यवस्थाएँ सामाजिक संरचना से जुड़ी हुई हैं। इसी प्रकार आर्थिक वर्गों के हित भी राजनीतिक नीतियों को प्रभावित करते हैं। श्रमिक, किसान, व्यापारी, उद्योगपति तथा मध्यवर्ग के हितों के आधार पर राजनीतिक दल अपनी नीतियाँ बनाते हैं। समाजशास्त्रीय उपागम इन सभी सामाजिक कारकों का विश्लेषण करके राजनीतिक प्रक्रियाओं को अधिक यथार्थ रूप में समझता है।

समाजशास्त्रीय उपागम के अनुसार राजनीतिक शक्ति का वितरण भी सामाजिक संरचना से प्रभावित होता है। समाज में जिन वर्गों या समूहों के पास आर्थिक, शैक्षिक या सामाजिक संसाधन अधिक होते हैं, वे सामान्यतः राजनीतिक शक्ति पर भी अधिक प्रभाव डालते हैं। इसलिए सत्ता केवल संवैधानिक संस्थाओं में सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज के विभिन्न प्रभावशाली समूहों में भी विद्यमान होती है। दबाव समूह, सामाजिक आंदोलन, व्यापारिक संगठन, किसान संगठन, श्रमिक संघ तथा नागरिक समाज की संस्थाएँ राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करती हैं। इस प्रकार यह उपागम राजनीति को केवल सरकार के कार्यों तक सीमित न रखकर समाज में विद्यमान शक्ति संबंधों का भी अध्ययन करता है।

समाजशास्त्रीय उपागम राजनीतिक संस्कृति को भी अत्यधिक महत्व देता है। राजनीतिक संस्कृति से तात्पर्य नागरिकों की राजनीतिक मान्यताओं, मूल्यों, विश्वासों, परंपराओं तथा राजनीतिक व्यवहार की उन प्रवृत्तियों से है जो समाज में विकसित होती हैं। लोकतांत्रिक संस्कृति, नागरिक भागीदारी, राजनीतिक सहिष्णुता, राष्ट्रीय एकता तथा संविधान के प्रति सम्मान जैसी प्रवृत्तियाँ राजनीतिक व्यवस्था को स्थिर और प्रभावी बनाती हैं। यदि किसी समाज में राजनीतिक जागरूकता कम हो, सामाजिक विभाजन अधिक हो अथवा लोकतांत्रिक मूल्यों का अभाव हो, तो राजनीतिक संस्थाएँ भी प्रभावी ढंग से कार्य नहीं कर पातीं। इसलिए समाजशास्त्रीय उपागम राजनीतिक संस्कृति को राजनीति विज्ञान का महत्वपूर्ण आधार मानता है।

यह उपागम सामाजिक परिवर्तन और राजनीतिक परिवर्तन के संबंधों का भी अध्ययन करता है। समाज में शिक्षा, औद्योगिकीकरण, तकनीकी विकास, संचार साधनों का विस्तार, महिलाओं की भागीदारी, नगरीकरण तथा वैश्वीकरण जैसी प्रक्रियाएँ राजनीतिक व्यवस्था को बदल देती हैं। उदाहरण के लिए शिक्षा के प्रसार से नागरिक अधिक जागरूक होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप लोकतंत्र मजबूत होता है। इसी प्रकार सूचना प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया ने राजनीतिक संचार तथा जनमत निर्माण की प्रक्रिया को पूरी तरह बदल दिया है। समाजशास्त्रीय उपागम इन परिवर्तनों का विश्लेषण करके राजनीति की नई प्रवृत्तियों को समझने का प्रयास करता है।

राजनीतिक दलों और चुनावों का अध्ययन भी समाजशास्त्रीय उपागम का महत्वपूर्ण भाग है। यह उपागम केवल चुनावी प्रक्रिया का अध्ययन नहीं करता, बल्कि यह जानने का प्रयास करता है कि मतदाता किन सामाजिक कारणों से किसी दल या उम्मीदवार का समर्थन करते हैं। जाति, वर्ग, धर्म, भाषा, शिक्षा, आय, निवास क्षेत्र तथा सामाजिक पहचान मतदान व्यवहार को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक माने जाते हैं। इसलिए समाजशास्त्रीय उपागम चुनावों को केवल संवैधानिक प्रक्रिया न मानकर सामाजिक प्रक्रिया के रूप में देखता है।

समाजशास्त्रीय उपागम का एक प्रमुख गुण यह है कि यह राजनीति विज्ञान को अधिक यथार्थवादी बनाता है। यह केवल कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों का अध्ययन नहीं करता, बल्कि यह समझने का प्रयास करता है कि वास्तविक जीवन में राजनीतिक संस्थाएँ कैसे कार्य करती हैं और समाज की कौन-सी शक्तियाँ उन्हें प्रभावित करती हैं। इससे राजनीति विज्ञान केवल सैद्धांतिक विषय न रहकर व्यवहारिक और अनुभवजन्य अध्ययन का विषय बन जाता है।

इस उपागम की सहायता से लोकतंत्र की सफलता और असफलता के कारणों को भी समझा जा सकता है। किसी देश में लोकतंत्र केवल संविधान के कारण सफल नहीं होता, बल्कि उसके पीछे नागरिकों की सामाजिक चेतना, राजनीतिक संस्कृति, शिक्षा, आर्थिक विकास तथा सामाजिक समानता जैसी परिस्थितियाँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। समाजशास्त्रीय उपागम इन सभी कारकों का समन्वित अध्ययन करता है।

समाजशास्त्रीय उपागम का आधुनिक राजनीति विज्ञान में अत्यंत व्यापक उपयोग होता है। राजनीतिक समाजशास्त्र, राजनीतिक संस्कृति, मतदान व्यवहार, नेतृत्व अध्ययन, सामाजिक आंदोलन, पहचान की राजनीति, लैंगिक राजनीति, ग्रामीण और शहरी राजनीति, जनसंचार तथा नागरिक समाज जैसे अनेक आधुनिक अध्ययन क्षेत्रों का विकास इसी उपागम के प्रभाव से हुआ है। आज किसी भी राजनीतिक समस्या का विश्लेषण सामाजिक संदर्भ के बिना अधूरा माना जाता है।

यद्यपि समाजशास्त्रीय उपागम अत्यंत उपयोगी है, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं। इसकी सबसे प्रमुख सीमा यह मानी जाती है कि यह कई बार राजनीतिक संस्थाओं के स्वतंत्र महत्व को कम करके सामाजिक कारकों को अत्यधिक महत्व देता है। कुछ परिस्थितियों में संविधान, कानून तथा न्यायपालिका जैसे औपचारिक संस्थागत तत्व भी राजनीतिक व्यवस्था को निर्णायक रूप से प्रभावित करते हैं, जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। यदि राजनीति को केवल सामाजिक संरचना का परिणाम मान लिया जाए, तो राज्य की स्वतंत्र भूमिका को पर्याप्त महत्व नहीं मिल पाता।

दूसरी सीमा यह है कि समाजशास्त्रीय उपागम सामाजिक कारकों की विविधता के कारण कभी-कभी स्पष्ट निष्कर्ष प्रस्तुत नहीं कर पाता। अलग-अलग समाजों में समान सामाजिक परिस्थितियों के बावजूद राजनीतिक परिणाम भिन्न हो सकते हैं। इसलिए केवल सामाजिक आधार पर राजनीतिक घटनाओं की पूर्ण व्याख्या करना हमेशा संभव नहीं होता।

तीसरी सीमा यह है कि यह उपागम कभी-कभी राजनीतिक निर्णयों में व्यक्तित्व, नेतृत्व, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों तथा आकस्मिक घटनाओं की भूमिका को पर्याप्त महत्व नहीं देता। जबकि व्यवहार में कई बार किसी महान नेता, युद्ध, आर्थिक संकट या अंतरराष्ट्रीय परिवर्तन के कारण राजनीतिक व्यवस्था में बड़े बदलाव आ जाते हैं।

इन सीमाओं के बावजूद समाजशास्त्रीय उपागम का महत्व निरंतर बढ़ता जा रहा है। आधुनिक लोकतांत्रिक समाजों में राजनीति को सामाजिक जीवन से अलग करके नहीं समझा जा सकता। सामाजिक न्याय, समानता, आरक्षण, महिला सशक्तिकरण, मानवाधिकार, सामाजिक आंदोलनों, नागरिक समाज, डिजिटल समाज तथा वैश्वीकरण जैसे विषयों के अध्ययन में समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है। भारतीय राजनीति के अध्ययन में भी यह उपागम विशेष महत्व रखता है क्योंकि भारत जैसे बहुलतावादी समाज में जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रीयता तथा सामाजिक विविधता का राजनीतिक प्रक्रियाओं पर गहरा प्रभाव है।

इस प्रकार समाजशास्त्रीय उपागम राजनीति विज्ञान को व्यापक सामाजिक संदर्भ में समझने की दृष्टि प्रदान करता है। यह स्पष्ट करता है कि राजनीति केवल राज्य और सरकार की गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज की समस्त संरचनाओं, मूल्यों, परंपराओं तथा सामाजिक संबंधों से गहराई से जुड़ी हुई है। यह उपागम राजनीति विज्ञान को अधिक यथार्थवादी, व्यवहारिक तथा समकालीन बनाता है और यह समझने में सहायता करता है कि किसी भी राजनीतिक व्यवस्था की वास्तविक शक्ति उसके समाज में निहित होती है। आधुनिक राजनीति विज्ञान में समाजशास्त्रीय उपागम का महत्व इसलिए अत्यधिक है क्योंकि यह राजनीति और समाज के बीच विद्यमान जटिल संबंधों का समग्र, गहन और वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

Philosophical or Normative. Modern Approaches: Behaviouralism. (दार्शनिक अथवा मानकात्मक उपागम। आधुनिक उपागम: व्यवहारवाद)

राजनीति विज्ञान के अध्ययन का विकास समय के साथ निरंतर होता रहा है। प्रारंभिक काल में राजनीति विज्ञान का अध्ययन मुख्यतः आदर्शों, नैतिक मूल्यों तथा राज्य के सर्वोत्तम स्वरूप की खोज पर आधारित था। इस प्रकार के अध्ययन को दार्शनिक अथवा मानकात्मक उपागम कहा गया। बाद में समाज, विज्ञान तथा अनुसंधान की नई प्रवृत्तियों के विकास के साथ यह अनुभव किया गया कि राजनीति विज्ञान को केवल आदर्शों के आधार पर नहीं समझा जा सकता, बल्कि वास्तविक राजनीतिक व्यवहार, अनुभवजन्य तथ्यों तथा वैज्ञानिक विश्लेषण का भी अध्ययन आवश्यक है। इसी आवश्यकता के परिणामस्वरूप आधुनिक उपागमों का विकास हुआ, जिनमें व्यवहारवाद सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस प्रकार राजनीति विज्ञान के अध्ययन में दार्शनिक अथवा मानकात्मक उपागम और व्यवहारवादी उपागम दो महत्वपूर्ण चरणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। पहला उपागम यह बताता है कि राजनीति कैसी होनी चाहिए, जबकि दूसरा यह समझने का प्रयास करता है कि राजनीति वास्तव में कैसी है और मनुष्य वास्तविक जीवन में राजनीतिक व्यवहार किस प्रकार करता है।

दार्शनिक अथवा मानकात्मक उपागम राजनीति विज्ञान के अध्ययन की सबसे प्राचीन पद्धति है। यह उपागम इस विश्वास पर आधारित है कि राजनीति का अंतिम उद्देश्य मानव जीवन को अधिक न्यायपूर्ण, नैतिक तथा कल्याणकारी बनाना है। इस दृष्टिकोण में राज्य, सरकार, कानून, न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा अधिकार जैसी अवधारणाओं का अध्ययन केवल उनके वर्तमान स्वरूप के आधार पर नहीं किया जाता, बल्कि यह विचार किया जाता है कि उनका आदर्श स्वरूप क्या होना चाहिए। इस उपागम के अनुसार राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने या शासन चलाने की कला नहीं है, बल्कि वह समाज में नैतिक व्यवस्था स्थापित करने का माध्यम भी है। इसलिए राजनीति विज्ञान को दर्शनशास्त्र और नैतिकता से घनिष्ठ रूप से जोड़ा गया।

दार्शनिक अथवा मानकात्मक उपागम का विकास प्राचीन यूनान में प्लेटो और अरस्तू जैसे महान विचारकों से प्रारंभ हुआ। प्लेटो ने आदर्श राज्य की कल्पना करते हुए न्याय को राज्य का सर्वोच्च उद्देश्य माना। उनके अनुसार शासन उन व्यक्तियों के हाथों में होना चाहिए जो ज्ञान, विवेक और नैतिकता से युक्त हों। अरस्तू ने राज्य को मानव जीवन की सर्वोच्च संस्था माना और कहा कि उसका उद्देश्य केवल जीवन की रक्षा करना नहीं, बल्कि उत्तम जीवन की प्राप्ति कराना है। आधुनिक काल में हॉब्स, लॉक, रूसो, कांट, हेगेल, टी.एच. ग्रीन, महात्मा गांधी तथा डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे अनेक विचारकों ने भी राज्य और राजनीति के आदर्श स्वरूप पर गहन विचार प्रस्तुत किए। इन सभी का उद्देश्य ऐसी राजनीतिक व्यवस्था की कल्पना करना था जो मानव गरिमा, न्याय और स्वतंत्रता की रक्षा कर सके।

मानकात्मक उपागम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह मूल्यपरक होता है। इसमें न्याय, नैतिकता, समानता, स्वतंत्रता, मानवाधिकार, सामाजिक कल्याण तथा आदर्श शासन जैसी अवधारणाओं को सर्वोच्च महत्व दिया जाता है। यह उपागम केवल यह नहीं पूछता कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था कैसी है, बल्कि यह भी प्रश्न करता है कि क्या वह न्यायपूर्ण है, क्या वह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है, क्या उसमें समान अवसर उपलब्ध हैं और क्या वह मानव कल्याण को बढ़ावा देती है। इस प्रकार यह उपागम राजनीति विज्ञान को नैतिक दर्शन के साथ जोड़ता है।

मानकात्मक उपागम का एक प्रमुख गुण यह है कि इसने राजनीति विज्ञान को उच्च आदर्श प्रदान किए। लोकतंत्र, मानवाधिकार, विधि का शासन, समानता, सामाजिक न्याय तथा कल्याणकारी राज्य जैसी अवधारणाएँ इसी प्रकार के दार्शनिक चिंतन से विकसित हुईं। यदि राजनीति विज्ञान केवल तथ्यों का अध्ययन करता और आदर्शों की उपेक्षा करता, तो समाज के सुधार और प्रगति की दिशा निर्धारित करना कठिन हो जाता। इसलिए इस उपागम ने राजनीतिक चिंतन को नैतिक आधार प्रदान किया।

इसके साथ ही इस उपागम की कुछ सीमाएँ भी हैं। इसकी सबसे बड़ी सीमा यह है कि यह वास्तविक राजनीतिक व्यवहार की अपेक्षा आदर्शों पर अधिक बल देता है। विभिन्न दार्शनिकों ने न्याय, स्वतंत्रता तथा राज्य के उद्देश्य की अलग-अलग व्याख्या की है, जिसके कारण इस उपागम में निष्कर्ष प्रायः व्यक्तिपरक हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त यह उपागम अनुभवजन्य तथ्यों तथा वैज्ञानिक अनुसंधान की अपेक्षा तर्क और विचार पर अधिक निर्भर करता है। आधुनिक युग में जब राजनीति अधिक जटिल और व्यवहारिक हो गई, तब यह अनुभव किया गया कि केवल आदर्शों के आधार पर राजनीति का अध्ययन पर्याप्त नहीं है।

बीसवीं शताब्दी के मध्य में राजनीति विज्ञान में व्यवहारवादी आंदोलन का उदय हुआ, जिसने अध्ययन की दिशा को पूरी तरह बदल दिया। व्यवहारवाद आधुनिक उपागमों का सबसे प्रभावशाली स्वरूप माना जाता है। इसका विकास विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में हुआ। चार्ल्स मेरियम, हैरॉल्ड लासवेल, डेविड ईस्टन, गैब्रियल आल्मंड, रॉबर्ट डाहल तथा अन्य विद्वानों ने इस दृष्टिकोण को विकसित किया। व्यवहारवाद का मूल उद्देश्य राजनीति विज्ञान को अधिक वैज्ञानिक, वस्तुनिष्ठ तथा अनुभवजन्य बनाना था। इसके समर्थकों का मत था कि राजनीति विज्ञान को केवल आदर्शों और दार्शनिक कल्पनाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि वास्तविक राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन करना चाहिए।

व्यवहारवाद का मूल आधार यह है कि राजनीति का केंद्र राजनीतिक संस्थाएँ नहीं, बल्कि राजनीतिक व्यवहार है। व्यक्ति कैसे मतदान करता है, नेता किस प्रकार निर्णय लेते हैं, राजनीतिक दल जनता को कैसे प्रभावित करते हैं, दबाव समूह किस प्रकार शासन पर प्रभाव डालते हैं, नागरिकों की राजनीतिक मान्यताएँ क्या हैं तथा जनमत कैसे बनता है—इन सभी प्रश्नों का अध्ययन व्यवहारवाद के अंतर्गत किया जाता है। इस प्रकार यह उपागम राजनीति विज्ञान को अधिक व्यावहारिक और यथार्थवादी बनाता है।

व्यवहारवाद अनुभवजन्य तथ्यों पर आधारित अध्ययन का समर्थन करता है। इसके अनुसार किसी भी निष्कर्ष तक पहुँचने से पहले वास्तविक तथ्यों का संग्रह, सर्वेक्षण, साक्षात्कार, प्रश्नावली, सांख्यिकीय विश्लेषण तथा वैज्ञानिक अनुसंधान की विधियों का उपयोग किया जाना चाहिए। इससे राजनीति विज्ञान में वस्तुनिष्ठता बढ़ती है और निष्कर्ष अधिक विश्वसनीय बनते हैं। व्यवहारवादी विद्वानों का विश्वास था कि राजनीति विज्ञान को भी प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति वैज्ञानिक पद्धति अपनानी चाहिए।

व्यवहारवाद की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह अंतर्विषयी दृष्टिकोण अपनाता है। राजनीति विज्ञान को समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र, मानवशास्त्र तथा सांख्यिकी जैसे अन्य सामाजिक विज्ञानों से जोड़कर अध्ययन किया जाता है। उदाहरण के लिए मतदान व्यवहार को समझने के लिए केवल संवैधानिक व्यवस्था का अध्ययन पर्याप्त नहीं होता, बल्कि मतदाताओं की सामाजिक स्थिति, आर्थिक स्तर, शिक्षा, धर्म, जाति, मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों तथा सांस्कृतिक मूल्यों का भी अध्ययन आवश्यक होता है। व्यवहारवाद इन सभी कारकों को महत्व देता है।

व्यवहारवाद राजनीतिक संस्कृति और राजनीतिक समाजीकरण के अध्ययन को भी महत्वपूर्ण मानता है। किसी समाज में नागरिकों के राजनीतिक मूल्य, विश्वास, परंपराएँ तथा राजनीतिक भागीदारी की प्रवृत्तियाँ उसकी राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करती हैं। इसी प्रकार परिवार, विद्यालय, मीडिया तथा सामाजिक संस्थाएँ व्यक्ति के राजनीतिक विचारों का निर्माण करती हैं। व्यवहारवाद इन सभी प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन करता है।

व्यवहारवाद का एक प्रमुख उद्देश्य राजनीति विज्ञान को भविष्यवाणी करने योग्य विज्ञान बनाना था। यदि राजनीतिक व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए, तो यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विशेष परिस्थितियों में नागरिक किस प्रकार व्यवहार करेंगे, चुनाव परिणाम किस दिशा में जा सकते हैं अथवा राजनीतिक परिवर्तन की संभावनाएँ क्या हो सकती हैं। इस प्रकार व्यवहारवाद राजनीति विज्ञान को अधिक उपयोगी और व्यावहारिक बनाने का प्रयास करता है।

व्यवहारवाद की अनेक महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं। इसने राजनीति विज्ञान में अनुसंधान की वैज्ञानिक पद्धतियों का विकास किया, मतदान व्यवहार, नेतृत्व, राजनीतिक संस्कृति, राजनीतिक संचार, दबाव समूह, जनमत तथा नीति-निर्माण जैसे नए अध्ययन क्षेत्रों को जन्म दिया। इससे राजनीति विज्ञान केवल संविधान और सरकार का अध्ययन करने वाला विषय न रहकर मानव व्यवहार का अध्ययन करने वाला व्यापक सामाजिक विज्ञान बन गया।

यद्यपि व्यवहारवाद ने राजनीति विज्ञान में क्रांतिकारी परिवर्तन किए, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ भी सामने आईं। इसकी सबसे बड़ी सीमा यह मानी गई कि यह मूल्यों और नैतिकता की उपेक्षा करता है। व्यवहारवाद यह बताता है कि राजनीति वास्तव में कैसी है, लेकिन यह नहीं बताता कि राजनीति कैसी होनी चाहिए। यदि राजनीति में न्याय, समानता और मानवाधिकार जैसे मूल्यों की उपेक्षा कर दी जाए, तो राजनीति विज्ञान केवल आँकड़ों और तथ्यों का अध्ययन बनकर रह जाएगा।

दूसरी सीमा यह है कि व्यवहारवाद अत्यधिक वैज्ञानिक बनने के प्रयास में कभी-कभी राजनीति की नैतिक और दार्शनिक जटिलताओं की उपेक्षा कर देता है। मानव व्यवहार हमेशा निश्चित नियमों का पालन नहीं करता, इसलिए राजनीतिक घटनाओं की भविष्यवाणी हमेशा सटीक नहीं हो सकती। इसके अतिरिक्त अनेक राजनीतिक निर्णय भावनाओं, विचारधाराओं तथा नैतिक मूल्यों से भी प्रभावित होते हैं, जिन्हें केवल सांख्यिकीय विश्लेषण द्वारा पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।

इन्हीं सीमाओं के कारण बाद में उत्तर-व्यवहारवाद का विकास हुआ, जिसने यह स्पष्ट किया कि राजनीति विज्ञान में वैज्ञानिकता और मूल्य दोनों का संतुलित समावेश आवश्यक है। आधुनिक राजनीति विज्ञान में यह स्वीकार किया गया कि न तो केवल दार्शनिक उपागम पर्याप्त है और न ही केवल व्यवहारवादी दृष्टिकोण। राजनीति के अध्ययन में आदर्शों और वास्तविकताओं दोनों का समान महत्व है।

भारतीय राजनीति के अध्ययन में भी इन दोनों उपागमों की उपयोगिता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। भारतीय संविधान, मौलिक अधिकार, सामाजिक न्याय, लोकतंत्र तथा धर्मनिरपेक्षता जैसी अवधारणाएँ दार्शनिक और मानकात्मक चिंतन पर आधारित हैं, जबकि चुनाव, मतदान व्यवहार, राजनीतिक दलों की गतिविधियाँ, नेतृत्व, सामाजिक आंदोलनों तथा जनमत के अध्ययन में व्यवहारवादी दृष्टिकोण अधिक उपयोगी सिद्ध होता है। दोनों मिलकर भारतीय राजनीतिक व्यवस्था की समग्र समझ प्रदान करते हैं।

इस प्रकार दार्शनिक अथवा मानकात्मक उपागम और आधुनिक उपागम के रूप में व्यवहारवाद राजनीति विज्ञान के अध्ययन की दो महत्वपूर्ण दिशाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। पहला उपागम राजनीति के आदर्श स्वरूप, नैतिक मूल्यों तथा न्यायपूर्ण समाज की स्थापना पर बल देता है, जबकि दूसरा उपागम वास्तविक राजनीतिक व्यवहार, अनुभवजन्य तथ्यों तथा वैज्ञानिक अनुसंधान को महत्व देता है। आधुनिक राजनीति विज्ञान में इन दोनों दृष्टिकोणों का संतुलित उपयोग ही सबसे उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि राजनीति केवल आदर्शों का विषय नहीं है और न ही केवल व्यवहार का। राजनीति का वास्तविक अध्ययन तभी संभव है जब उसके नैतिक उद्देश्यों और व्यवहारिक स्वरूप दोनों का समन्वित, गहन और वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाए।

Post Behaviouralism. (उत्तर-व्यवहारवाद)

उत्तर-व्यवहारवाद राजनीति विज्ञान के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण आधुनिक उपागम है, जिसका विकास व्यवहारवाद की सीमाओं और उसकी आलोचनाओं के परिणामस्वरूप हुआ। बीसवीं शताब्दी के मध्य में व्यवहारवाद ने राजनीति विज्ञान को वैज्ञानिक, वस्तुनिष्ठ तथा अनुभवजन्य आधार प्रदान करने का प्रयास किया। उसने राजनीतिक अध्ययन में सर्वेक्षण, सांख्यिकीय विश्लेषण, प्रश्नावली, साक्षात्कार तथा व्यवहार संबंधी अनुसंधान को अत्यधिक महत्व दिया। इससे राजनीति विज्ञान अधिक व्यवस्थित और वैज्ञानिक बना, परंतु समय के साथ यह अनुभव किया गया कि केवल वैज्ञानिक पद्धतियों और तथ्यों पर आधारित अध्ययन राजनीति विज्ञान की संपूर्ण आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकता। राजनीति केवल तथ्यों, आँकड़ों और व्यवहार का विषय नहीं है, बल्कि यह न्याय, स्वतंत्रता, समानता, मानवाधिकार, नैतिकता और सामाजिक कल्याण जैसे मूल्यों से भी गहराई से जुड़ी हुई है। जब व्यवहारवाद इन मूल्यों की उपेक्षा करने लगा और राजनीति विज्ञान को अत्यधिक तकनीकी तथा मूल्य-निरपेक्ष बनाने लगा, तब उसके विरोध में एक नए दृष्टिकोण का विकास हुआ, जिसे उत्तर-व्यवहारवाद कहा गया। यह उपागम राजनीति विज्ञान में वैज्ञानिकता और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।

उत्तर-व्यवहारवाद का उदय विशेष रूप से 1960 के दशक के उत्तरार्ध में हुआ। उस समय विश्व अनेक गंभीर समस्याओं से गुजर रहा था। युद्ध, परमाणु हथियारों की होड़, नस्लीय भेदभाव, गरीबी, सामाजिक असमानता, मानवाधिकारों का उल्लंघन, राजनीतिक अस्थिरता तथा विकासशील देशों की समस्याओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन पर्याप्त नहीं है। राजनीति विज्ञान को इन वास्तविक समस्याओं के समाधान की दिशा भी दिखानी चाहिए। इसी पृष्ठभूमि में प्रसिद्ध राजनीतिक वैज्ञानिक डेविड ईस्टन ने उत्तर-व्यवहारवाद का समर्थन किया और इसे राजनीति विज्ञान में एक नई बौद्धिक क्रांति के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि राजनीति विज्ञान का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज की समस्याओं के समाधान में सक्रिय योगदान देना भी होना चाहिए।

उत्तर-व्यवहारवाद का मूल विचार यह है कि राजनीति विज्ञान में तथ्यों और मूल्यों दोनों का समान महत्व है। व्यवहारवाद ने यह कहा था कि राजनीति विज्ञान को केवल यह अध्ययन करना चाहिए कि राजनीतिक घटनाएँ वास्तव में कैसी हैं, जबकि उत्तर-व्यवहारवाद यह स्वीकार करता है कि यह जानना भी आवश्यक है कि राजनीतिक व्यवस्था कैसी होनी चाहिए। इसलिए यह उपागम वैज्ञानिक अनुसंधान का विरोध नहीं करता, बल्कि यह मानता है कि वैज्ञानिक ज्ञान का उपयोग समाज के कल्याण, न्याय और मानव हित के लिए किया जाना चाहिए। इस प्रकार उत्तर-व्यवहारवाद व्यवहारवाद और मानकात्मक दृष्टिकोण के बीच संतुलन स्थापित करता है।

उत्तर-व्यवहारवाद की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसकी प्रासंगिकता है। इस उपागम के अनुसार राजनीति विज्ञान का अध्ययन केवल शैक्षणिक जिज्ञासा तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसका संबंध समाज की वास्तविक समस्याओं से होना चाहिए। यदि किसी समाज में गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, असमानता, जातीय संघर्ष, लैंगिक भेदभाव या पर्यावरणीय संकट जैसी समस्याएँ विद्यमान हैं, तो राजनीति विज्ञान का अध्ययन इन समस्याओं के कारणों को समझने के साथ-साथ उनके समाधान की दिशा भी प्रस्तुत करे। इसलिए उत्तर-व्यवहारवाद राजनीति विज्ञान को समाजोपयोगी और व्यावहारिक विज्ञान के रूप में विकसित करना चाहता है।

इस उपागम का दूसरा प्रमुख सिद्धांत प्रतिबद्धता है। उत्तर-व्यवहारवाद यह मानता है कि राजनीतिक वैज्ञानिक केवल निष्पक्ष पर्यवेक्षक बनकर नहीं रह सकता। उसे मानव कल्याण, लोकतंत्र, न्याय, समानता तथा मानवाधिकारों के पक्ष में नैतिक प्रतिबद्धता रखनी चाहिए। यदि समाज में अन्याय या शोषण हो रहा है, तो राजनीतिक वैज्ञानिक का दायित्व केवल उसका वर्णन करना नहीं, बल्कि उसके विरुद्ध विचार प्रस्तुत करना भी है। इस प्रकार यह उपागम राजनीति विज्ञान को सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ता है।

उत्तर-व्यवहारवाद वैज्ञानिक अनुसंधान को स्वीकार करता है, परंतु उसका उद्देश्य केवल तथ्यों का संग्रह करना नहीं है। यह मानता है कि तथ्य तभी सार्थक हैं जब उनका उपयोग मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए किया जाए। इसलिए अनुसंधान को समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए। केवल आँकड़े एकत्रित करना, जटिल सांख्यिकीय विश्लेषण करना या तकनीकी निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं है, यदि उनका समाज के जीवन पर कोई सकारात्मक प्रभाव न पड़े। उत्तर-व्यवहारवाद अनुसंधान को मानव हितों से जोड़ने पर बल देता है।

यह उपागम राजनीति विज्ञान में नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना करता है। व्यवहारवाद ने मूल्य-निरपेक्षता का समर्थन किया था, परंतु उत्तर-व्यवहारवाद के अनुसार राजनीति विज्ञान में न्याय, समानता, स्वतंत्रता, मानव गरिमा, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा लोकतांत्रिक आदर्शों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। किसी भी राजनीतिक व्यवस्था का मूल्यांकन केवल उसकी कार्यक्षमता के आधार पर नहीं, बल्कि इस आधार पर भी किया जाना चाहिए कि वह मानव जीवन को कितना बेहतर बनाती है।

उत्तर-व्यवहारवाद राजनीतिक वैज्ञानिक की भूमिका को भी पुनर्परिभाषित करता है। उसके अनुसार राजनीतिक वैज्ञानिक केवल सिद्धांतकार या शोधकर्ता नहीं होता, बल्कि वह समाज का उत्तरदायी बुद्धिजीवी भी होता है। उसे अपने ज्ञान का उपयोग सार्वजनिक नीतियों के निर्माण, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा तथा सामाजिक समस्याओं के समाधान में करना चाहिए। इस दृष्टिकोण में राजनीति विज्ञान का अध्ययन केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह समाज और शासन की वास्तविक आवश्यकताओं से जुड़ जाता है।

इस उपागम का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह राजनीति विज्ञान को अधिक मानवीय बनाता है। राजनीति का संबंध मनुष्य से है, इसलिए उसका अध्ययन भी मानव जीवन की वास्तविक आवश्यकताओं, भावनाओं, आकांक्षाओं और समस्याओं के संदर्भ में होना चाहिए। यदि राजनीति विज्ञान केवल तकनीकी अनुसंधान और सांख्यिकीय विश्लेषण तक सीमित हो जाए, तो वह अपने मूल उद्देश्य से दूर हो जाएगा। उत्तर-व्यवहारवाद इस स्थिति का विरोध करता है और राजनीति विज्ञान को मानव-केंद्रित दृष्टिकोण प्रदान करता है।

उत्तर-व्यवहारवाद का लोकतंत्र के अध्ययन में विशेष महत्व है। यह केवल चुनावी आँकड़ों या मतदान व्यवहार का विश्लेषण नहीं करता, बल्कि यह भी देखता है कि लोकतंत्र नागरिकों को वास्तविक स्वतंत्रता, समान अवसर और सामाजिक न्याय प्रदान कर रहा है या नहीं। यदि लोकतंत्र केवल औपचारिक संस्थाओं तक सीमित रह जाए और समाज में व्यापक असमानता बनी रहे, तो उत्तर-व्यवहारवाद उसे अधूरा लोकतंत्र मानता है। इसलिए यह लोकतंत्र के गुणात्मक विकास पर बल देता है।

मानवाधिकारों, सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण, लैंगिक समानता, अल्पसंख्यकों के अधिकार, सामाजिक सुरक्षा तथा समावेशी विकास जैसे आधुनिक विषयों के अध्ययन में उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ है। यह उपागम इन विषयों का अध्ययन केवल सैद्धांतिक रूप से नहीं करता, बल्कि यह समझने का प्रयास करता है कि राजनीतिक व्यवस्था इन क्षेत्रों में वास्तविक परिवर्तन कैसे ला सकती है।

भारतीय राजनीति के संदर्भ में उत्तर-व्यवहारवाद की उपयोगिता अत्यंत व्यापक है। भारत जैसे बहुलतावादी समाज में गरीबी, सामाजिक असमानता, जातीय विभाजन, क्षेत्रीय असंतुलन, लैंगिक विषमता, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण तथा लोकतांत्रिक भागीदारी जैसी अनेक समस्याएँ विद्यमान हैं। इन समस्याओं का अध्ययन केवल सांख्यिकीय आँकड़ों के आधार पर नहीं किया जा सकता। इनके समाधान के लिए राजनीतिक मूल्यों, सामाजिक न्याय तथा मानवीय दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। उत्तर-व्यवहारवाद इसी प्रकार की समन्वित सोच प्रस्तुत करता है।

उत्तर-व्यवहारवाद की एक प्रमुख उपलब्धि यह है कि इसने राजनीति विज्ञान को पुनः समाज और मानव जीवन से जोड़ा। इसने यह स्पष्ट किया कि राजनीति विज्ञान केवल ज्ञान का संग्रह नहीं है, बल्कि वह समाज के परिवर्तन और प्रगति का साधन भी है। इससे राजनीति विज्ञान में नई विषयवस्तुओं का प्रवेश हुआ और नीति-निर्माण, विकास प्रशासन, मानवाधिकार, सार्वजनिक नीति, पर्यावरणीय राजनीति तथा वैश्विक न्याय जैसे क्षेत्रों का महत्व बढ़ा।

फिर भी उत्तर-व्यवहारवाद की कुछ सीमाएँ भी हैं। इसकी सबसे बड़ी सीमा यह मानी जाती है कि यह मूल्यों पर अधिक बल देने के कारण कभी-कभी पूर्ण वस्तुनिष्ठता बनाए रखना कठिन बना देता है। जब शोधकर्ता किसी विशेष मूल्य या उद्देश्य के प्रति प्रतिबद्ध हो जाता है, तो उसके निष्कर्षों में व्यक्तिगत दृष्टिकोण का प्रभाव आ सकता है। इसके अतिरिक्त यह उपागम कई बार यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि किन मूल्यों को सार्वभौमिक माना जाए, क्योंकि विभिन्न समाजों में नैतिक मूल्यों की व्याख्या भिन्न हो सकती है।

एक अन्य सीमा यह है कि उत्तर-व्यवहारवाद वैज्ञानिक अनुसंधान और मूल्यपरक अध्ययन के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास तो करता है, परंतु व्यवहार में यह संतुलन बनाए रखना हमेशा सरल नहीं होता। कई बार शोधकर्ता के व्यक्तिगत विचार अनुसंधान को प्रभावित कर सकते हैं। फिर भी अधिकांश विद्वानों का मत है कि इन सीमाओं के बावजूद उत्तर-व्यवहारवाद ने राजनीति विज्ञान को अधिक प्रासंगिक, उत्तरदायी और मानवीय बनाया है।

आधुनिक राजनीति विज्ञान में उत्तर-व्यवहारवाद का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि आज विश्व अनेक नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। वैश्वीकरण, डिजिटल प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, आर्थिक असमानता, शरणार्थी संकट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा वैश्विक शासन जैसे विषय केवल तथ्यों के आधार पर नहीं समझे जा सकते। इनके अध्ययन में मानवीय मूल्यों, नैतिक दृष्टिकोण तथा सामाजिक उत्तरदायित्व की आवश्यकता होती है। उत्तर-व्यवहारवाद इन सभी आयामों को राजनीति विज्ञान के अध्ययन में समाहित करता है।

इस प्रकार उत्तर-व्यवहारवाद राजनीति विज्ञान के विकास का वह महत्वपूर्ण चरण है जिसने व्यवहारवाद की वैज्ञानिक उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए उसकी सीमाओं को दूर करने का प्रयास किया। इसने यह स्पष्ट किया कि राजनीति विज्ञान को केवल तथ्यों का विज्ञान नहीं, बल्कि मानव जीवन के कल्याण से जुड़ा हुआ सामाजिक विज्ञान होना चाहिए। यह उपागम वैज्ञानिक अनुसंधान, सामाजिक प्रासंगिकता, नैतिक मूल्यों, लोकतांत्रिक आदर्शों तथा मानव कल्याण के बीच संतुलन स्थापित करता है। इसी कारण आधुनिक राजनीति विज्ञान में उत्तर-व्यवहारवाद को एक समन्वयवादी और प्रगतिशील दृष्टिकोण के रूप में स्वीकार किया जाता है, जिसने राजनीति विज्ञान को अधिक सार्थक, उत्तरदायी और समाजोपयोगी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

                                                                                                                    Unit-03

State: Definition and Elements. (राज्य: परिभाषा एवं तत्व)

राज्य राजनीति विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण और आधारभूत अवधारणाओं में से एक है। मानव सभ्यता के विकास के साथ राज्य का स्वरूप भी निरंतर विकसित होता रहा है। प्रारंभिक मानव समाज में जब लोग छोटे-छोटे समूहों में रहते थे, तब किसी संगठित राज्य की अवधारणा नहीं थी। समय के साथ जनसंख्या में वृद्धि, आर्थिक गतिविधियों का विस्तार, सामाजिक संबंधों की जटिलता तथा सुरक्षा की आवश्यकता ने एक ऐसी संस्था के निर्माण को जन्म दिया जो समाज में व्यवस्था बनाए रख सके, न्याय स्थापित कर सके और सामूहिक हितों की रक्षा कर सके। यही संस्था आगे चलकर राज्य के रूप में विकसित हुई। आधुनिक युग में राज्य मानव जीवन की सबसे व्यापक राजनीतिक संस्था माना जाता है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी राज्य का नागरिक होता है और उसका सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक जीवन राज्य से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होता है। राज्य केवल शासन करने वाली संस्था नहीं है, बल्कि वह समाज के संगठन, सुरक्षा, विकास और कल्याण का प्रमुख साधन भी है।

राज्य की परिभाषा विभिन्न राजनीतिक विचारकों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत की है। सामान्य अर्थ में राज्य उस राजनीतिक संगठन को कहा जाता है जिसके पास निश्चित भू-भाग, स्थायी जनसंख्या, संगठित सरकार तथा सर्वोच्च प्रभुसत्ता होती है। यह एक ऐसी संस्था है जो अपने क्षेत्र के भीतर रहने वाले सभी व्यक्तियों पर विधिसम्मत अधिकार रखती है तथा कानून बनाकर उनका पालन सुनिश्चित करती है। राज्य का अस्तित्व केवल व्यक्तियों के समूह से नहीं बनता, बल्कि उसमें राजनीतिक संगठन, विधिक व्यवस्था तथा सर्वोच्च अधिकार भी आवश्यक होते हैं। प्रसिद्ध विद्वान गार्नर के अनुसार राज्य ऐसे व्यक्तियों का समुदाय है जो एक निश्चित भू-भाग में स्थायी रूप से निवास करता है, जिसके पास संगठित सरकार होती है और जो आंतरिक तथा बाह्य रूप से प्रभुसत्ता से युक्त होता है। इसी प्रकार अनेक अन्य विचारकों ने भी राज्य को जनसंख्या, भू-भाग, सरकार और प्रभुसत्ता के समन्वित रूप में परिभाषित किया है।

राज्य को समझने के लिए उसके मूल तत्वों का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। आधुनिक राजनीति विज्ञान के अनुसार राज्य के चार अनिवार्य तत्व माने जाते हैं—जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार और प्रभुसत्ता। इन चारों तत्वों के बिना राज्य का अस्तित्व संभव नहीं माना जाता। यदि इनमें से कोई भी तत्व अनुपस्थित हो, तो राज्य की संपूर्ण अवधारणा अधूरी रह जाती है। यही कारण है कि राज्य की पहचान इन मूलभूत तत्वों के आधार पर की जाती है।

राज्य का पहला और सबसे आवश्यक तत्व जनसंख्या है। बिना जनसंख्या के राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती। राज्य का निर्माण मनुष्यों के लिए होता है और उसका उद्देश्य नागरिकों के जीवन को सुरक्षित, संगठित तथा समृद्ध बनाना होता है। जनसंख्या राज्य का आधार है क्योंकि राज्य का अस्तित्व नागरिकों के कारण ही होता है। यदि किसी निश्चित भू-भाग पर कोई व्यक्ति निवास न करता हो, तो उसे राज्य नहीं कहा जा सकता। जनसंख्या केवल संख्या का विषय नहीं है, बल्कि उसकी गुणवत्ता, शिक्षा, स्वास्थ्य, उत्पादकता, सामाजिक चेतना तथा राष्ट्रीय एकता भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। किसी राज्य की शक्ति केवल उसकी जनसंख्या के आकार पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसके नागरिक कितने शिक्षित, अनुशासित, स्वस्थ और उत्तरदायी हैं। अधिक जनसंख्या श्रमशक्ति और संसाधनों का आधार बन सकती है, परंतु यदि उसका उचित प्रबंधन न हो तो वही जनसंख्या बेरोजगारी, गरीबी तथा सामाजिक समस्याओं का कारण भी बन सकती है। इसलिए आधुनिक राज्य का दायित्व केवल जनसंख्या की रक्षा करना नहीं, बल्कि उसके समग्र विकास के लिए आवश्यक अवसर उपलब्ध कराना भी है।

राज्य का दूसरा आवश्यक तत्व निश्चित भू-भाग है। प्रत्येक राज्य के पास एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र होता है, जिसके भीतर उसकी सत्ता और कानून लागू होते हैं। इस भू-भाग में भूमि, जल, नदियाँ, पर्वत, वन, खनिज, समुद्री क्षेत्र तथा वायु क्षेत्र भी सम्मिलित होते हैं। राज्य का भू-भाग उसकी भौगोलिक पहचान का आधार होता है। प्रत्येक राज्य की सीमाएँ निश्चित होती हैं, जिनकी रक्षा करना उसका महत्वपूर्ण दायित्व है। भू-भाग राज्य को स्थायित्व प्रदान करता है तथा उसकी प्रशासनिक व्यवस्था को व्यवस्थित बनाता है। किसी राज्य का क्षेत्र छोटा हो या बड़ा, उससे उसके राज्य होने की स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। विश्व में ऐसे अनेक छोटे राज्य हैं जिनका क्षेत्रफल बहुत कम है, फिर भी वे पूर्ण प्रभुसत्ता वाले स्वतंत्र राज्य हैं। दूसरी ओर बड़े क्षेत्रफल वाले राज्यों को भी राज्य होने के लिए वही चार मूल तत्व आवश्यक होते हैं। भू-भाग का महत्व इसलिए भी है क्योंकि उसी के भीतर राज्य अपने कानून लागू करता है, संसाधनों का उपयोग करता है तथा प्रशासन संचालित करता है।

राज्य का तीसरा अनिवार्य तत्व सरकार है। सरकार राज्य का वह संगठित तंत्र है जिसके माध्यम से राज्य अपनी इच्छा व्यक्त करता है, कानून बनाता है, प्रशासन संचालित करता है तथा नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों का निर्धारण करता है। सरकार राज्य की कार्यपालिका होती है, जबकि राज्य एक स्थायी संस्था है। सरकार समय-समय पर बदल सकती है, परंतु राज्य बना रहता है। लोकतांत्रिक देशों में चुनावों के माध्यम से सरकार बदलती रहती है, किंतु राज्य का अस्तित्व समाप्त नहीं होता। सरकार का कार्य केवल शासन करना नहीं है, बल्कि न्याय व्यवस्था बनाए रखना, सुरक्षा प्रदान करना, विकास योजनाएँ लागू करना, आर्थिक नीतियाँ बनाना, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सार्वजनिक सेवाएँ उपलब्ध कराना तथा नागरिकों के कल्याण के लिए आवश्यक कदम उठाना भी है। आधुनिक कल्याणकारी राज्य में सरकार की भूमिका पहले की अपेक्षा कहीं अधिक व्यापक हो गई है। अब सरकार केवल कानून और व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास, पर्यावरण संरक्षण, मानवाधिकारों की रक्षा तथा डिजिटल प्रशासन जैसे अनेक क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाती है।

राज्य का चौथा और सबसे महत्वपूर्ण तत्व प्रभुसत्ता है। प्रभुसत्ता से तात्पर्य राज्य की सर्वोच्च और अंतिम शक्ति से है। यह वह अधिकार है जिसके कारण राज्य अपने क्षेत्र के भीतर सर्वोच्च कानून निर्माता और कानून लागू करने वाली संस्था होता है। किसी भी अन्य संस्था या संगठन को राज्य से ऊपर नहीं माना जाता। प्रभुसत्ता के दो प्रमुख पक्ष होते हैं—आंतरिक प्रभुसत्ता और बाह्य प्रभुसत्ता। आंतरिक प्रभुसत्ता का अर्थ है कि राज्य अपने क्षेत्र के भीतर सभी व्यक्तियों, संस्थाओं और संगठनों पर सर्वोच्च अधिकार रखता है। बाह्य प्रभुसत्ता का अर्थ है कि राज्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र होता है और किसी अन्य राज्य के अधीन नहीं होता। प्रभुसत्ता ही राज्य को अन्य सामाजिक संस्थाओं से अलग करती है। परिवार, विद्यालय, धार्मिक संगठन अथवा सामाजिक संस्थाएँ भी समाज में कार्य करती हैं, परंतु उनके पास राज्य जैसी सर्वोच्च शक्ति नहीं होती। केवल राज्य ही कानून बनाकर उन्हें लागू करने का अधिकार रखता है।

इन चारों तत्वों के अतिरिक्त आधुनिक राजनीति विज्ञान में कुछ विद्वान मान्यता और वैधता को भी महत्वपूर्ण मानते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी राज्य की स्वतंत्र पहचान के लिए अन्य राज्यों द्वारा उसकी मान्यता उपयोगी होती है, यद्यपि राज्य के मूल तत्वों में इसे अनिवार्य नहीं माना जाता। इसी प्रकार लोकतांत्रिक शासन में जनता का विश्वास और राजनीतिक वैधता भी राज्य की स्थिरता के लिए आवश्यक मानी जाती है।

राज्य और सरकार के बीच अंतर को समझना भी आवश्यक है। अनेक लोग इन दोनों शब्दों का समान अर्थ में प्रयोग करते हैं, जबकि दोनों में महत्वपूर्ण अंतर है। राज्य एक स्थायी राजनीतिक संस्था है, जबकि सरकार राज्य का अस्थायी संचालन तंत्र है। राज्य में जनसंख्या, भू-भाग, सरकार और प्रभुसत्ता सभी सम्मिलित होते हैं, जबकि सरकार केवल राज्य का एक अंग है। सरकार बदलने पर भी राज्य बना रहता है। उदाहरण के लिए भारत में समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों की सरकारें बनी हैं, परंतु भारतीय राज्य का अस्तित्व निरंतर बना हुआ है। इसी प्रकार राज्य व्यापक होता है, जबकि सरकार उसका एक कार्यकारी भाग होती है।

राज्य और समाज में भी अंतर पाया जाता है। समाज व्यक्तियों के विभिन्न प्रकार के संबंधों, समूहों, संस्थाओं तथा सांस्कृतिक प्रक्रियाओं का व्यापक संगठन है। समाज में परिवार, धर्म, शिक्षा, संस्कृति, अर्थव्यवस्था तथा अनेक अन्य संस्थाएँ सम्मिलित होती हैं। राज्य समाज का केवल राजनीतिक संगठन है। समाज राज्य से पहले अस्तित्व में आया और राज्य समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विकसित हुआ। समाज का क्षेत्र व्यापक होता है, जबकि राज्य का कार्यक्षेत्र मुख्यतः राजनीतिक और प्रशासनिक होता है। फिर भी दोनों के बीच घनिष्ठ संबंध होता है क्योंकि राज्य समाज के भीतर ही कार्य करता है और समाज के विकास के लिए नीतियाँ बनाता है।

आधुनिक युग में राज्य की भूमिका निरंतर विस्तृत हुई है। प्राचीन काल में राज्य का मुख्य कार्य सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखना था। आधुनिक लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राज्यों में राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण विकास, डिजिटल सेवाओं तथा आर्थिक नियोजन जैसे अनेक क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाता है। नागरिकों के जीवन का लगभग प्रत्येक क्षेत्र किसी न किसी रूप में राज्य की नीतियों से प्रभावित होता है। इसी कारण आधुनिक राज्य को विकास और कल्याण का प्रमुख माध्यम माना जाता है।

वैश्वीकरण, सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरराष्ट्रीय संगठनों तथा वैश्विक आर्थिक संबंधों के विकास के कारण राज्य की भूमिका में नए परिवर्तन भी आए हैं। आज राज्य को केवल अपने आंतरिक मामलों तक सीमित नहीं रहना पड़ता, बल्कि उसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग, जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा, आतंकवाद, वैश्विक व्यापार तथा मानवाधिकार जैसे विषयों पर भी सक्रिय रहना पड़ता है। फिर भी प्रभुसत्ता राज्य की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता बनी हुई है और वह अपनी संवैधानिक व्यवस्था तथा राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए उत्तरदायी रहता है।

राजनीति विज्ञान में राज्य का अध्ययन इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि राज्य ही वह संस्था है जिसके माध्यम से राजनीतिक शक्ति का संगठन, प्रशासन का संचालन, कानूनों का निर्माण तथा नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों का निर्धारण होता है। राज्य के बिना संगठित राजनीतिक जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। लोकतंत्र, संविधान, न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका, निर्वाचन, मानवाधिकार तथा लोककल्याण जैसी सभी राजनीतिक अवधारणाएँ राज्य से ही संबंधित हैं। इसलिए राज्य राजनीति विज्ञान का केंद्रीय विषय है।

इस प्रकार राज्य एक संगठित, प्रभुसत्तासंपन्न तथा स्थायी राजनीतिक संस्था है, जिसका उद्देश्य समाज में व्यवस्था, न्याय, सुरक्षा और विकास सुनिश्चित करना है। जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार तथा प्रभुसत्ता उसके चार अनिवार्य तत्व हैं, जिनके बिना राज्य की कल्पना संभव नहीं है। आधुनिक युग में राज्य की भूमिका केवल शासन तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह नागरिकों के सर्वांगीण विकास, सामाजिक न्याय, आर्थिक प्रगति और राष्ट्रीय एकता का प्रमुख साधन बन गया है। यही कारण है कि राजनीति विज्ञान के अध्ययन में राज्य की परिभाषा और उसके तत्वों का अध्ययन अत्यंत आधारभूत, आवश्यक और महत्वपूर्ण माना जाता है।

Origin theories: Divine theory. (राज्य की उत्पत्ति के सिद्धांत: दैवी उत्पत्ति का सिद्धांत)

राज्य की उत्पत्ति का प्रश्न राजनीति विज्ञान के सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक है। मानव समाज के विकास के साथ यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि राज्य का निर्माण कैसे हुआ, उसकी स्थापना किसने की, वह किन परिस्थितियों में अस्तित्व में आया तथा उसकी वैधता का आधार क्या है। इन प्रश्नों के उत्तर देने के लिए विभिन्न कालों में अनेक सिद्धांत प्रस्तुत किए गए। इनमें दैवी उत्पत्ति का सिद्धांत सबसे प्राचीन, पारंपरिक तथा धार्मिक आधार वाला सिद्धांत माना जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार राज्य मनुष्य की रचना नहीं है, बल्कि उसकी उत्पत्ति ईश्वर की इच्छा और शक्ति से हुई है। इसलिए राज्य एक पवित्र संस्था है और उसके शासक ईश्वर के प्रतिनिधि माने जाते हैं। इस दृष्टिकोण में राज्य का अस्तित्व मानव समाज से ऊपर और दिव्य शक्ति से जुड़ा हुआ माना गया है।

दैवी उत्पत्ति के सिद्धांत का विकास उस समय हुआ जब धर्म का समाज और राजनीति पर अत्यधिक प्रभाव था। प्राचीन तथा मध्यकालीन समाजों में यह विश्वास व्यापक रूप से प्रचलित था कि समस्त संसार की रचना ईश्वर ने की है और राज्य भी उसी की इच्छा का परिणाम है। लोगों का मानना था कि ईश्वर ने समाज में व्यवस्था बनाए रखने तथा मानव जीवन को सुरक्षित रखने के लिए राज्य की स्थापना की। इस कारण राज्य के प्रति निष्ठा और आज्ञापालन को धार्मिक कर्तव्य माना जाता था। इस सिद्धांत ने विशेष रूप से उन समाजों में अधिक प्रभाव प्राप्त किया जहाँ धर्म और शासन का गहरा संबंध था। यूरोप के मध्यकाल में ईसाई धर्म के प्रभाव के कारण यह विचार अत्यधिक लोकप्रिय हुआ, जबकि एशिया तथा अन्य क्षेत्रों में भी विभिन्न धार्मिक परंपराओं के माध्यम से इस प्रकार की धारणाएँ विकसित हुईं।

दैवी उत्पत्ति के सिद्धांत का मूल आधार यह है कि राज्य ईश्वर की इच्छा का परिणाम है। मनुष्य ने राज्य का निर्माण नहीं किया, बल्कि ईश्वर ने मानव समाज के कल्याण और व्यवस्था के लिए राज्य की स्थापना की। इसी कारण राज्य को एक पवित्र संस्था माना गया और उसके आदेशों का पालन करना प्रत्येक नागरिक का धार्मिक और नैतिक कर्तव्य समझा गया। इस सिद्धांत के अनुसार यदि राज्य की अवज्ञा की जाती है, तो वह केवल राजनीतिक अपराध नहीं बल्कि ईश्वर की इच्छा का भी उल्लंघन माना जाता है। इसलिए नागरिकों से अपेक्षा की जाती थी कि वे बिना विरोध के राज्य तथा शासक की आज्ञा का पालन करें।

इस सिद्धांत की दूसरी महत्वपूर्ण मान्यता यह है कि शासक ईश्वर का प्रतिनिधि होता है। राजा अथवा सम्राट को ईश्वर द्वारा नियुक्त शासक माना जाता था। उसके अधिकारों का स्रोत जनता नहीं बल्कि ईश्वर होता है। इसलिए उसकी सत्ता सर्वोच्च और पवित्र मानी जाती थी। यह विश्वास था कि राजा का विरोध करना ईश्वर का विरोध करने के समान है। इसी आधार पर अनेक देशों में राजाओं ने अपने शासन को वैध ठहराने का प्रयास किया। यूरोप में “राजाओं के दैवी अधिकार” की अवधारणा इसी सिद्धांत का विकसित रूप थी। इसके अनुसार राजा केवल ईश्वर के प्रति उत्तरदायी होता है, जनता के प्रति नहीं।

दैवी उत्पत्ति के सिद्धांत में राज्य की सत्ता को असीमित माना गया है। चूँकि राज्य की स्थापना ईश्वर ने की है, इसलिए उसकी शक्ति पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। राज्य के कानूनों का पालन करना प्रत्येक व्यक्ति का अनिवार्य दायित्व माना जाता है। इस सिद्धांत में नागरिक अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्यों पर अधिक बल दिया गया। शासन की स्थिरता, अनुशासन तथा आज्ञापालन को सामाजिक जीवन का आधार माना गया। इससे राज्य की शक्ति अत्यधिक मजबूत होती थी और शासन के विरुद्ध विद्रोह या असहमति को अनुचित समझा जाता था।

इस सिद्धांत का समर्थन अनेक धार्मिक विद्वानों तथा राजतंत्र समर्थक विचारकों ने किया। मध्यकालीन यूरोप में चर्च और राजसत्ता दोनों ने इस विचार को बढ़ावा दिया क्योंकि इससे शासकों की वैधता और अधिकार मजबूत होते थे। कुछ ईसाई धर्मशास्त्रियों ने यह प्रतिपादित किया कि राजा ईश्वर का सेवक है और उसका शासन ईश्वर की योजना का एक भाग है। इसी प्रकार विभिन्न सभ्यताओं में भी शासकों को देवतुल्य या ईश्वर का प्रतिनिधि मानने की परंपरा रही। प्राचीन मिस्र में फ़राओ को देवता का रूप माना जाता था। चीन में सम्राट को स्वर्ग की आज्ञा प्राप्त शासक माना जाता था। भारत में भी अनेक राजाओं को धर्म का रक्षक और ईश्वरीय कृपा से शासन करने वाला माना गया, यद्यपि भारतीय परंपरा में राजा पर धर्म और न्याय का नियंत्रण भी स्वीकार किया गया।

दैवी उत्पत्ति के सिद्धांत की लोकप्रियता का एक प्रमुख कारण यह था कि उस समय समाज में शिक्षा का स्तर सीमित था और धार्मिक विश्वास अत्यधिक प्रभावशाली थे। सामान्य जनता ईश्वर में गहरी आस्था रखती थी और शासकों को ईश्वर का प्रतिनिधि मानने में विश्वास करती थी। इससे शासन व्यवस्था को स्थिरता प्राप्त होती थी तथा जनता में अनुशासन बना रहता था। धार्मिक आधार होने के कारण इस सिद्धांत ने लंबे समय तक अनेक देशों में राजनीतिक व्यवस्था को वैधता प्रदान की।

इस सिद्धांत का एक सकारात्मक पक्ष यह माना जाता है कि इसने राज्य के प्रति सम्मान और निष्ठा की भावना विकसित की। यदि नागरिक राज्य को पवित्र संस्था मानते हैं, तो वे कानूनों का पालन अधिक गंभीरता से करते हैं। इससे सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने में सहायता मिलती है। इसी प्रकार शासकों को भी यह स्मरण कराया जाता था कि वे ईश्वर के प्रतिनिधि हैं, इसलिए उन्हें न्यायपूर्ण, नैतिक और धर्मसम्मत शासन करना चाहिए। यदि वे अन्याय करेंगे तो अंततः उन्हें ईश्वर के समक्ष उत्तरदायी होना पड़ेगा। इस प्रकार सिद्धांत केवल जनता पर ही नहीं बल्कि शासक पर भी नैतिक दायित्व का संकेत करता था।

यद्यपि दैवी उत्पत्ति का सिद्धांत प्राचीन और मध्यकालीन समाजों में प्रभावशाली रहा, आधुनिक युग में इसकी अनेक आलोचनाएँ की गईं। इसकी सबसे बड़ी आलोचना यह है कि यह वैज्ञानिक और ऐतिहासिक प्रमाणों पर आधारित नहीं है। राज्य की उत्पत्ति को ईश्वर की इच्छा से जोड़ने का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इतिहास और मानवशास्त्र के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि राज्य का विकास मानव समाज की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आवश्यकताओं के कारण क्रमिक रूप से हुआ। इसलिए आधुनिक विद्वान राज्य को मानव द्वारा निर्मित संस्था मानते हैं।

दूसरी आलोचना यह है कि यह सिद्धांत निरंकुश शासन को बढ़ावा देता है। यदि शासक को ईश्वर का प्रतिनिधि मान लिया जाए और उसे जनता के प्रति उत्तरदायी न माना जाए, तो उसके अधिकार असीमित हो जाते हैं। इससे अत्याचार, शोषण तथा निरंकुशता की संभावना बढ़ जाती है। इतिहास में अनेक राजाओं ने इसी सिद्धांत का उपयोग अपनी सत्ता को उचित ठहराने और जनता के अधिकारों की उपेक्षा करने के लिए किया।

तीसरी आलोचना यह है कि यह सिद्धांत लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विरुद्ध है। आधुनिक लोकतंत्र का आधार यह है कि सत्ता का स्रोत जनता होती है और सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। दैवी उत्पत्ति का सिद्धांत इस विचार को स्वीकार नहीं करता। इसके अनुसार सत्ता का स्रोत ईश्वर है, न कि जनता। इसलिए यह आधुनिक लोकतांत्रिक शासन, जनसत्ता तथा नागरिक अधिकारों की अवधारणाओं से मेल नहीं खाता।

चौथी आलोचना यह भी की जाती है कि यदि विभिन्न धर्म अलग-अलग प्रकार से ईश्वर की इच्छा की व्याख्या करते हैं, तो यह निर्धारित करना कठिन हो जाता है कि वास्तविक दैवी इच्छा क्या है। संसार में अनेक धर्म और अनेक प्रकार की धार्मिक मान्यताएँ हैं। प्रत्येक परंपरा राज्य और शासन की अलग-अलग व्याख्या प्रस्तुत करती है। इसलिए इस सिद्धांत में सार्वभौमिकता का अभाव दिखाई देता है।

पाँचवीं आलोचना यह है कि यह सिद्धांत सामाजिक परिवर्तन और राजनीतिक विकास की व्याख्या करने में सक्षम नहीं है। यदि राज्य ईश्वर की रचना है और उसका स्वरूप निश्चित है, तो फिर इतिहास में राज्यों के निरंतर परिवर्तन, शासन प्रणालियों के विकास तथा लोकतंत्र, गणतंत्र और संवैधानिक शासन के उदय को कैसे समझाया जाए। आधुनिक इतिहास यह स्पष्ट करता है कि राज्य समय, परिस्थितियों और समाज की आवश्यकताओं के अनुसार बदलता रहा है। इसलिए राज्य को केवल दैवी इच्छा का परिणाम मानना पर्याप्त नहीं माना जाता।

आधुनिक राजनीति विज्ञान में दैवी उत्पत्ति का सिद्धांत ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है, परंतु उसे राज्य की वास्तविक उत्पत्ति का वैज्ञानिक सिद्धांत स्वीकार नहीं किया जाता। आज राज्य को मानव समाज की आवश्यकताओं, सामाजिक संगठन, आर्थिक विकास तथा राजनीतिक चेतना के परिणामस्वरूप विकसित संस्था माना जाता है। फिर भी इस सिद्धांत का अध्ययन इसलिए आवश्यक है क्योंकि यह राजनीतिक विचारों के विकास के इतिहास को समझने में सहायता करता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि विभिन्न कालों में लोगों ने राज्य की उत्पत्ति और उसकी वैधता को किस प्रकार समझा।

भारतीय संदर्भ में भी दैवी उत्पत्ति की अवधारणा का प्रभाव विभिन्न रूपों में दिखाई देता है। अनेक प्राचीन ग्रंथों में राजा को धर्म का रक्षक तथा दैवी संरक्षण प्राप्त शासक माना गया, किंतु साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि राजा को धर्म, न्याय और लोककल्याण के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। भारतीय परंपरा में राजा को पूर्णतः निरंकुश नहीं माना गया, बल्कि उस पर धर्म और नैतिकता का नियंत्रण स्वीकार किया गया। यही कारण है कि भारतीय राजनीतिक चिंतन में दैवी तत्व और नैतिक उत्तरदायित्व दोनों का समन्वय दिखाई देता है।

आधुनिक युग में लोकतंत्र, मानवाधिकार, संविधान तथा विधि के शासन जैसी अवधारणाओं ने दैवी उत्पत्ति के सिद्धांत का स्थान ले लिया है। अब राज्य की वैधता जनता की स्वीकृति, संवैधानिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से निर्धारित होती है। फिर भी दैवी उत्पत्ति का सिद्धांत राजनीतिक विचारों के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है क्योंकि इसने लंबे समय तक शासन व्यवस्था की वैधता और सामाजिक अनुशासन को प्रभावित किया।

इस प्रकार दैवी उत्पत्ति का सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति का सबसे प्राचीन और धार्मिक आधार वाला सिद्धांत है। इसके अनुसार राज्य की स्थापना ईश्वर ने की, शासक ईश्वर का प्रतिनिधि है और राज्य की आज्ञा का पालन करना प्रत्येक नागरिक का धार्मिक कर्तव्य है। इस सिद्धांत ने प्राचीन और मध्यकालीन समाजों में राज्य को पवित्र संस्था के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, परंतु आधुनिक वैज्ञानिक, लोकतांत्रिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण के विकास के बाद इसकी सीमाएँ स्पष्ट हो गईं। आज यह सिद्धांत मुख्यतः ऐतिहासिक और वैचारिक महत्व रखता है तथा राजनीति विज्ञान के विकास को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

Force theory. (शक्ति सिद्धांत)

राज्य की उत्पत्ति को समझाने के लिए विभिन्न राजनीतिक विचारकों ने अनेक सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं। इनमें शक्ति सिद्धांत एक महत्वपूर्ण तथा प्राचीन सिद्धांत माना जाता है। यह सिद्धांत इस विचार पर आधारित है कि राज्य का जन्म नैतिक आदर्शों, सामाजिक समझौते या ईश्वरीय इच्छा से नहीं हुआ, बल्कि बल, शक्ति और विजय के माध्यम से हुआ। इस सिद्धांत के अनुसार मानव समाज के प्रारंभिक चरण में शक्तिशाली व्यक्ति या समूह ने अपनी शारीरिक क्षमता, सैन्य बल अथवा संगठन शक्ति के आधार पर कमजोर व्यक्तियों और समुदायों को अपने अधीन कर लिया। धीरे-धीरे यही प्रभुत्व स्थायी राजनीतिक व्यवस्था में बदल गया और राज्य का निर्माण हुआ। इस प्रकार राज्य की उत्पत्ति का आधार शक्ति, विजय और नियंत्रण को माना गया है।

शक्ति सिद्धांत का मूल आधार यह है कि मानव स्वभाव से महत्वाकांक्षी, संघर्षशील तथा प्रभुत्व स्थापित करने की प्रवृत्ति वाला प्राणी है। प्रारंभिक समाज में जब कोई संगठित शासन व्यवस्था नहीं थी, तब प्रत्येक व्यक्ति अपनी शक्ति के अनुसार जीवन व्यतीत करता था। इस स्थिति में शक्तिशाली लोग कमजोर लोगों पर अपना अधिकार स्थापित करने लगे। उन्होंने अपनी सैन्य शक्ति, शारीरिक क्षमता, संगठन या हथियारों के बल पर अन्य व्यक्तियों और समूहों को पराजित कर उन्हें अपने अधीन कर लिया। समय के साथ यह प्रभुत्व स्थायी शासन में परिवर्तित हो गया। इस प्रकार शक्ति सिद्धांत यह प्रतिपादित करता है कि राज्य का जन्म विजय और अधीनता की प्रक्रिया का परिणाम है।

इस सिद्धांत के अनुसार इतिहास में अनेक राज्यों की स्थापना युद्धों और विजयों के माध्यम से हुई है। प्राचीन काल में जनजातियों के बीच संघर्ष सामान्य बात थी। जब कोई शक्तिशाली जनजाति दूसरी जनजाति को पराजित करती थी, तो वह उसके भू-भाग, संसाधनों और लोगों पर अधिकार स्थापित कर लेती थी। धीरे-धीरे विजेता अपनी प्रशासनिक व्यवस्था विकसित करता, कानून बनाता और शासन स्थापित करता। यही प्रक्रिया आगे चलकर राज्य के रूप में विकसित होती गई। इस दृष्टि से शक्ति सिद्धांत इतिहास की अनेक घटनाओं को राज्य निर्माण की प्रक्रिया से जोड़ता है।

शक्ति सिद्धांत का संबंध विशेष रूप से सैन्य विजय से भी जोड़ा जाता है। इतिहास में अनेक साम्राज्यों का विस्तार युद्धों के माध्यम से हुआ। विजेता शासकों ने नए क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर विशाल राज्यों का निर्माण किया। इस आधार पर शक्ति सिद्धांत यह तर्क देता है कि राज्य का वास्तविक जन्म संघर्ष और विजय की प्रक्रिया से हुआ, न कि किसी शांतिपूर्ण समझौते से। विजेता समूह ने शासन स्थापित किया और पराजित समूह ने उसकी अधीनता स्वीकार की। समय के साथ यह राजनीतिक संगठन स्थायी स्वरूप ग्रहण कर गया।

इस सिद्धांत के कुछ प्रमुख समर्थकों में विभिन्न यूरोपीय विचारकों का उल्लेख किया जाता है जिन्होंने यह माना कि राज्य की उत्पत्ति का आधार बल और शक्ति है। उन्होंने यह तर्क दिया कि इतिहास में किसी भी संगठित शासन व्यवस्था की स्थापना के पीछे किसी न किसी प्रकार का सैन्य प्रभुत्व, राजनीतिक विजय अथवा शक्तिशाली नेतृत्व अवश्य रहा है। उनके अनुसार यदि शक्ति का प्रयोग न किया गया होता, तो राज्य जैसी संगठित संस्था का विकास संभव नहीं होता। कुछ विद्वानों ने यह भी कहा कि राज्य मूलतः विजेताओं का संगठन है, जिसका उद्देश्य पराजित लोगों पर नियंत्रण बनाए रखना होता है।

शक्ति सिद्धांत की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह राज्य की उत्पत्ति को यथार्थवादी दृष्टिकोण से समझाने का प्रयास करता है। यह सिद्धांत आदर्शों की अपेक्षा वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं और संघर्षों पर अधिक बल देता है। इसके अनुसार मानव इतिहास में युद्ध, संघर्ष और शक्ति का प्रयोग निरंतर होता रहा है। इसलिए राज्य के विकास में इन तत्वों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। यह दृष्टिकोण बताता है कि राजनीतिक संगठन का निर्माण केवल नैतिकता या सहयोग से नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन और प्रभुत्व से भी प्रभावित हुआ है।

इस सिद्धांत का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह राजनीतिक शक्ति के महत्व को स्पष्ट करता है। किसी भी राज्य की स्थापना और उसके अस्तित्व के लिए शक्ति आवश्यक मानी जाती है। यदि राज्य के पास अपनी सीमाओं की रक्षा करने, कानून लागू करने और आंतरिक व्यवस्था बनाए रखने की शक्ति न हो, तो उसका अस्तित्व संकट में पड़ सकता है। इस प्रकार शक्ति सिद्धांत यह स्वीकार करता है कि राज्य की स्थिरता और सुरक्षा के लिए शक्ति एक अनिवार्य तत्व है।

यद्यपि शक्ति सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति के कुछ ऐतिहासिक पक्षों को स्पष्ट करता है, फिर भी इसकी अनेक सीमाएँ हैं। इसकी सबसे बड़ी आलोचना यह है कि यह राज्य की उत्पत्ति को केवल बल और हिंसा का परिणाम मानता है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक है। मानव समाज का विकास केवल संघर्ष के आधार पर नहीं हुआ, बल्कि सहयोग, पारस्परिक सहायता, सामाजिक संगठन, आर्थिक आवश्यकताओं तथा सांस्कृतिक विकास ने भी राज्य निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यदि केवल शक्ति ही राज्य की उत्पत्ति का आधार होती, तो समाज में स्थायी राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण संभव नहीं हो पाता।

दूसरी महत्वपूर्ण आलोचना यह है कि यह सिद्धांत राज्य की वैधता की व्याख्या नहीं कर पाता। यदि राज्य केवल बल के आधार पर स्थापित हुआ है, तो नागरिक उसकी आज्ञा का पालन क्यों करें? आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था केवल शक्ति के आधार पर नहीं चलती, बल्कि नागरिकों की स्वीकृति, संविधान, विधि का शासन और लोकतांत्रिक वैधता पर आधारित होती है। इसलिए शक्ति सिद्धांत आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य की प्रकृति को पूरी तरह स्पष्ट नहीं कर सकता।

तीसरी आलोचना यह है कि यह सिद्धांत राज्य के कल्याणकारी स्वरूप की उपेक्षा करता है। आधुनिक राज्य केवल शासन करने वाली संस्था नहीं है, बल्कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक विकास, पर्यावरण संरक्षण तथा मानवाधिकारों की रक्षा जैसे अनेक कार्य करता है। यदि राज्य का उद्देश्य केवल शक्ति के माध्यम से शासन करना होता, तो वह कल्याणकारी राज्य के रूप में विकसित नहीं हो पाता। इसलिए आधुनिक विद्वानों का मत है कि राज्य का वास्तविक स्वरूप शक्ति और लोककल्याण दोनों के संतुलन पर आधारित है।

चौथी आलोचना यह भी है कि यह सिद्धांत समाज की स्वैच्छिक संस्थाओं और मानवीय सहयोग की भूमिका को महत्व नहीं देता। परिवार, समुदाय, परंपरा, आर्थिक संगठन तथा सांस्कृतिक एकता जैसे तत्वों ने भी राज्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। केवल युद्ध और विजय के आधार पर किसी स्थायी राजनीतिक संगठन की कल्पना करना यथार्थ के अनुरूप नहीं माना जाता।

इतिहास का गहन अध्ययन यह भी बताता है कि अनेक राज्यों का विकास धीरे-धीरे सामाजिक और आर्थिक प्रक्रियाओं के माध्यम से हुआ। कई समाजों में राज्य का निर्माण बिना किसी बड़े युद्ध या विजय के भी हुआ। लोगों ने सुरक्षा, न्याय, संसाधनों के प्रबंधन तथा सामाजिक व्यवस्था की आवश्यकता के कारण राजनीतिक संस्थाओं का विकास किया। इस प्रकार शक्ति सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति के केवल एक पक्ष को प्रस्तुत करता है, संपूर्ण सत्य को नहीं।

भारतीय संदर्भ में शक्ति सिद्धांत का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि भारत के इतिहास में अनेक राज्यों और साम्राज्यों का विस्तार युद्धों के माध्यम से अवश्य हुआ, परंतु भारतीय राजनीतिक परंपरा ने केवल शक्ति को राज्य का आधार नहीं माना। यहाँ धर्म, न्याय, लोककल्याण तथा नैतिक शासन की अवधारणाओं को भी समान महत्व दिया गया। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में राजा को शक्तिशाली होने के साथ-साथ धर्मपरायण, न्यायप्रिय और प्रजावत्सल होने की अपेक्षा की गई है। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय राजनीतिक चिंतन शक्ति और नैतिकता के समन्वय पर आधारित रहा है।

आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी शक्ति का महत्व बना हुआ है। प्रत्येक राज्य अपनी सुरक्षा के लिए सेना, पुलिस, न्याय व्यवस्था तथा प्रशासनिक तंत्र विकसित करता है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भी शक्ति संतुलन, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा सामरिक क्षमता महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दृष्टि से शक्ति सिद्धांत आज भी यह स्मरण कराता है कि राज्य के अस्तित्व और सुरक्षा के लिए शक्ति आवश्यक है। किंतु आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में शक्ति का प्रयोग संविधान, कानून और जनहित की सीमाओं के भीतर होना चाहिए।

राजनीति विज्ञान में शक्ति सिद्धांत का अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह राज्य की उत्पत्ति के संघर्षपूर्ण और यथार्थवादी पक्ष को सामने लाता है। यह बताता है कि राजनीतिक संगठन के निर्माण में शक्ति और प्रभुत्व की भूमिका रही है। साथ ही इसकी सीमाओं का अध्ययन यह समझने में सहायता करता है कि केवल शक्ति के आधार पर राज्य की उत्पत्ति और उसके आधुनिक स्वरूप की व्याख्या संभव नहीं है। राज्य एक जटिल सामाजिक संस्था है, जिसका विकास ऐतिहासिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक सभी कारकों के संयुक्त प्रभाव से हुआ है।

इस प्रकार शक्ति सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति के उन प्रारंभिक विचारों में से एक है जो राज्य को बल, विजय और प्रभुत्व का परिणाम मानता है। यह सिद्धांत इतिहास में युद्धों और विजयों के महत्व को स्वीकार करता है तथा राज्य निर्माण में शक्ति की भूमिका को रेखांकित करता है। यद्यपि आधुनिक राजनीति विज्ञान इसे राज्य की उत्पत्ति का पूर्ण और अंतिम सिद्धांत नहीं मानता, फिर भी यह राज्य के विकास की प्रक्रिया को समझने का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दृष्टिकोण प्रदान करता है। शक्ति राज्य का एक आवश्यक तत्व अवश्य है, परंतु आधुनिक राज्य का वास्तविक आधार केवल शक्ति नहीं, बल्कि वैधता, जनस्वीकृति, न्याय, संविधान, लोकतंत्र और लोककल्याण भी है। इसलिए शक्ति सिद्धांत का महत्व मुख्यतः राज्य के विकास के ऐतिहासिक और राजनीतिक आयामों को समझने में निहित है।

Social Contract. (सामाजिक अनुबंध)

सामाजिक अनुबंध सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति के संबंध में प्रस्तुत सबसे प्रभावशाली और व्यापक रूप से चर्चित सिद्धांतों में से एक है। इस सिद्धांत ने आधुनिक राजनीतिक चिंतन, लोकतांत्रिक शासन, नागरिक अधिकारों, जनसत्ता तथा संवैधानिक शासन की अवधारणाओं को गहराई से प्रभावित किया है। इस सिद्धांत का मूल विचार यह है कि राज्य किसी दैवी शक्ति, बल प्रयोग या केवल ऐतिहासिक घटनाओं का परिणाम नहीं है, बल्कि मनुष्यों के बीच हुए एक समझौते अथवा अनुबंध का परिणाम है। इस अनुबंध के माध्यम से लोगों ने अपने व्यक्तिगत जीवन की असुरक्षा, संघर्ष और अव्यवस्था से मुक्ति पाने के लिए एक संगठित राजनीतिक संस्था की स्थापना की, जिसे राज्य कहा गया। इस प्रकार सामाजिक अनुबंध सिद्धांत राज्य को मानव बुद्धि, सहमति और सामाजिक आवश्यकता का परिणाम मानता है।

सामाजिक अनुबंध सिद्धांत का विकास मुख्यतः यूरोप में सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी के दौरान हुआ। उस समय यूरोप में राजनीतिक अस्थिरता, धार्मिक संघर्ष, राजाओं की निरंकुशता तथा सामाजिक परिवर्तन की परिस्थितियाँ विद्यमान थीं। लोगों के मन में यह प्रश्न उठने लगा कि राज्य की सत्ता का वास्तविक स्रोत क्या है और शासक को शासन करने का अधिकार कहाँ से प्राप्त होता है। इसी पृष्ठभूमि में कुछ महान राजनीतिक विचारकों ने यह प्रतिपादित किया कि राज्य का आधार जनता की स्वीकृति है, न कि ईश्वरीय आदेश या बल प्रयोग। इस विचार ने आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीतिक दर्शन की नींव रखी।

सामाजिक अनुबंध सिद्धांत का मूल आधार प्राकृतिक अवस्था की अवधारणा है। इस सिद्धांत के अनुसार राज्य की स्थापना से पहले मनुष्य प्राकृतिक अवस्था में रहता था। प्राकृतिक अवस्था का अर्थ उस स्थिति से है जब कोई संगठित राज्य, सरकार, न्यायालय अथवा विधिक व्यवस्था अस्तित्व में नहीं थी। उस समय मनुष्य स्वतंत्र था और अपने जीवन का संचालन स्वयं करता था। परंतु इस अवस्था में सुरक्षा, न्याय तथा सामाजिक व्यवस्था का अभाव था। विभिन्न विचारकों ने प्राकृतिक अवस्था का अलग-अलग वर्णन किया है, किंतु सभी का मत यह है कि अंततः मनुष्य ने अपनी परिस्थितियों को सुधारने के लिए परस्पर समझौता किया और राज्य की स्थापना की।

सामाजिक अनुबंध सिद्धांत के विकास में तीन प्रमुख विचारकों का विशेष योगदान माना जाता है। ये हैं थॉमस हॉब्स, जॉन लॉक और ज्याँ-जाक रूसो। इन तीनों ने सामाजिक अनुबंध की अवधारणा को स्वीकार किया, किंतु प्राकृतिक अवस्था, अनुबंध की प्रकृति तथा राज्य के स्वरूप के संबंध में उनके विचार अलग-अलग थे। यही कारण है कि सामाजिक अनुबंध सिद्धांत एक ही विचार न होकर विभिन्न दृष्टिकोणों का समूह बन गया।

थॉमस हॉब्स के अनुसार प्राकृतिक अवस्था अत्यंत भयावह थी। उनके विचार में उस समय प्रत्येक व्यक्ति अपनी सुरक्षा और स्वार्थ की रक्षा के लिए संघर्ष करता था। कोई सर्वोच्च सत्ता नहीं होने के कारण जीवन असुरक्षित, हिंसक और निरंतर संघर्षपूर्ण था। हॉब्स ने प्राकृतिक अवस्था को ऐसी स्थिति बताया जिसमें प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक व्यक्ति का शत्रु था। इस अवस्था से मुक्ति पाने के लिए लोगों ने अपनी लगभग सभी स्वतंत्रताएँ एक शक्तिशाली शासक को सौंप दीं। इस प्रकार एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना हुई जिसका उद्देश्य शांति और सुरक्षा बनाए रखना था। हॉब्स के अनुसार राज्य की शक्ति अत्यंत व्यापक होनी चाहिए क्योंकि यदि राज्य कमजोर होगा तो समाज पुनः अराजकता की स्थिति में पहुँच जाएगा।

जॉन लॉक ने प्राकृतिक अवस्था का चित्रण हॉब्स की अपेक्षा अधिक सकारात्मक रूप में किया। उनके अनुसार प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य स्वतंत्र और समान था तथा प्राकृतिक अधिकारों से युक्त था। प्रत्येक व्यक्ति को जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति का अधिकार प्राप्त था। परंतु इन अधिकारों की रक्षा के लिए कोई निष्पक्ष व्यवस्था नहीं थी। इसलिए लोगों ने पारस्परिक सहमति से राज्य की स्थापना की ताकि उनके प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा की जा सके। लॉक के अनुसार राज्य जनता के अधिकारों का संरक्षक है, स्वामी नहीं। यदि राज्य नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करे, तो जनता को उसके विरुद्ध विरोध करने और सरकार बदलने का अधिकार है। यही विचार आगे चलकर आधुनिक लोकतंत्र तथा संवैधानिक शासन की आधारशिला बना।

रूसो ने सामाजिक अनुबंध सिद्धांत को एक नए रूप में प्रस्तुत किया। उनके अनुसार प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य सरल, स्वतंत्र और नैतिक था। समाज में निजी संपत्ति तथा सामाजिक असमानता के विकास के कारण संघर्ष और शोषण उत्पन्न हुआ। इस स्थिति से मुक्ति पाने के लिए लोगों ने सामाजिक अनुबंध किया और सामूहिक इच्छा अर्थात सामान्य इच्छा के आधार पर राज्य की स्थापना की। रूसो के अनुसार वास्तविक प्रभुसत्ता जनता में निहित होती है। राज्य का उद्देश्य जनता की सामान्य इच्छा को लागू करना है। यदि शासन जनता की इच्छा के विरुद्ध कार्य करे, तो वह वैध नहीं माना जा सकता। रूसो के विचारों ने लोकतंत्र, जनसत्ता तथा नागरिक समानता के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया।

सामाजिक अनुबंध सिद्धांत की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह राज्य की उत्पत्ति को जनता की सहमति पर आधारित मानता है। इस सिद्धांत के अनुसार राज्य जनता के लिए है और उसकी वैधता जनता की स्वीकृति से उत्पन्न होती है। इस प्रकार यह सिद्धांत राजाओं के दैवी अधिकार तथा निरंकुश शासन का विरोध करता है। इसके माध्यम से यह स्थापित किया गया कि सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता है और सरकार जनता की इच्छा के अनुसार कार्य करने के लिए उत्तरदायी है।

इस सिद्धांत की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह व्यक्ति के अधिकारों को अत्यधिक महत्व देता है। सामाजिक अनुबंध के माध्यम से व्यक्ति अपने सभी अधिकार नहीं छोड़ता, बल्कि केवल उतने अधिकार राज्य को देता है जितने सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक हों। राज्य का उद्देश्य नागरिकों की स्वतंत्रता समाप्त करना नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा करना है। यही कारण है कि आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में मौलिक अधिकारों तथा नागरिक स्वतंत्रताओं को अत्यधिक महत्व दिया जाता है।

सामाजिक अनुबंध सिद्धांत आधुनिक संविधानवाद की भी आधारशिला माना जाता है। यदि राज्य जनता की सहमति से बना है, तो उसकी शक्तियाँ भी सीमित होनी चाहिए। इसलिए राज्य के अधिकारों और नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए संविधान की आवश्यकता होती है। संविधान राज्य की शक्तियों को नियंत्रित करता है तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है। इस प्रकार सामाजिक अनुबंध सिद्धांत ने विधि के शासन, संवैधानिक सरकार तथा उत्तरदायी शासन की अवधारणाओं को मजबूत किया।

इस सिद्धांत ने लोकतंत्र के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लोकतांत्रिक शासन इस विचार पर आधारित है कि सरकार जनता की इच्छा से बनती है और जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। चुनाव, प्रतिनिधित्व, नागरिक अधिकार तथा जनसत्ता जैसी आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ सामाजिक अनुबंध सिद्धांत की भावना को ही अभिव्यक्त करती हैं। इसलिए आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था के बौद्धिक विकास में इस सिद्धांत का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।

सामाजिक अनुबंध सिद्धांत का प्रभाव केवल राजनीति विज्ञान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने मानवाधिकार, न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा आधुनिक नागरिकता की अवधारणाओं को भी प्रभावित किया। आज अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में यह स्वीकार किया जाता है कि राज्य का अस्तित्व नागरिकों के कल्याण के लिए है और सरकार जनता की सेवक है। यह विचार सामाजिक अनुबंध सिद्धांत की मूल भावना को ही व्यक्त करता है।

यद्यपि सामाजिक अनुबंध सिद्धांत अत्यंत प्रभावशाली रहा है, फिर भी इसकी अनेक आलोचनाएँ भी की गई हैं। इसकी सबसे बड़ी आलोचना यह है कि सामाजिक अनुबंध जैसी किसी ऐतिहासिक घटना का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इतिहास में ऐसा कोई निश्चित प्रमाण नहीं मिलता जिससे यह सिद्ध हो सके कि किसी समय सभी लोगों ने एकत्र होकर औपचारिक अनुबंध किया था। इसलिए अनेक विद्वान इसे ऐतिहासिक तथ्य की अपेक्षा एक दार्शनिक कल्पना या बौद्धिक परिकल्पना मानते हैं।

दूसरी आलोचना यह है कि प्राकृतिक अवस्था की अवधारणा भी ऐतिहासिक रूप से सिद्ध नहीं की जा सकती। हॉब्स, लॉक और रूसो ने प्राकृतिक अवस्था का जो वर्णन किया, वह उनके अपने दार्शनिक दृष्टिकोण पर आधारित था। इन तीनों के वर्णन एक-दूसरे से भिन्न हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्राकृतिक अवस्था का स्वरूप वस्तुतः कल्पनात्मक था। इसलिए इस सिद्धांत की ऐतिहासिक सत्यता पर प्रश्न उठाए जाते हैं।

तीसरी आलोचना यह है कि राज्य का विकास एक दीर्घ सामाजिक प्रक्रिया का परिणाम है, न कि किसी एक समय में हुए समझौते का। समाजशास्त्र, मानवशास्त्र तथा इतिहास के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि राज्य का विकास धीरे-धीरे सामाजिक संगठन, आर्थिक परिवर्तन, सांस्कृतिक विकास तथा राजनीतिक अनुभवों के माध्यम से हुआ। इसलिए राज्य की उत्पत्ति को केवल अनुबंध का परिणाम मानना पर्याप्त नहीं माना जाता।

इसके अतिरिक्त यह भी कहा जाता है कि सामाजिक अनुबंध सिद्धांत राज्य के विकास में परिवार, धर्म, आर्थिक संगठन तथा सामाजिक संस्थाओं की भूमिका को पर्याप्त महत्व नहीं देता। आधुनिक विद्वानों के अनुसार राज्य का निर्माण अनेक कारकों के संयुक्त प्रभाव से हुआ है। इसलिए किसी एक सिद्धांत से उसकी संपूर्ण व्याख्या संभव नहीं है।

भारतीय राजनीतिक चिंतन के संदर्भ में सामाजिक अनुबंध की अवधारणा प्रत्यक्ष रूप से उसी रूप में नहीं मिलती जैसी यूरोपीय विचारकों ने प्रस्तुत की, किंतु प्राचीन भारतीय ग्रंथों में यह विचार अवश्य मिलता है कि समाज में अराजकता समाप्त करने तथा न्याय स्थापित करने के लिए शासक की आवश्यकता होती है। अनेक प्राचीन कथाओं में यह उल्लेख मिलता है कि लोगों ने व्यवस्था बनाए रखने के लिए राजा को स्वीकार किया और उसके बदले उसे कर प्रदान किया। इससे यह संकेत मिलता है कि शासन की स्थापना में जनता की सहमति का विचार भारतीय परंपरा में भी किसी न किसी रूप में विद्यमान था।

आधुनिक लोकतांत्रिक भारत में सामाजिक अनुबंध सिद्धांत की भावना संविधान के माध्यम से स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। भारत का संविधान जनता द्वारा निर्मित और जनता के लिए बनाया गया सर्वोच्च विधिक दस्तावेज है। भारतीय लोकतंत्र में सरकार जनता के मतों से बनती है और जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। मौलिक अधिकार, विधि का शासन, स्वतंत्र न्यायपालिका, चुनाव प्रणाली तथा उत्तरदायी शासन जैसी व्यवस्थाएँ सामाजिक अनुबंध सिद्धांत की मूल भावना को प्रतिबिंबित करती हैं।

इस प्रकार सामाजिक अनुबंध सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति का एक अत्यंत प्रभावशाली और आधुनिक राजनीतिक दर्शन का आधारभूत सिद्धांत है। यह राज्य को जनता की सहमति, सामाजिक आवश्यकता तथा मानव बुद्धि का परिणाम मानता है। इस सिद्धांत ने लोकतंत्र, जनसत्ता, नागरिक अधिकार, संवैधानिक शासन तथा उत्तरदायी सरकार जैसी आधुनिक अवधारणाओं के विकास में अमूल्य योगदान दिया है। यद्यपि इसकी ऐतिहासिक सत्यता पर प्रश्न उठाए गए हैं और इसे एक दार्शनिक कल्पना भी माना गया है, फिर भी आधुनिक राजनीतिक विचारधारा पर इसका प्रभाव अत्यंत व्यापक और स्थायी है। आज भी जब लोकतंत्र, मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रता की चर्चा होती है, तब सामाजिक अनुबंध सिद्धांत की मूल भावना राजनीतिक चिंतन का अभिन्न अंग बनी हुई है।

Evolutionary theory and Marxists theory. (विकासवादी सिद्धांत तथा मार्क्सवादी सिद्धांत)

राज्य की उत्पत्ति के संबंध में राजनीति विज्ञान में अनेक सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं। इनमें विकासवादी सिद्धांत तथा मार्क्सवादी सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं क्योंकि दोनों राज्य के उद्भव को ऐतिहासिक, सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टिकोण से समझाने का प्रयास करते हैं। विकासवादी सिद्धांत राज्य को किसी एक घटना, समझौते या दैवी शक्ति का परिणाम नहीं मानता, बल्कि उसे मानव समाज के दीर्घकालीन और क्रमिक विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया का परिणाम मानता है। दूसरी ओर मार्क्सवादी सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति को समाज में आर्थिक असमानता, निजी संपत्ति तथा वर्ग-संघर्ष से जोड़कर देखता है। दोनों सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति की व्याख्या ऐतिहासिक तथ्यों और सामाजिक परिवर्तनों के आधार पर करते हैं, किंतु उनके दृष्टिकोण और निष्कर्षों में महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है।

विकासवादी सिद्धांत का मूल विचार यह है कि राज्य का निर्माण किसी एक समय या किसी विशेष व्यक्ति के प्रयास से नहीं हुआ, बल्कि यह मानव समाज के निरंतर विकास का परिणाम है। प्रारंभिक मानव जीवन अत्यंत सरल था। मनुष्य छोटे-छोटे समूहों में रहता था और उसकी आवश्यकताएँ सीमित थीं। समय के साथ जनसंख्या बढ़ी, कृषि का विकास हुआ, स्थायी बस्तियाँ बसने लगीं, व्यापार और उद्योग का विस्तार हुआ तथा सामाजिक संबंध अधिक जटिल होते गए। इन परिवर्तनों के कारण समाज को संगठित रखने, सुरक्षा प्रदान करने, विवादों का समाधान करने तथा संसाधनों का प्रबंधन करने के लिए एक सशक्त राजनीतिक संस्था की आवश्यकता अनुभव की गई। यही संस्था क्रमशः विकसित होकर राज्य के रूप में सामने आई। इस प्रकार विकासवादी सिद्धांत राज्य को मानव सभ्यता के क्रमिक विकास का स्वाभाविक परिणाम मानता है।

विकासवादी सिद्धांत के अनुसार राज्य का विकास कई सामाजिक संस्थाओं के क्रमिक विस्तार से हुआ। परिवार सबसे प्रारंभिक सामाजिक संस्था थी। अनेक परिवारों के मिलकर कुल बने, अनेक कुलों से गोत्र और जनजातियाँ बनीं। जनजातियों के विस्तार के साथ स्थायी बस्तियों का निर्माण हुआ और गाँवों का विकास हुआ। आगे चलकर गाँवों के समूह नगरों में परिवर्तित हुए और नगरों के बीच आर्थिक तथा राजनीतिक संबंध स्थापित होने लगे। इन सभी प्रक्रियाओं ने एक व्यापक राजनीतिक संगठन की आवश्यकता उत्पन्न की। धीरे-धीरे नेतृत्व, प्रशासन, न्याय और सुरक्षा की व्यवस्थाएँ विकसित हुईं और अंततः राज्य का निर्माण हुआ। इस दृष्टिकोण में राज्य को समाज का स्वाभाविक और ऐतिहासिक विकास माना जाता है।

विकासवादी सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें राज्य की उत्पत्ति के लिए अनेक कारकों को उत्तरदायी माना गया है। परिवार, धर्म, रीति-रिवाज, आर्थिक संगठन, सामाजिक सहयोग, युद्ध, सुरक्षा की आवश्यकता, राजनीतिक नेतृत्व तथा भौगोलिक परिस्थितियाँ—इन सभी ने राज्य के विकास में योगदान दिया। इसलिए यह सिद्धांत किसी एक कारण को राज्य की उत्पत्ति का आधार नहीं मानता। यह मानता है कि राज्य का निर्माण अनेक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शक्तियों की संयुक्त क्रिया का परिणाम है। यही कारण है कि इसे राज्य की उत्पत्ति का सबसे यथार्थवादी और संतुलित सिद्धांत माना जाता है।

विकासवादी सिद्धांत की एक विशेषता यह भी है कि यह इतिहास और समाजशास्त्र के निष्कर्षों से मेल खाता है। आधुनिक मानवशास्त्र तथा इतिहास के अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि मानव समाज का विकास धीरे-धीरे हुआ और राजनीतिक संस्थाएँ भी समय के साथ विकसित हुईं। किसी भी समाज में अचानक पूर्ण विकसित राज्य की स्थापना नहीं हुई। प्रारंभिक समुदायों से लेकर आधुनिक राष्ट्र-राज्य तक की यात्रा एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम रही है। इस प्रकार विकासवादी सिद्धांत आधुनिक अनुसंधान और ऐतिहासिक प्रमाणों के अधिक निकट माना जाता है।

इस सिद्धांत का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह राज्य को समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली संस्था मानता है। जैसे-जैसे समाज जटिल होता गया, वैसे-वैसे प्रशासन, कानून, न्याय, सुरक्षा तथा आर्थिक संगठन की आवश्यकता बढ़ती गई। राज्य ने इन आवश्यकताओं को पूरा करने का कार्य किया। इसलिए राज्य को मानव समाज की आवश्यकताओं का उत्तर माना गया, न कि केवल शक्ति या दैवी इच्छा का परिणाम।

यद्यपि विकासवादी सिद्धांत व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं। इसकी सबसे बड़ी सीमा यह है कि यह राज्य की उत्पत्ति के किसी निश्चित समय या घटना की स्पष्ट व्याख्या नहीं करता। यह केवल यह बताता है कि राज्य क्रमिक विकास का परिणाम है, परंतु यह निश्चित रूप से नहीं बता पाता कि किस समय और किस रूप में राज्य का वास्तविक जन्म हुआ। इसके अतिरिक्त यह सिद्धांत विभिन्न कारकों का उल्लेख तो करता है, परंतु यह स्पष्ट नहीं करता कि उनमें से कौन-सा कारक सबसे अधिक प्रभावशाली था। फिर भी इसकी व्यापकता और ऐतिहासिक दृष्टिकोण के कारण इसे राजनीति विज्ञान में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

मार्क्सवादी सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति की व्याख्या आर्थिक आधार पर करता है। इस सिद्धांत का विकास जर्मन विचारक कार्ल मार्क्स तथा उनके सहयोगी फ्रेडरिक एंगेल्स ने किया। इनके अनुसार राज्य कोई तटस्थ संस्था नहीं है और न ही उसका उद्देश्य सभी लोगों का समान रूप से कल्याण करना है। राज्य की उत्पत्ति समाज में निजी संपत्ति, आर्थिक असमानता तथा वर्ग-संघर्ष के परिणामस्वरूप हुई। मार्क्सवादी दृष्टिकोण में आर्थिक संरचना समाज का आधार होती है और राजनीतिक संस्थाएँ उसी आर्थिक आधार के अनुसार विकसित होती हैं।

मार्क्सवादी सिद्धांत के अनुसार प्रारंभिक समाज सामूहिक स्वामित्व पर आधारित था। उस समय निजी संपत्ति का विकास नहीं हुआ था और समाज में वर्ग विभाजन भी नहीं था। सभी लोग सामूहिक रूप से उत्पादन करते थे और संसाधनों का उपयोग भी सामूहिक रूप से करते थे। इस अवस्था में किसी राज्य की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि शोषण, वर्ग-संघर्ष और संपत्ति का असमान वितरण नहीं था। धीरे-धीरे कृषि, पशुपालन, व्यापार तथा उत्पादन के साधनों के विकास के साथ निजी संपत्ति का उदय हुआ। निजी संपत्ति के कारण समाज में अमीर और गरीब वर्गों का निर्माण हुआ। उत्पादन के साधनों पर अधिकार रखने वाला वर्ग शक्तिशाली बन गया और उसने अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए राज्य का निर्माण किया।

मार्क्सवादी सिद्धांत का केंद्रीय विचार वर्ग-संघर्ष है। इसके अनुसार इतिहास का प्रत्येक युग शोषक और शोषित वर्गों के संघर्ष का इतिहास है। दास और स्वामी, सामंत और कृषक, पूँजीपति और श्रमिक—ये सभी वर्ग एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं। राज्य का निर्माण इस संघर्ष में शासक वर्ग के हितों की रक्षा के लिए हुआ। इसलिए राज्य वास्तव में शासक वर्ग का उपकरण है, जिसके माध्यम से वह अपने आर्थिक और राजनीतिक प्रभुत्व को बनाए रखता है।

मार्क्सवादी विचारधारा के अनुसार पूँजीवादी समाज में राज्य पूँजीपति वर्ग के हितों की रक्षा करता है। कानून, प्रशासन, पुलिस, न्यायालय तथा सेना जैसी संस्थाएँ देखने में सभी नागरिकों के लिए समान प्रतीत होती हैं, परंतु व्यवहार में वे आर्थिक रूप से शक्तिशाली वर्ग के हितों की सुरक्षा करती हैं। इस दृष्टिकोण में राज्य की तटस्थता को अस्वीकार किया गया है। मार्क्सवादी विचारकों का मत है कि जब तक समाज में वर्ग विभाजन रहेगा, तब तक राज्य भी शासक वर्ग का साधन बना रहेगा।

मार्क्सवादी सिद्धांत यह भी प्रतिपादित करता है कि भविष्य में वर्गहीन समाज की स्थापना होगी। जब निजी संपत्ति समाप्त हो जाएगी, उत्पादन के साधनों पर सामूहिक स्वामित्व स्थापित होगा और शोषण का अंत हो जाएगा, तब राज्य की आवश्यकता भी समाप्त हो जाएगी। इस अवस्था को साम्यवादी समाज कहा गया है। मार्क्स के अनुसार राज्य स्थायी संस्था नहीं है, बल्कि यह विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज है और वर्गहीन समाज की स्थापना के साथ उसका धीरे-धीरे लोप हो जाएगा।

मार्क्सवादी सिद्धांत का सबसे बड़ा योगदान यह है कि इसने राज्य के अध्ययन में आर्थिक कारकों को महत्वपूर्ण स्थान दिया। इसने यह स्पष्ट किया कि राजनीति और अर्थव्यवस्था का गहरा संबंध होता है तथा आर्थिक संरचना राजनीतिक संस्थाओं को प्रभावित करती है। इस सिद्धांत ने सामाजिक असमानता, वर्ग-संघर्ष, श्रमिकों की स्थिति तथा आर्थिक शोषण जैसे विषयों पर व्यापक चर्चा को प्रेरित किया। आधुनिक समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में इन विषयों का अध्ययन इसी प्रभाव का परिणाम माना जाता है।

मार्क्सवादी सिद्धांत की अनेक आलोचनाएँ भी की गई हैं। इसकी सबसे बड़ी आलोचना यह है कि यह राज्य को केवल आर्थिक संस्था के रूप में देखता है और उसके सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक तथा कल्याणकारी पक्षों की उपेक्षा करता है। आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों में राज्य केवल पूँजीपति वर्ग के हितों की रक्षा नहीं करता, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, महिला सशक्तिकरण, गरीबी उन्मूलन तथा जनकल्याण जैसी अनेक योजनाएँ भी संचालित करता है। इसलिए राज्य को केवल शोषण का उपकरण मानना उचित नहीं माना जाता।

दूसरी आलोचना यह है कि आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में नागरिकों को मतदान का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा सरकार बदलने का अधिकार प्राप्त है। यदि राज्य केवल शासक वर्ग का साधन होता, तो लोकतांत्रिक परिवर्तन संभव नहीं होते। अनेक देशों में श्रमिकों, किसानों तथा सामान्य नागरिकों के हित में कानून बनाए गए हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक राज्य की भूमिका मार्क्सवादी व्याख्या से अधिक व्यापक है।

तीसरी आलोचना यह है कि वर्गहीन समाज और राज्य के लोप की मार्क्सवादी कल्पना व्यवहार में पूर्ण रूप से सिद्ध नहीं हो सकी। जिन देशों में साम्यवादी शासन स्थापित हुआ, वहाँ भी राज्य का अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ, बल्कि अनेक स्थानों पर राज्य और अधिक शक्तिशाली हो गया। इसलिए राज्य के पूर्ण लोप की अवधारणा को व्यवहारिक दृष्टि से स्वीकार नहीं किया गया।

भारतीय संदर्भ में विकासवादी सिद्धांत और मार्क्सवादी सिद्धांत दोनों का अपना महत्व है। भारतीय समाज का विकास भी परिवार, जनजाति, ग्राम, नगर तथा राजनीतिक संगठनों की क्रमिक प्रक्रिया से हुआ, जो विकासवादी सिद्धांत का समर्थन करता है। दूसरी ओर भारत में भूमि संबंधी असमानता, आर्थिक विषमता, श्रमिक आंदोलनों तथा सामाजिक न्याय के प्रश्नों के अध्ययन में मार्क्सवादी दृष्टिकोण उपयोगी माना जाता है। भारतीय राजनीति के अनेक विद्वानों ने इन दोनों दृष्टिकोणों का उपयोग करके राज्य और समाज के विकास को समझने का प्रयास किया है।

आधुनिक राजनीति विज्ञान में विकासवादी सिद्धांत और मार्क्सवादी सिद्धांत दोनों का महत्वपूर्ण स्थान है। विकासवादी सिद्धांत राज्य के क्रमिक ऐतिहासिक विकास को समझाता है, जबकि मार्क्सवादी सिद्धांत राज्य के आर्थिक और वर्गीय स्वरूप की व्याख्या करता है। दोनों सिद्धांत यह स्पष्ट करते हैं कि राज्य एक गतिशील संस्था है, जिसका विकास विभिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों और सामाजिक परिवर्तनों के साथ हुआ है। इन दोनों दृष्टिकोणों का समन्वित अध्ययन राज्य की प्रकृति, उसकी उत्पत्ति और उसके विकास को अधिक व्यापक रूप से समझने में सहायता प्रदान करता है। इसलिए राजनीति विज्ञान के अध्ययन में इन दोनों सिद्धांतों का विशेष महत्व स्वीकार किया जाता है।

Liberal theory. (उदारवादी सिद्धांत)

उदारवादी सिद्धांत आधुनिक राजनीतिक चिंतन की सबसे प्रभावशाली और व्यापक विचारधाराओं में से एक है। इस सिद्धांत ने आधुनिक लोकतंत्र, मानवाधिकार, संवैधानिक शासन, विधि के शासन, नागरिक स्वतंत्रता तथा कल्याणकारी राज्य जैसी अनेक महत्वपूर्ण अवधारणाओं के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उदारवाद का मूल उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता, गरिमा और अधिकारों की रक्षा करना है। यह विचारधारा इस विश्वास पर आधारित है कि प्रत्येक मनुष्य जन्म से स्वतंत्र है और उसे अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए पर्याप्त अवसर प्राप्त होने चाहिए। राज्य का अस्तित्व व्यक्ति के लिए है, व्यक्ति राज्य के लिए नहीं। इसलिए राज्य की सभी नीतियों और व्यवस्थाओं का अंतिम उद्देश्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना तथा उनके सर्वांगीण विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उपलब्ध कराना होना चाहिए।

उदारवाद का विकास मुख्यतः यूरोप में हुआ, जहाँ मध्यकालीन निरंकुश राजतंत्र, सामंती व्यवस्था तथा धार्मिक नियंत्रण के विरुद्ध स्वतंत्रता, समानता और मानव गरिमा के विचार उभरने लगे। पुनर्जागरण, धर्म-सुधार आंदोलन, वैज्ञानिक क्रांति, औद्योगिक क्रांति तथा लोकतांत्रिक क्रांतियों ने उदारवादी विचारधारा के विकास को गति प्रदान की। इन ऐतिहासिक परिवर्तनों ने यह स्थापित किया कि व्यक्ति की स्वतंत्रता और तर्कशीलता समाज की प्रगति का आधार हैं। धीरे-धीरे उदारवाद केवल एक राजनीतिक विचारधारा न रहकर सामाजिक, आर्थिक और नैतिक दर्शन के रूप में विकसित हो गया।

उदारवादी सिद्धांत का सबसे महत्वपूर्ण आधार व्यक्ति की स्वतंत्रता है। उदारवादी विचारकों के अनुसार प्रत्येक मनुष्य एक स्वतंत्र और विवेकशील प्राणी है। उसे अपने जीवन, विचार, अभिव्यक्ति, धर्म, व्यवसाय तथा सामाजिक संबंधों के विषय में निर्णय लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। स्वतंत्रता का अर्थ केवल बाहरी बंधनों से मुक्ति नहीं है, बल्कि ऐसा वातावरण भी है जिसमें व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर सके। उदारवाद यह स्वीकार करता है कि व्यक्ति समाज का महत्वपूर्ण अंग है, किंतु उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान भी आवश्यक है। इसलिए राज्य को नागरिकों की स्वतंत्रता पर केवल उतना ही नियंत्रण रखना चाहिए जितना सामाजिक व्यवस्था और सार्वजनिक हित के लिए आवश्यक हो।

उदारवादी सिद्धांत का दूसरा महत्वपूर्ण आधार प्राकृतिक अधिकारों की अवधारणा है। उदारवादी विचारकों का मत है कि मनुष्य को कुछ मूल अधिकार जन्म से ही प्राप्त होते हैं। जीवन का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, संपत्ति का अधिकार, विचार व्यक्त करने का अधिकार तथा समानता का अधिकार ऐसे अधिकार हैं जिन्हें राज्य भी बिना उचित कारण समाप्त नहीं कर सकता। राज्य का प्रमुख दायित्व इन अधिकारों की रक्षा करना है। यदि राज्य नागरिकों के अधिकारों का हनन करता है, तो उसकी वैधता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। इसी विचार ने आधुनिक मानवाधिकारों तथा मौलिक अधिकारों की अवधारणा को जन्म दिया।

उदारवादी विचारधारा विधि के शासन पर विशेष बल देती है। इसके अनुसार राज्य में किसी व्यक्ति की इच्छा नहीं, बल्कि कानून की सर्वोच्चता होनी चाहिए। सभी नागरिक, चाहे वे सामान्य व्यक्ति हों या शासक, कानून के समक्ष समान होने चाहिए। किसी को भी मनमाने ढंग से दंडित नहीं किया जा सकता और प्रत्येक व्यक्ति को न्याय प्राप्त करने का समान अवसर मिलना चाहिए। विधि का शासन नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा करता है तथा शासन को निरंकुश बनने से रोकता है। आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्रों में विधि का शासन उदारवादी विचारधारा की सबसे महत्वपूर्ण देन माना जाता है।

उदारवादी सिद्धांत लोकतांत्रिक शासन का समर्थक है। इसके अनुसार सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता होती है। सरकार जनता की सहमति से बनती है और जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। चुनाव, प्रतिनिधित्व, स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र प्रेस, बहुदलीय व्यवस्था तथा नागरिक स्वतंत्रताएँ लोकतंत्र के आवश्यक अंग हैं। उदारवाद यह मानता है कि सरकार की शक्तियाँ सीमित होनी चाहिए और उन पर संविधान तथा कानून का नियंत्रण होना चाहिए। इससे नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रहते हैं और शासन उत्तरदायी बनता है।

उदारवादी विचारधारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानती है। प्रत्येक नागरिक को अपने विचार व्यक्त करने, आलोचना करने, लेखन करने, संगठन बनाने तथा शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का अधिकार होना चाहिए। विचारों की स्वतंत्रता से समाज में नई सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा रचनात्मक विकास को प्रोत्साहन मिलता है। उदारवाद का विश्वास है कि सत्य और प्रगति का मार्ग स्वतंत्र विचार-विमर्श से होकर गुजरता है। इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मूल आधार माना जाता है।

उदारवादी सिद्धांत धार्मिक स्वतंत्रता का भी समर्थक है। इसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी धर्म को मानने, उसका पालन करने, प्रचार करने अथवा किसी भी धर्म का पालन न करने का अधिकार होना चाहिए। राज्य को सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण रखना चाहिए और किसी विशेष धर्म का पक्ष नहीं लेना चाहिए। इस प्रकार उदारवाद धार्मिक सहिष्णुता तथा धर्मनिरपेक्षता की भावना को प्रोत्साहित करता है।

उदारवाद के आर्थिक पक्ष का भी विशेष महत्व है। प्रारंभिक उदारवादी विचारकों का मत था कि आर्थिक क्षेत्र में राज्य का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिए। उनका विश्वास था कि मुक्त प्रतियोगिता, निजी संपत्ति और स्वतंत्र व्यापार से आर्थिक विकास अधिक तीव्र होगा। इस दृष्टिकोण को आर्थिक उदारवाद कहा गया। इसके अनुसार बाजार की शक्तियाँ स्वयं संतुलन स्थापित कर सकती हैं और राज्य को केवल कानून-व्यवस्था तथा सुरक्षा तक सीमित रहना चाहिए। इस विचार ने पूँजीवादी आर्थिक व्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

समय के साथ यह अनुभव किया गया कि केवल मुक्त बाजार से समाज में आर्थिक समानता स्थापित नहीं हो सकती। औद्योगिक क्रांति के बाद श्रमिकों का शोषण, बेरोजगारी, गरीबी तथा सामाजिक असमानता जैसी समस्याएँ बढ़ने लगीं। इसके परिणामस्वरूप आधुनिक उदारवाद का विकास हुआ। आधुनिक उदारवाद यह स्वीकार करता है कि राज्य को केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, रोजगार, श्रमिक कल्याण तथा आर्थिक समानता के लिए भी कार्य करना चाहिए। इस प्रकार उदारवाद ने कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को जन्म दिया।

कल्याणकारी राज्य की धारणा उदारवादी सिद्धांत का महत्वपूर्ण विकास है। इसके अनुसार राज्य का उद्देश्य केवल कानून और व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाना भी है। राज्य को निर्धनों, श्रमिकों, महिलाओं, बच्चों, वृद्धों तथा समाज के कमजोर वर्गों के कल्याण के लिए योजनाएँ बनानी चाहिए। शिक्षा, चिकित्सा, सामाजिक सुरक्षा तथा सार्वजनिक सेवाओं का विस्तार राज्य की जिम्मेदारी मानी जाती है। इस प्रकार आधुनिक उदारवाद व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय दोनों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।

उदारवादी सिद्धांत की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता सहिष्णुता है। उदारवाद यह मानता है कि समाज में विभिन्न विचार, संस्कृतियाँ, धर्म और जीवन-पद्धतियाँ हो सकती हैं। लोकतांत्रिक समाज में सभी व्यक्तियों को अपने विचार रखने तथा दूसरों के विचारों का सम्मान करने का अधिकार होना चाहिए। विविधता को समाज की शक्ति माना जाता है, न कि कमजोरी। यही कारण है कि उदारवाद बहुलवाद और लोकतांत्रिक संवाद को प्रोत्साहित करता है।

उदारवादी सिद्धांत के अनेक महत्वपूर्ण विचारकों ने इसके विकास में योगदान दिया। प्रारंभिक उदारवादी विचारकों ने प्राकृतिक अधिकारों, सीमित सरकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बल दिया, जबकि आधुनिक उदारवादी विचारकों ने सामाजिक न्याय, समान अवसर तथा कल्याणकारी राज्य की अवधारणाओं को विकसित किया। इन सभी विचारकों का उद्देश्य व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन स्थापित करना था।

उदारवादी सिद्धांत की अनेक उपलब्धियों के बावजूद इसकी आलोचनाएँ भी की गई हैं। इसकी सबसे प्रमुख आलोचना यह है कि प्रारंभिक उदारवाद ने आर्थिक स्वतंत्रता पर अत्यधिक बल दिया, जिसके कारण पूँजीपतियों को अधिक लाभ मिला और श्रमिकों का शोषण बढ़ा। मुक्त बाजार की नीति से आर्थिक असमानता बढ़ी और समाज में अमीर तथा गरीब के बीच अंतर गहरा होता गया। इस कारण समाजवादी तथा मार्क्सवादी विचारकों ने उदारवाद की तीखी आलोचना की।

दूसरी आलोचना यह है कि उदारवाद व्यक्ति पर अत्यधिक बल देता है और समाज तथा समुदाय के महत्व को अपेक्षाकृत कम महत्व देता है। आलोचकों का मत है कि मनुष्य केवल स्वतंत्र व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज का सदस्य भी है। इसलिए केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बल देने से सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना कमजोर हो सकती है।

तीसरी आलोचना यह है कि उदारवादी लोकतंत्र में भी आर्थिक रूप से शक्तिशाली वर्ग राजनीति को प्रभावित कर सकता है। चुनाव, प्रचार तथा राजनीतिक दलों पर धन का प्रभाव लोकतांत्रिक समानता को कमजोर कर सकता है। इस प्रकार व्यवहार में उदारवादी व्यवस्था हमेशा समान अवसर प्रदान नहीं कर पाती।

इन आलोचनाओं के बावजूद उदारवादी सिद्धांत का महत्व अत्यंत व्यापक है। आधुनिक विश्व के अधिकांश लोकतांत्रिक देशों की राजनीतिक व्यवस्था उदारवादी मूल्यों पर आधारित है। संविधान, मौलिक अधिकार, स्वतंत्र न्यायपालिका, विधि का शासन, मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता तथा कल्याणकारी नीतियाँ उदारवादी विचारधारा के प्रभाव को स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं। भारत का संविधान भी समानता, स्वतंत्रता, न्याय, लोकतंत्र तथा विधि के शासन जैसे उदारवादी मूल्यों को स्वीकार करता है। भारतीय लोकतंत्र में नागरिकों के मौलिक अधिकार, स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र निर्वाचन प्रणाली तथा संवैधानिक शासन उदारवादी सिद्धांत की भावना को अभिव्यक्त करते हैं।

समकालीन विश्व में भी उदारवाद निरंतर विकसित हो रहा है। वैश्वीकरण, सूचना प्रौद्योगिकी, मानवाधिकारों के विस्तार, लैंगिक समानता, पर्यावरण संरक्षण तथा डिजिटल स्वतंत्रता जैसे नए विषयों ने उदारवादी विचारधारा को और अधिक व्यापक बनाया है। आधुनिक उदारवाद केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर, सतत विकास तथा मानव गरिमा की रक्षा को भी अपना उद्देश्य मानता है।

इस प्रकार उदारवादी सिद्धांत व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता, प्राकृतिक अधिकारों, विधि के शासन, लोकतंत्र, सहिष्णुता तथा कल्याणकारी राज्य का समर्थक है। यह मानता है कि राज्य का उद्देश्य नागरिकों पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि उनकी स्वतंत्रता, सुरक्षा और विकास को सुनिश्चित करना है। समय के साथ उदारवाद ने स्वयं को बदलती सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार विकसित किया है। यही कारण है कि आज भी यह आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था की सबसे प्रभावशाली और प्रासंगिक विचारधाराओं में से एक माना जाता है तथा राजनीति विज्ञान के अध्ययन में इसका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।

Socialist theory and Welfare theory. (समाजवादी सिद्धांत तथा कल्याणकारी सिद्धांत)

समाजवादी सिद्धांत तथा कल्याणकारी सिद्धांत आधुनिक राजनीतिक चिंतन की दो अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं जिन्होंने राज्य की भूमिका, उद्देश्य तथा नागरिकों के प्रति उसकी जिम्मेदारियों को नई दिशा प्रदान की है। दोनों सिद्धांतों का मूल उद्देश्य समाज में न्याय, समानता और मानव कल्याण की स्थापना करना है, किंतु इनकी कार्यप्रणाली, विचारधारा तथा राज्य के स्वरूप के संबंध में दृष्टिकोण अलग-अलग है। समाजवादी सिद्धांत आर्थिक और सामाजिक समानता पर विशेष बल देता है तथा उत्पादन के साधनों पर समाज अथवा राज्य के नियंत्रण का समर्थन करता है, जबकि कल्याणकारी सिद्धांत यह मानता है कि राज्य का मुख्य उद्देश्य प्रत्येक नागरिक के जीवन स्तर को ऊँचा उठाना, सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना तथा सभी को समान अवसर उपलब्ध कराना है। आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में इन दोनों विचारधाराओं का प्रभाव विभिन्न रूपों में दिखाई देता है।

समाजवादी सिद्धांत का उद्भव औद्योगिक क्रांति के बाद उत्पन्न सामाजिक और आर्थिक असमानताओं की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ। औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन और व्यापार में अभूतपूर्व वृद्धि की, किंतु इसके साथ ही समाज में पूँजीपतियों और श्रमिकों के बीच गहरी आर्थिक विषमता भी उत्पन्न हो गई। कारखानों में कार्यरत श्रमिकों को अत्यंत कम वेतन, लंबे कार्य घंटे, असुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ तथा सामाजिक असमानता का सामना करना पड़ता था। दूसरी ओर उद्योगों के मालिक अत्यधिक धन और संसाधनों पर नियंत्रण रखते थे। इस असंतुलन ने अनेक विचारकों को यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि समाज में आर्थिक न्याय और समानता स्थापित करने के लिए नई व्यवस्था की आवश्यकता है। इसी पृष्ठभूमि में समाजवादी विचारधारा का विकास हुआ।

समाजवादी सिद्धांत का मूल आधार समानता है। इसके अनुसार समाज में प्रत्येक व्यक्ति को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से समान अवसर प्राप्त होने चाहिए। अत्यधिक धन-संपत्ति का कुछ व्यक्तियों के हाथों में केंद्रित होना समाज के लिए हानिकारक माना जाता है। इसलिए समाजवादी विचारधारा उत्पादन के साधनों पर समाज या राज्य के नियंत्रण का समर्थन करती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग केवल कुछ व्यक्तियों के लाभ के लिए नहीं बल्कि पूरे समाज के कल्याण के लिए किया जाए। समाजवाद का विश्वास है कि आर्थिक असमानता सामाजिक अन्याय को जन्म देती है, इसलिए राज्य को ऐसी नीतियाँ अपनानी चाहिए जिनसे समाज में समानता और न्याय की स्थापना हो सके।

समाजवादी विचारधारा निजी संपत्ति के प्रश्न पर विशेष ध्यान देती है। समाजवाद के विभिन्न रूपों में इस विषय पर मतभेद अवश्य हैं, किंतु सामान्य रूप से यह माना जाता है कि उत्पादन के प्रमुख साधनों पर समाज का नियंत्रण होना चाहिए। इससे उत्पादन का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँच सकेगा। समाजवाद का उद्देश्य निजी संपत्ति को पूरी तरह समाप्त करना नहीं, बल्कि उसके कारण उत्पन्न शोषण और असमानता को समाप्त करना है। आधुनिक लोकतांत्रिक समाजवादी व्यवस्थाओं में निजी संपत्ति को स्वीकार किया जाता है, किंतु उसके साथ सामाजिक उत्तरदायित्व और राज्य के नियमन पर भी बल दिया जाता है।

समाजवादी सिद्धांत राज्य को एक सक्रिय संस्था के रूप में देखता है। इसके अनुसार राज्य केवल कानून और व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं रह सकता। उसे आर्थिक नियोजन, उद्योगों का विकास, रोजगार सृजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा तथा निर्धनों के उत्थान के लिए सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। राज्य को समाज के कमजोर वर्गों की रक्षा करनी चाहिए और ऐसी नीतियाँ बनानी चाहिए जिनसे सभी नागरिक सम्मानजनक जीवन जी सकें। समाजवादी दृष्टिकोण में राज्य सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख साधन माना जाता है।

समाजवादी सिद्धांत सामाजिक न्याय को सर्वोच्च महत्व देता है। इसके अनुसार प्रत्येक नागरिक को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, भोजन, आवास तथा सम्मानजनक जीवन की सुविधाएँ प्राप्त होनी चाहिए। समाज में जाति, वर्ग, लिंग, धर्म अथवा आर्थिक स्थिति के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। समाजवाद समान अवसरों के साथ-साथ समान परिणामों की दिशा में भी प्रयास करता है। इसका विश्वास है कि जब तक आर्थिक असमानता समाप्त नहीं होगी, तब तक वास्तविक स्वतंत्रता और समानता संभव नहीं हो सकती।

समाजवादी विचारधारा के विकास में अनेक विचारकों का योगदान रहा। प्रारंभिक समाजवादियों ने सहयोग, समानता तथा सामूहिक स्वामित्व की अवधारणाओं को विकसित किया। बाद में वैज्ञानिक समाजवाद के रूप में आर्थिक संरचना, वर्ग-संघर्ष तथा सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या प्रस्तुत की गई। आधुनिक लोकतांत्रिक समाजवाद ने इन विचारों को लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ जोड़ते हुए यह प्रतिपादित किया कि सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से भी प्राप्त किया जा सकता है।

समाजवादी सिद्धांत की अनेक विशेषताएँ हैं। यह शोषण का विरोध करता है, निर्धनों के हितों की रक्षा करता है, सामाजिक समानता को बढ़ावा देता है तथा राज्य को जनकल्याणकारी भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, श्रमिक अधिकार, सामाजिक सुरक्षा तथा भूमि सुधार जैसी नीतियों पर समाजवादी विचारधारा का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में भी समाजवादी मूल्यों को संवैधानिक स्तर पर स्वीकार किया गया है।

समाजवादी सिद्धांत की आलोचनाएँ भी की गई हैं। आलोचकों का मत है कि राज्य का अत्यधिक नियंत्रण व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है। यदि सभी आर्थिक गतिविधियाँ राज्य के हाथों में हों, तो प्रतियोगिता कम हो सकती है और उत्पादन क्षमता प्रभावित हो सकती है। कुछ आलोचकों का यह भी मत है कि अत्यधिक सरकारी नियंत्रण से नौकरशाही बढ़ती है और आर्थिक विकास की गति धीमी हो सकती है। फिर भी आधुनिक समाजवादी विचारधारा ने इन आलोचनाओं को ध्यान में रखते हुए मिश्रित अर्थव्यवस्था तथा लोकतांत्रिक समाजवाद जैसी अवधारणाओं को विकसित किया है।

कल्याणकारी सिद्धांत आधुनिक राज्य की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है। इस सिद्धांत का मूल विचार यह है कि राज्य का उद्देश्य केवल शासन करना या कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के जीवन को सुरक्षित, सम्मानजनक और समृद्ध बनाना भी है। कल्याणकारी राज्य वह है जो नागरिकों के सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक विकास के लिए सक्रिय रूप से कार्य करता है। इस सिद्धांत के अनुसार राज्य का दायित्व केवल अपराध रोकना या सीमाओं की रक्षा करना नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण तथा आर्थिक विकास जैसे क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाना है।

कल्याणकारी सिद्धांत का विकास विशेष रूप से बीसवीं शताब्दी में हुआ। औद्योगिक विकास, आर्थिक मंदी, विश्व युद्धों तथा सामाजिक असमानताओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल मुक्त बाजार या सीमित सरकार से समाज की सभी समस्याओं का समाधान संभव नहीं है। निर्धनता, बेरोजगारी, बीमारी तथा सामाजिक असुरक्षा जैसी समस्याओं के समाधान के लिए राज्य के सक्रिय हस्तक्षेप की आवश्यकता अनुभव की गई। इसी से कल्याणकारी राज्य की अवधारणा विकसित हुई।

कल्याणकारी सिद्धांत का मुख्य उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को न्यूनतम जीवन स्तर की गारंटी प्रदान करना है। इसके अंतर्गत राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, रोजगार योजनाएँ, वृद्धावस्था पेंशन, बेरोजगारी सहायता, मातृत्व लाभ, बाल संरक्षण तथा सामाजिक सुरक्षा जैसी योजनाओं का संचालन करता है। राज्य यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी नागरिक केवल आर्थिक अभाव के कारण अपने मूल अधिकारों से वंचित न रहे। इस प्रकार कल्याणकारी राज्य सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा की रक्षा का माध्यम बनता है।

कल्याणकारी सिद्धांत समान अवसरों पर विशेष बल देता है। इसका उद्देश्य यह नहीं कि सभी व्यक्तियों की आय समान हो, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के विकास के लिए समान अवसर प्राप्त हों। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, रोजगार के अवसर तथा सामाजिक सुरक्षा इसी उद्देश्य की पूर्ति करते हैं। इस प्रकार कल्याणकारी राज्य व्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।

आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों में कल्याणकारी सिद्धांत का व्यापक प्रभाव दिखाई देता है। अधिकांश देशों में सरकारें निर्धनों, किसानों, श्रमिकों, महिलाओं, बच्चों तथा समाज के कमजोर वर्गों के लिए विभिन्न योजनाएँ संचालित करती हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ, निःशुल्क या सस्ती शिक्षा, खाद्य सुरक्षा, आवास योजनाएँ तथा सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम कल्याणकारी राज्य की प्रमुख विशेषताएँ हैं। भारत में भी अनेक योजनाएँ जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, ग्रामीण विकास तथा सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम इसी सिद्धांत की भावना पर आधारित हैं।

कल्याणकारी सिद्धांत की प्रमुख विशेषता यह है कि यह लोकतंत्र और सामाजिक न्याय दोनों का समन्वय करता है। यह व्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है, किंतु साथ ही यह भी स्वीकार करता है कि केवल स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है। यदि व्यक्ति निर्धन, अशिक्षित या अस्वस्थ होगा, तो वह अपनी स्वतंत्रता का वास्तविक उपयोग नहीं कर सकेगा। इसलिए राज्य का दायित्व है कि वह नागरिकों को ऐसी सुविधाएँ उपलब्ध कराए जिससे वे अपने जीवन का पूर्ण विकास कर सकें।

कल्याणकारी सिद्धांत की आलोचनाएँ भी की जाती हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि अत्यधिक कल्याणकारी योजनाओं से राज्य पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है। इससे करों में वृद्धि हो सकती है तथा सरकारी व्यय अत्यधिक बढ़ सकता है। कुछ आलोचकों का यह भी कहना है कि यदि राज्य प्रत्येक क्षेत्र में अत्यधिक हस्तक्षेप करेगा, तो नागरिकों में आत्मनिर्भरता की भावना कम हो सकती है। फिर भी अधिकांश आधुनिक लोकतांत्रिक देशों ने यह स्वीकार किया है कि सामाजिक न्याय और आर्थिक सुरक्षा के लिए कल्याणकारी नीतियाँ आवश्यक हैं।

समाजवादी सिद्धांत और कल्याणकारी सिद्धांत में अनेक समानताएँ भी हैं। दोनों सामाजिक न्याय, समानता तथा निर्धनों के कल्याण पर बल देते हैं। दोनों यह स्वीकार करते हैं कि राज्य को केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि नागरिकों के विकास के लिए सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। दोनों विचारधाराएँ शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सामाजिक सुरक्षा के महत्व को स्वीकार करती हैं। किंतु दोनों में महत्वपूर्ण अंतर भी है। समाजवादी सिद्धांत आर्थिक समानता और उत्पादन के साधनों पर सामाजिक नियंत्रण पर अधिक बल देता है, जबकि कल्याणकारी सिद्धांत निजी संपत्ति और बाजार व्यवस्था को स्वीकार करते हुए भी राज्य के माध्यम से सामाजिक सुरक्षा और समान अवसर उपलब्ध कराने का समर्थन करता है। समाजवाद आर्थिक संरचना में व्यापक परिवर्तन चाहता है, जबकि कल्याणकारी सिद्धांत मौजूदा व्यवस्था के भीतर रहकर नागरिकों के जीवन स्तर को सुधारने का प्रयास करता है।

भारतीय संविधान में भी इन दोनों विचारधाराओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की स्थापना का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। राज्य के नीति-निर्देशक तत्व सरकार को समाज के कमजोर वर्गों के कल्याण, समान अवसरों की उपलब्धता तथा आर्थिक न्याय की दिशा में कार्य करने के लिए प्रेरित करते हैं। इसी कारण भारत को एक लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राज्य माना जाता है, जहाँ समाजवादी मूल्यों तथा कल्याणकारी नीतियों का संतुलित समावेश दिखाई देता है।

इस प्रकार समाजवादी सिद्धांत और कल्याणकारी सिद्धांत दोनों आधुनिक राजनीतिक चिंतन की अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं। समाजवादी सिद्धांत आर्थिक समानता, सामाजिक न्याय तथा शोषण की समाप्ति पर बल देता है, जबकि कल्याणकारी सिद्धांत नागरिकों के सर्वांगीण विकास, सामाजिक सुरक्षा तथा समान अवसरों की उपलब्धता को राज्य का प्रमुख उद्देश्य मानता है। आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में इन दोनों विचारधाराओं के सकारात्मक तत्वों का समन्वय देखने को मिलता है। यही कारण है कि वर्तमान समय में अधिकांश देशों की शासन व्यवस्था में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास और जनकल्याण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। इन दोनों सिद्धांतों का अध्ययन राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों को राज्य की बदलती भूमिका, आधुनिक शासन व्यवस्था तथा सामाजिक न्याय की अवधारणा को गहराई से समझने में महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करता है।

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Sovereignty: Monism and Pluralism. Law: Definition: Source. (सम्प्रभुता: अद्वैतवाद (एकत्ववाद) तथा बहुलवाद। विधि: परिभाषा एवं स्रोत।)

सम्प्रभुता राजनीति विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण और आधारभूत अवधारणाओं में से एक है। राज्य को अन्य सभी सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक संस्थाओं से अलग करने वाली सबसे प्रमुख विशेषता उसकी सम्प्रभुता मानी जाती है। सम्प्रभुता के बिना राज्य की कल्पना अधूरी मानी जाती है, क्योंकि यही वह सर्वोच्च शक्ति है जिसके आधार पर राज्य अपने क्षेत्र के भीतर कानून बनाता है, उनका पालन सुनिश्चित करता है तथा नागरिकों और संस्थाओं पर अपना अधिकार स्थापित करता है। आधुनिक राजनीति विज्ञान में सम्प्रभुता का अर्थ राज्य की सर्वोच्च, अंतिम और स्वतंत्र शक्ति से लगाया जाता है। यह ऐसी शक्ति है जिसके ऊपर राज्य की सीमाओं के भीतर कोई अन्य शक्ति नहीं होती तथा जो बाहरी दृष्टि से भी स्वतंत्र मानी जाती है। सम्प्रभुता के माध्यम से राज्य अपनी राजनीतिक इच्छा व्यक्त करता है और प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन करता है।

सम्प्रभुता की अवधारणा का व्यवस्थित विकास आधुनिक यूरोप में राष्ट्रीय राज्यों के उदय के साथ हुआ। मध्यकालीन यूरोप में चर्च, सामंतों तथा राजाओं के बीच सत्ता का विभाजन था, जिसके कारण किसी एक संस्था को सर्वोच्च नहीं माना जाता था। आधुनिक राष्ट्र-राज्य के विकास के साथ यह विचार सामने आया कि राज्य के पास ऐसी सर्वोच्च शक्ति होनी चाहिए जो उसके क्षेत्र के भीतर अंतिम निर्णय लेने में सक्षम हो। इसी विचार ने सम्प्रभुता की आधुनिक अवधारणा को जन्म दिया। बाद में अनेक राजनीतिक विचारकों ने इसकी विभिन्न व्याख्याएँ प्रस्तुत कीं और इसके स्वरूप तथा सीमाओं पर विस्तृत विचार किया।

सम्प्रभुता के दो प्रमुख पक्ष माने जाते हैं—आंतरिक सम्प्रभुता और बाह्य सम्प्रभुता। आंतरिक सम्प्रभुता का अर्थ है कि राज्य अपने क्षेत्र के भीतर रहने वाले सभी व्यक्तियों, संगठनों और संस्थाओं पर सर्वोच्च अधिकार रखता है। उसके द्वारा बनाए गए कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं और कोई भी संस्था राज्य से ऊपर नहीं होती। बाह्य सम्प्रभुता का अर्थ है कि राज्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र होता है और किसी अन्य राज्य के अधीन नहीं रहता। वह अपनी विदेश नीति, सुरक्षा, आर्थिक संबंध तथा अंतरराष्ट्रीय निर्णय स्वयं लेने की क्षमता रखता है। आधुनिक विश्व में अंतरराष्ट्रीय संगठनों और वैश्विक सहयोग के बढ़ते प्रभाव के बावजूद सम्प्रभुता राज्य की मूल विशेषता बनी हुई है।

सम्प्रभुता की प्रकृति को लेकर राजनीति विज्ञान में दो प्रमुख दृष्टिकोण विकसित हुए जिन्हें अद्वैतवाद अथवा एकत्ववाद तथा बहुलवाद के नाम से जाना जाता है। अद्वैतवादी दृष्टिकोण यह मानता है कि राज्य में सम्प्रभुता एक ही स्थान पर निहित होती है और उसका विभाजन नहीं किया जा सकता। इस दृष्टिकोण के अनुसार यदि राज्य में एक से अधिक सर्वोच्च शक्तियाँ होंगी तो शासन व्यवस्था में अराजकता उत्पन्न हो जाएगी। इसलिए सम्प्रभुता का एक ही केंद्र होना आवश्यक है। अद्वैतवादी विचारकों का मत है कि राज्य की सर्वोच्च शक्ति अविभाज्य, असीमित और अंतिम होती है। राज्य के भीतर कोई भी अन्य संस्था उसके बराबर या उससे ऊपर नहीं हो सकती।

अद्वैतवादी सिद्धांत के समर्थकों का मानना है कि राज्य की एकता और स्थिरता के लिए सम्प्रभुता का केंद्रीकरण आवश्यक है। यदि विभिन्न संस्थाएँ स्वयं को सर्वोच्च मानने लगें तो कानूनों का पालन कठिन हो जाएगा और राजनीतिक व्यवस्था कमजोर पड़ जाएगी। इस दृष्टिकोण में राज्य को समाज की सर्वोच्च संस्था माना जाता है तथा अन्य सभी संस्थाएँ राज्य के अधीन कार्य करती हैं। इस सिद्धांत के अनुसार राज्य की शक्ति ही विधि और प्रशासन का अंतिम स्रोत है। आधुनिक राष्ट्रीय राज्यों के निर्माण में इस विचारधारा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई क्योंकि इससे राजनीतिक एकीकरण और प्रशासनिक केंद्रीकरण को बल मिला।

अद्वैतवादी सिद्धांत की अनेक विशेषताएँ हैं। यह राज्य की एकता, प्रशासनिक दक्षता और विधिक व्यवस्था को मजबूत बनाता है। राज्य के अधिकार स्पष्ट रहते हैं तथा कानूनों के पालन में किसी प्रकार की अस्पष्टता नहीं रहती। राष्ट्रीय सुरक्षा, न्याय व्यवस्था तथा शासन की स्थिरता के लिए भी इस सिद्धांत को उपयोगी माना गया है। फिर भी इसकी आलोचना यह कहकर की जाती है कि यह राज्य की शक्ति को अत्यधिक महत्व देता है और समाज की अन्य संस्थाओं के महत्व को कम करके देखता है। यदि सम्प्रभुता को पूर्णतः असीमित मान लिया जाए तो निरंकुश शासन की संभावना बढ़ सकती है। आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में संविधान, न्यायपालिका, नागरिक अधिकार तथा स्थानीय संस्थाएँ राज्य की शक्ति पर नियंत्रण स्थापित करती हैं, इसलिए सम्प्रभुता को पूर्णतः असीमित नहीं माना जाता।

बहुलवादी सिद्धांत अद्वैतवादी दृष्टिकोण का विरोध करता है। बहुलवाद के अनुसार समाज में राज्य के अतिरिक्त भी अनेक महत्वपूर्ण संस्थाएँ होती हैं जैसे परिवार, धार्मिक संगठन, सहकारी संस्थाएँ, विश्वविद्यालय, श्रमिक संगठन, व्यावसायिक संघ, स्थानीय निकाय तथा अन्य सामाजिक संगठन। ये संस्थाएँ भी अपने-अपने क्षेत्र में अधिकार और प्रभाव रखती हैं। इसलिए सम्प्रभुता केवल राज्य में केंद्रित नहीं मानी जा सकती। बहुलवादी विचारकों का मत है कि समाज अनेक स्वायत्त संस्थाओं का समूह है और राज्य उनमें से केवल एक महत्वपूर्ण संस्था है। राज्य का महत्व स्वीकार किया जाता है, परंतु उसे समाज की अन्य संस्थाओं से पूर्णतः ऊपर नहीं माना जाता।

बहुलवाद का आधार यह विचार है कि समाज का विकास सहयोग और सहभागिता से होता है। यदि राज्य सभी क्षेत्रों पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर ले, तो नागरिक स्वतंत्रता तथा सामाजिक स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है। इसलिए समाज की विभिन्न संस्थाओं को अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अवसर मिलना चाहिए। बहुलवादी दृष्टिकोण लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण, स्थानीय स्वशासन तथा नागरिक समाज की भूमिका पर विशेष बल देता है। इसके अनुसार राज्य को समाज की विभिन्न संस्थाओं के साथ समन्वय स्थापित करना चाहिए, न कि उन पर पूर्ण प्रभुत्व स्थापित करना चाहिए।

बहुलवादी सिद्धांत आधुनिक लोकतांत्रिक समाजों के अधिक निकट माना जाता है क्योंकि आज अधिकांश देशों में राज्य के साथ-साथ अनेक स्वायत्त संस्थाएँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। संविधान, न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग, स्थानीय निकाय, मीडिया, विश्वविद्यालय, गैर-सरकारी संगठन तथा नागरिक समूह समाज के विकास में सक्रिय योगदान देते हैं। बहुलवाद इन सभी संस्थाओं के महत्व को स्वीकार करता है और यह मानता है कि लोकतंत्र की सफलता के लिए सत्ता का संतुलन आवश्यक है।

यद्यपि बहुलवादी सिद्धांत लोकतांत्रिक मूल्यों का समर्थन करता है, फिर भी इसकी आलोचना यह कहकर की जाती है कि यदि राज्य की सर्वोच्चता को अत्यधिक सीमित कर दिया जाए तो राष्ट्रीय एकता और प्रशासनिक दक्षता प्रभावित हो सकती है। किसी भी समाज में अंतिम निर्णय लेने के लिए एक सर्वोच्च राजनीतिक संस्था का होना आवश्यक माना जाता है। इसलिए आलोचकों का मत है कि बहुलवाद राज्य की वास्तविक भूमिका को अपेक्षाकृत कम करके देखता है। आधुनिक राजनीति विज्ञान में यह स्वीकार किया जाता है कि राज्य सर्वोच्च राजनीतिक संस्था अवश्य है, परंतु उसे संविधान, कानून और लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से नियंत्रित भी किया जाना चाहिए। इस प्रकार आधुनिक लोकतंत्र में अद्वैतवाद और बहुलवाद दोनों के तत्व किसी न किसी रूप में दिखाई देते हैं।

विधि राजनीति विज्ञान और विधिशास्त्र की एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है। किसी भी संगठित समाज में व्यवस्था बनाए रखने, न्याय स्थापित करने, अधिकारों की रक्षा करने तथा सामाजिक जीवन को नियमित करने के लिए विधि की आवश्यकता होती है। सामान्य अर्थ में विधि उन नियमों और सिद्धांतों का समूह है जिन्हें राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त होती है और जिनका पालन प्रत्येक नागरिक के लिए अनिवार्य होता है। विधि केवल नैतिक उपदेश नहीं होती, बल्कि उसके पालन को सुनिश्चित करने के लिए राज्य के पास दंड देने की शक्ति भी होती है। इस प्रकार विधि समाज में अनुशासन, सुरक्षा और न्याय की आधारशिला है।

विधि की परिभाषा अनेक विद्वानों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत की है। सामान्य रूप से कहा जा सकता है कि विधि ऐसे नियमों का समूह है जिन्हें सक्षम राजनीतिक सत्ता द्वारा बनाया या मान्यता दी जाती है और जिनका पालन राज्य की शक्ति द्वारा सुनिश्चित किया जाता है। विधि का उद्देश्य समाज में शांति, न्याय, समानता तथा व्यवस्था बनाए रखना होता है। यह नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों का निर्धारण करती है तथा विभिन्न सामाजिक संबंधों को नियमित करती है।

विधि के अनेक स्रोत होते हैं जिनके आधार पर कानूनों का निर्माण और विकास होता है। सबसे महत्वपूर्ण स्रोत संविधान है। संविधान किसी भी राज्य का सर्वोच्च विधिक दस्तावेज होता है और अन्य सभी कानून उसी के अनुरूप बनाए जाते हैं। संविधान राज्य की संरचना, सरकार की शक्तियों, नागरिकों के अधिकारों तथा शासन के मूल सिद्धांतों का निर्धारण करता है। इसलिए संविधान को विधि का सर्वोच्च स्रोत माना जाता है।

विधायिका भी विधि का प्रमुख स्रोत है। लोकतांत्रिक देशों में संसद अथवा विधानमंडल द्वारा विभिन्न विषयों पर कानून बनाए जाते हैं। ये कानून समाज की आवश्यकताओं, बदलती परिस्थितियों तथा सार्वजनिक हित को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। आधुनिक राज्यों में अधिकांश विधियाँ विधायिका द्वारा ही निर्मित होती हैं।

न्यायिक निर्णय भी विधि का महत्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं। न्यायालय जब किसी विवाद का निर्णय करते हैं, तो वे संविधान और कानूनों की व्याख्या भी करते हैं। अनेक बार न्यायालयों के निर्णय भविष्य के मामलों के लिए मार्गदर्शक बन जाते हैं और विधि के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। विशेष रूप से उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय विधिक व्यवस्था को स्पष्ट और समृद्ध बनाते हैं।

रीति-रिवाज और परंपराएँ भी विधि के प्राचीन स्रोत हैं। मानव समाज के प्रारंभिक चरण में लिखित कानून नहीं थे। लोग सामाजिक परंपराओं और प्रचलित रीति-रिवाजों के अनुसार जीवन व्यतीत करते थे। समय के साथ इनमें से अनेक परंपराओं को राज्य ने मान्यता प्रदान की और वे विधि का भाग बन गईं। आज भी अनेक देशों में पारिवारिक, उत्तराधिकार तथा सामाजिक मामलों में प्रथागत विधियों का महत्व बना हुआ है।

धर्म भी इतिहास में विधि का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। प्राचीन समाजों में धार्मिक ग्रंथों और धार्मिक सिद्धांतों के आधार पर अनेक नियम बनाए गए। यद्यपि आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों में धर्म और राज्य को अलग रखने का सिद्धांत स्वीकार किया जाता है, फिर भी अनेक देशों की विधिक परंपराओं पर धार्मिक विचारों का प्रभाव आज भी देखा जा सकता है।

विद्वानों की टीकाएँ और विधिशास्त्र भी विधि के विकास में योगदान देते हैं। विभिन्न विधिवेत्ता, न्यायविद् तथा राजनीतिक विचारक कानूनों की व्याख्या करते हैं, उनकी कमियों की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं तथा सुधार के सुझाव देते हैं। उनके विचार विधिक सुधार और न्यायिक व्याख्या में सहायक होते हैं।

अंतरराष्ट्रीय विधि भी आधुनिक युग में विधि का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गई है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संधियाँ, समझौते, अभिसमय तथा वैश्विक संस्थाओं के निर्णय अंतरराष्ट्रीय संबंधों को नियमित करते हैं। अनेक देशों की राष्ट्रीय विधियों पर भी अंतरराष्ट्रीय मानकों का प्रभाव दिखाई देता है।

सम्प्रभुता और विधि का संबंध अत्यंत घनिष्ठ है। सम्प्रभुता राज्य को कानून बनाने और लागू करने की शक्ति प्रदान करती है, जबकि विधि राज्य की शक्ति को वैधता और दिशा प्रदान करती है। यदि राज्य के पास सम्प्रभुता न हो तो वह प्रभावी कानून लागू नहीं कर सकता और यदि विधि न हो तो सम्प्रभुता निरंकुश शक्ति में परिवर्तित हो सकती है। आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में दोनों के बीच संतुलन स्थापित किया गया है। राज्य कानून बनाता है, किंतु स्वयं भी संविधान और विधि के अधीन रहता है।

इस प्रकार सम्प्रभुता राज्य की सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति का प्रतीक है, जबकि विधि उस शक्ति के न्यायपूर्ण और व्यवस्थित प्रयोग का माध्यम है। अद्वैतवाद राज्य की सर्वोच्चता और शक्ति की एकता पर बल देता है, जबकि बहुलवाद समाज की विभिन्न संस्थाओं के महत्व और विकेंद्रीकरण का समर्थन करता है। इसी प्रकार विधि समाज में न्याय, व्यवस्था, अधिकारों की रक्षा और सामाजिक संतुलन स्थापित करने का सबसे प्रभावी साधन है। आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य में सम्प्रभुता और विधि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं तथा नागरिकों की स्वतंत्रता, समानता और न्यायपूर्ण जीवन की आधारशिला माने जाते हैं।

Classification. Punishment: Theories of punishment. (विधि का वर्गीकरण तथा दण्ड के सिद्धांत।)

विधि किसी भी संगठित समाज की आधारशिला होती है। यह समाज में व्यवस्था, न्याय, अनुशासन और शांति बनाए रखने का सबसे प्रभावी साधन मानी जाती है। प्रत्येक राज्य अपने नागरिकों के जीवन को व्यवस्थित करने, उनके अधिकारों की रक्षा करने, कर्तव्यों का निर्धारण करने तथा सामाजिक संबंधों को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न प्रकार की विधियों का निर्माण करता है। समाज जितना अधिक विकसित और जटिल होता जाता है, उसकी आवश्यकताओं के अनुसार विधियों का स्वरूप भी उतना ही विस्तृत और विविध होता जाता है। इसी कारण राजनीति विज्ञान तथा विधिशास्त्र में विधि का वर्गीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। विधि के वर्गीकरण से यह समझने में सहायता मिलती है कि विभिन्न प्रकार के कानून किन परिस्थितियों में लागू होते हैं, उनका उद्देश्य क्या है तथा वे समाज और राज्य की व्यवस्था को किस प्रकार संचालित करते हैं।

विधि का वर्गीकरण अनेक आधारों पर किया जाता है। सबसे सामान्य वर्गीकरण सार्वजनिक विधि और निजी विधि के रूप में किया जाता है। सार्वजनिक विधि वह विधि है जो राज्य तथा नागरिकों के बीच संबंधों को नियंत्रित करती है। इसमें राज्य की शक्तियाँ, नागरिकों के अधिकार, प्रशासनिक कार्य, संवैधानिक व्यवस्था तथा अपराध संबंधी नियम सम्मिलित होते हैं। संवैधानिक विधि, प्रशासनिक विधि तथा दंड विधि सार्वजनिक विधि के प्रमुख अंग माने जाते हैं। दूसरी ओर निजी विधि वह होती है जो नागरिकों के पारस्परिक संबंधों को नियंत्रित करती है। इसमें संपत्ति, अनुबंध, विवाह, उत्तराधिकार, व्यापार तथा व्यक्तिगत अधिकारों से संबंधित नियम सम्मिलित होते हैं। निजी विधि का उद्देश्य व्यक्तियों के बीच उत्पन्न विवादों का समाधान करना तथा उनके अधिकारों की रक्षा करना है।

विधि का एक अन्य महत्वपूर्ण वर्गीकरण राष्ट्रीय विधि और अंतरराष्ट्रीय विधि के रूप में किया जाता है। राष्ट्रीय विधि वह होती है जो किसी विशेष राज्य के भीतर लागू होती है और उसके सभी नागरिकों तथा संस्थाओं पर समान रूप से प्रभावी होती है। यह विधि संविधान, संसद, न्यायालय तथा अन्य विधिक संस्थाओं द्वारा संचालित होती है। इसके विपरीत अंतरराष्ट्रीय विधि विभिन्न राज्यों के बीच संबंधों को नियंत्रित करने वाले नियमों और सिद्धांतों का समूह है। अंतरराष्ट्रीय संधियाँ, समझौते, अभिसमय तथा वैश्विक संस्थाओं के निर्णय अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रमुख स्रोत माने जाते हैं। आधुनिक युग में वैश्वीकरण तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बढ़ते प्रभाव के कारण अंतरराष्ट्रीय विधि का महत्व निरंतर बढ़ता जा रहा है।

विधि का वर्गीकरण लिखित और अलिखित विधि के रूप में भी किया जाता है। लिखित विधि वह होती है जिसे विधायिका या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा लिखित रूप में निर्मित किया जाता है। संविधान, अधिनियम, नियम तथा सरकारी अधिसूचनाएँ इसके प्रमुख उदाहरण हैं। लिखित विधि का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसके नियम स्पष्ट और निश्चित होते हैं। दूसरी ओर अलिखित विधि वे नियम हैं जो समाज की परंपराओं, रीति-रिवाजों तथा प्रचलित मान्यताओं पर आधारित होते हैं। प्रारंभिक समाजों में अधिकांश विधियाँ अलिखित थीं और लोग सामाजिक परंपराओं के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करते थे। समय के साथ इनमें से अनेक प्रथाओं को राज्य ने मान्यता दी और वे विधिक व्यवस्था का भाग बन गईं।

विधि को सामान्य विधि और विशेष विधि के रूप में भी वर्गीकृत किया जाता है। सामान्य विधि वह होती है जो सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होती है। इसके विपरीत विशेष विधि किसी विशेष वर्ग, संस्था, व्यवसाय अथवा परिस्थिति के लिए बनाई जाती है। उदाहरण के रूप में श्रम कानून, सैनिक कानून, कर कानून या बाल संरक्षण से संबंधित विशेष कानूनों का उल्लेख किया जा सकता है। इनका उद्देश्य विशेष परिस्थितियों में न्याय और व्यवस्था सुनिश्चित करना होता है।

विधि के वर्गीकरण में संवैधानिक विधि, प्रशासनिक विधि, दंड विधि, दीवानी विधि, व्यापारिक विधि तथा श्रम विधि जैसे विभिन्न क्षेत्रों का भी उल्लेख किया जाता है। संवैधानिक विधि राज्य की मूल संरचना, शासन प्रणाली, नागरिकों के मौलिक अधिकारों तथा सरकार की शक्तियों का निर्धारण करती है। प्रशासनिक विधि सरकारी अधिकारियों तथा प्रशासनिक संस्थाओं के कार्यों को नियंत्रित करती है। दंड विधि अपराधों और उनके लिए निर्धारित दंड का वर्णन करती है। दीवानी विधि नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों तथा संपत्ति संबंधी विवादों का समाधान करती है। व्यापारिक विधि व्यापार, उद्योग तथा वाणिज्यिक गतिविधियों को नियंत्रित करती है। श्रम विधि श्रमिकों और नियोक्ताओं के बीच संबंधों को नियमित करती है तथा श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करती है। इस प्रकार विधि का वर्गीकरण समाज की विभिन्न आवश्यकताओं के अनुसार विकसित हुआ है और प्रत्येक प्रकार की विधि का अपना विशिष्ट उद्देश्य तथा कार्यक्षेत्र है।

विधि का मुख्य उद्देश्य समाज में न्याय और व्यवस्था की स्थापना करना है। यह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है, उनके कर्तव्यों का निर्धारण करती है तथा सामाजिक जीवन को अनुशासित बनाती है। यदि विधि का पालन न किया जाए तो समाज में अराजकता, हिंसा और अन्याय की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसलिए प्रत्येक संगठित राज्य विधि के निर्माण, उसके पालन तथा उल्लंघन करने वालों को दंडित करने की व्यवस्था करता है। यही कारण है कि विधि और दंड का संबंध अत्यंत घनिष्ठ माना जाता है।

दंड का अर्थ उस दायित्वपूर्ण और वैधानिक परिणाम से है जो किसी व्यक्ति द्वारा कानून का उल्लंघन करने पर राज्य द्वारा दिया जाता है। दंड का उद्देश्य केवल अपराधी को कष्ट पहुँचाना नहीं होता, बल्कि समाज में व्यवस्था बनाए रखना, अपराधों की पुनरावृत्ति रोकना तथा न्याय की स्थापना करना भी होता है। प्राचीन काल से ही विभिन्न समाजों में अपराधों के लिए दंड की व्यवस्था रही है, किंतु समय के साथ दंड की प्रकृति और उद्देश्य में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ है। प्रारंभिक समाजों में दंड मुख्यतः प्रतिशोध और भय उत्पन्न करने के साधन के रूप में प्रयुक्त होता था, जबकि आधुनिक लोकतांत्रिक समाजों में दंड को सुधार, पुनर्वास तथा सामाजिक सुरक्षा के व्यापक उद्देश्य से जोड़ा जाता है।

दंड के सिद्धांतों का विकास इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हुआ कि अपराधी को दंड क्यों दिया जाना चाहिए और दंड का वास्तविक उद्देश्य क्या है। राजनीति विज्ञान और विधिशास्त्र में दंड के अनेक सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं जिनमें प्रतिशोधात्मक सिद्धांत, निवारक सिद्धांत, सुधारात्मक सिद्धांत तथा प्रतिकारात्मक या प्रतिपूरक दृष्टिकोण विशेष रूप से महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

प्रतिशोधात्मक सिद्धांत दंड का सबसे प्राचीन सिद्धांत माना जाता है। इसके अनुसार जिसने अपराध किया है, उसे उसके अपराध के अनुपात में दंड मिलना चाहिए। इस सिद्धांत का आधार न्याय और नैतिक उत्तरदायित्व है। अपराधी ने समाज के नियमों का उल्लंघन किया है, इसलिए उसे उसके कार्य का परिणाम भुगतना चाहिए। इस सिद्धांत में दंड को न्याय की पुनर्स्थापना का माध्यम माना गया है। प्राचीन समाजों में इस सिद्धांत का व्यापक प्रभाव था और अपराध के बदले समान प्रकार का दंड देने की धारणा प्रचलित थी। आधुनिक समय में इस सिद्धांत को सीमित रूप में स्वीकार किया जाता है क्योंकि केवल प्रतिशोध पर आधारित दंड व्यवस्था समाज के दीर्घकालिक हितों की पूर्ति नहीं कर सकती।

निवारक सिद्धांत के अनुसार दंड का मुख्य उद्देश्य अपराधों को रोकना है। यदि अपराधी को कठोर दंड दिया जाएगा तो समाज के अन्य लोग अपराध करने से भयभीत होंगे और अपराधों की संख्या कम होगी। इस सिद्धांत में दंड को सामाजिक सुरक्षा का साधन माना गया है। दंड के माध्यम से समाज में यह संदेश दिया जाता है कि कानून का उल्लंघन करने पर निश्चित रूप से दंड मिलेगा। आधुनिक विधिक व्यवस्था में निवारक तत्व का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि कानून का सम्मान बनाए रखने के लिए दंड का भय भी आवश्यक माना जाता है।

सुधारात्मक सिद्धांत आधुनिक युग का सबसे मानवीय और प्रगतिशील दृष्टिकोण माना जाता है। इसके अनुसार अपराधी जन्मजात अपराधी नहीं होता, बल्कि अनेक सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक अथवा मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों के कारण अपराध की ओर प्रवृत्त हो सकता है। इसलिए दंड का उद्देश्य केवल दंडित करना नहीं, बल्कि अपराधी का सुधार करना भी होना चाहिए। यदि अपराधी को शिक्षा, प्रशिक्षण, परामर्श, नैतिक मार्गदर्शन तथा उचित वातावरण प्रदान किया जाए तो वह समाज का उपयोगी नागरिक बन सकता है। आधुनिक कारागार व्यवस्था, सुधार गृह, किशोर न्याय प्रणाली तथा पुनर्वास कार्यक्रम इसी सिद्धांत की भावना पर आधारित हैं। यह सिद्धांत मानव गरिमा और सामाजिक पुनर्स्थापना को अत्यधिक महत्व देता है।

प्रतिकारात्मक अथवा प्रतिपूरक दृष्टिकोण का उद्देश्य अपराध से पीड़ित व्यक्ति को न्याय दिलाना है। इसके अनुसार अपराधी को केवल दंडित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जहाँ संभव हो वहाँ पीड़ित व्यक्ति को क्षतिपूर्ति भी प्रदान की जानी चाहिए। आधुनिक विधिक व्यवस्था में दुर्घटनाओं, आर्थिक अपराधों तथा उपभोक्ता मामलों में क्षतिपूर्ति की व्यवस्था इसी विचारधारा से प्रेरित है। इससे पीड़ित व्यक्ति को आर्थिक और सामाजिक राहत प्राप्त होती है तथा न्याय की भावना मजबूत होती है।

दंड के सिद्धांतों का आधुनिक स्वरूप मिश्रित माना जाता है। आज अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में दंड का उद्देश्य केवल प्रतिशोध या भय उत्पन्न करना नहीं है, बल्कि समाज की सुरक्षा, अपराध की रोकथाम, अपराधी का सुधार तथा पीड़ित को न्याय प्रदान करना भी है। इसलिए आधुनिक दंड व्यवस्था में विभिन्न सिद्धांतों का संतुलित उपयोग किया जाता है। गंभीर अपराधों के लिए कठोर दंड की व्यवस्था होती है, जबकि प्रथम बार अपराध करने वालों अथवा किशोर अपराधियों के लिए सुधारात्मक उपायों को प्राथमिकता दी जाती है।

भारतीय विधिक व्यवस्था में भी दंड के इन विभिन्न उद्देश्यों का समन्वय दिखाई देता है। भारतीय संविधान मानव गरिमा, न्याय तथा समानता के सिद्धांतों को स्वीकार करता है। न्यायपालिका अनेक अवसरों पर यह स्पष्ट कर चुकी है कि दंड का उद्देश्य केवल अपराधी को पीड़ा पहुँचाना नहीं, बल्कि समाज में न्याय स्थापित करना तथा जहाँ संभव हो वहाँ अपराधी के सुधार का अवसर प्रदान करना भी है। भारतीय दंड व्यवस्था में कारावास, जुर्माना, आजीवन कारावास तथा अन्य दंडों के साथ-साथ किशोर न्याय, परिवीक्षा तथा पुनर्वास जैसी व्यवस्थाएँ भी विकसित की गई हैं।

विधि और दंड दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। विधि समाज में नियमों का निर्धारण करती है और दंड उन नियमों के पालन को सुनिश्चित करता है। यदि विधि हो और दंड न हो तो कानूनों का पालन कठिन हो जाएगा, और यदि दंड हो परंतु न्यायपूर्ण विधि न हो तो शासन निरंकुश बन सकता है। इसलिए किसी भी आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य में न्यायपूर्ण विधि तथा संतुलित दंड व्यवस्था दोनों समान रूप से आवश्यक मानी जाती हैं। विधि समाज को दिशा प्रदान करती है और दंड समाज में अनुशासन बनाए रखने का साधन बनता है। इन दोनों का अंतिम उद्देश्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहाँ न्याय, सुरक्षा, समानता और शांति का वातावरण स्थापित हो तथा प्रत्येक नागरिक सम्मान और स्वतंत्रता के साथ अपना जीवन व्यतीत कर सके।

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